भारतीय उपराष्ट्रपति

भारत में राष्ट्रपति के बाद यह दूसरा सबसे बड़ा पद है अर्थात अधिकारिक क्रम में राष्ट्रपति के बाद उपराष्ट्रपति का स्थान आता है. भारतीय उपराष्ट्रपति का पद यूएसए के उपराष्ट्रपति के तर्ज पर बनाया गया है लेकिन दोनों देश के उपराष्ट्रपतियों के बीच काफी भिन्नताएँ हैं. अगर सबसे बड़ी मूलभूत अंतर पर गौर करें तो जहां अमेरिकी उपराष्ट्रपति के लिए वास्तविक तौर पर शक्तियां और अधिकार का प्रावधान किया गया है वहीं भारतीय संविधान उपराष्ट्रपति को कोई विशेष जिम्मेदारी नहीं सौंपी है. यह पद भारत में राजनीतिक निरंतरता को बनाए रखने के लिए सृजित किया गया है.

निर्वाचन

उपराष्ट्रपति का चुनाव एक निर्वाचक मंडल द्वारा किया जाता है इस निर्वाचक मंडल में संसद के निर्वाचित एवं मनोनीत सदस्य अर्थात इसमें राज्य सभा के निर्वाचित एवं मनोनीत सदस्य और लोकसभा के निर्वाचित एवं मनोनीत सदस्य शामिल होते हैं.

उपरोक्त निर्वाचक मंडल के द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व एवं एकल संक्रमणीय गुप्त मतदान द्वारा उपराष्ट्रपति का चुनाव किया जाता है.

नोट: राष्ट्रपति का चुनाव भी एक निर्वाचक मंडल द्वारा होता है लेकिन वह निर्वाचक मंडल उपराष्ट्रपति के चुनाव वाले निर्वाचक मंडल से थोड़ी अलग होती है. इसमें संसद राज्यसभा और लोकसभा के केवल निर्वाचित सदस्य ही शामिल होते हैं. इसके साथ ही इसमें राज्य विधानसभा के निर्वाचित सदस्य भी शामिल होते हैं. इसके विपरीत उपराष्ट्रपति के चुनाव वाले निर्वाचक मंडल में संसद के निर्वाचित एवं मनोनीत सदस्य भाग लेते हैं और इसमें राज्य विधान सभा के सदस्य शामिल नहीं होते हैं.

अहर्ता (योग्यता) एवं पद की शर्तें

संविधान में उपराष्ट्रपति के पद के लिए न्यूनतम आयु सीमा 35 वर्ष निर्धारित की गई है. साथ ही वह व्यक्ति भारत का नागरिक होना चाहिए. वह किसी सरकारी लाभ के पद पर ना हो तथा राज्यसभा का सदस्य बनने की योग्यता धारण करने वाला होना चाहिए.

नोट: वर्तमान राष्ट्रपति उपराष्ट्रपति राज्यपाल संघ अथवा राज्य का मंत्री लाभ के पद पर नहीं माने जाते हैं

उपराष्ट्रपति के उम्मीदवार के नामांकन हेतु 20 प्रस्तावक तथा 20 अनुमोदक होने चाहिए तथा आरबीआई के पास ₹15000 की जमानत राशि जमा करवानी होती है.

वह संसद अथवा राज्य विधानसभा के किसी भी सदन का सदस्य नहीं होना चाहिए. यदि ऐसा कोई व्यक्ति उपराष्ट्रपति के रूप में निर्वाचित होता है तो उपराष्ट्रपति का पद ग्रहण करने से पूर्व उसे अपने सदन की सदस्यता को त्याग नहीं होती है.

शपथ एवं पदावधि

उपराष्ट्रपति के शपथ के बारे में संविधान के अनुच्छेद 69 में चर्चा की गई है. इसके अनुसार उपराष्ट्रपति के लिए निर्वाचित हुए व्यक्ति की राष्ट्रपति या उसके द्वारा नियुक्त किसी व्यक्ति द्वारा शपथ दिलवाई जाती है. शपथ में निम्न बातों को दोहराया जाता है.

मैं भारत के संविधान के प्रति सच्ची निष्ठा और श्रद्धा रखूंगा मैं अपने पद और कर्तव्यों का निर्वाह श्रद्धा पूर्वक करूंगा

इस पद की अवधि से संबंध चर्चा संविधान के अनुच्छेद 67 में मिलती है. इसमें चर्चा की गई है कि पद ग्रहण करने से लेकर 5 वर्ष तक वह अपने पद पर बना रहता है. हालांकि इस अवधि से पूर्व भी वह राष्ट्रपति को अपना इस्तीफा सौंप सकता है

उसे समय से पूर्व पद से हटाए जाने को लेकर औपचारिक महाभियोग (पद की अवधि पूरा होने से पूर्व विशेष तरीके से हटाया जाना) की चर्चा नहीं मिलती है. उसे राज्यसभा द्वारा संकल्प पारित कर पूर्ण बहुमत से हटाया जा सकता है और इसे लोकसभा के सहमति आवश्यक है. संविधान में उपराष्ट्रपति को पद से हटाने का कोई आधार नहीं दिया गया है लेकिन महाभियोग लाए जाने के लिए 14 दिन के पूर्व सूचना दिया जाना आवश्यक है.

वह अपने पद पर उत्तराधिकारी आने तक बना रहता है. हालांकि उसके कार्यकाल पूरा होने से पूर्व नया चुनाव करा लिया जाता है. एक व्यक्ति उपराष्ट्रपति के रूप में एक से अधिक बार और कितनी भी बार निर्वाचित हो सकता है.

उसे अपना पद निर्वाचन अवैध घोषित किए जाने की स्थिति में भी छोड़ना पड़ सकता है. चुनाव से संबंधित किसी भी विवाद का निपटारा सुप्रीम कोर्ट में किया जाता है.

नोट: उपराष्ट्रपति के चुनाव को निर्वाचक मंडल अपूर्ण (सदस्य का पद रिक्त) होने के आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती है. साथ ही यदि किसी व्यक्ति के इस पद पर निर्वाचन को सुप्रीम कोर्ट द्वारा अवैध घोषित किया जाता है तो घोषणा से पूर्व उसके द्वारा किए गए कार्य वैध बने रहेंगे.

शक्ति, कार्य एवं दायित्व

भारत में उपराष्ट्रपति का कार्य सामान्य है तथा उसे पद के अनुरूप (द्वितीय सर्वोच्च पद) कोई विशेष जिम्मेदारियां नहीं सौंपी गई है फिर भी उसकी शक्तियां एवं कार्य महत्वपूर्ण है. वह भारत में राजनीतिक निरंतरता को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. उपराष्ट्रपति की प्रमुख शक्तियां कार्य एवं दायित्व निम्नलिखित है.

राज्यसभा के सभापति के रूप में: वह राज्यसभा का पदेन सभापति के रूप में कार्य करता है. इस भूमिका में उसकी शक्तियां एवं कार्य लोकसभा अध्यक्ष की तरह होती है तथा वह राज्य सभा का संचालन करवाता है.

राज्यसभा के सभापति और उपसभापति की भूमिका कार्य कर्तव्य आदि के बारे में विशेष रूप से पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में: राष्ट्रपति की अनुपस्थिति में वह कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में कार्य करता है कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में वह अधिकतम 6 महीने तक कार्य करता है इस अवधि में नए राष्ट्रपति का चुनाव करवाया जाना आवश्यक होता है.

नोट:जब उपराष्ट्रपति कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में कार्य करता है तब वह राज्यसभा के सभापति के रूप में कार्य नहीं करता है इस अवधि में उसके कार्यों का निर्वाह (राज्यसभा का सभापति) उपसभापति करता है

संविधान में उपराष्ट्रपति के वेतन, परिलब्धि, भत्ते आदि की व्यवस्था नहीं है. उसे राज्यसभा के सभापति और कार्यवाहक राष्ट्रपति के समय राष्ट्रपति वाली सुविधाएं वेतन भत्ते परिलब्धियां आदि मिलती है. इसी लिहाज से उसे दैनिक भत्ता निशुल्क पूर्ण सुसज्जित आवास फोन कार चिकित्सा यात्रा एवं अन्य सुविधा आदि प्राप्त होते हैं.

स्पष्ट है कि उपराष्ट्रपति भारत में राजनीतिक निरंतरता को बनाए रखने वाला एक महत्वपूर्ण कड़ी है जो यूएसए के उपराष्ट्रपति के मॉडल पर आधारित होते हुए भी उससे काफी भिन्न है. अंबेडकर के अनुसार उपराष्ट्रपति का कार्य सामान्य है और उसका मुख्य कार्य राज्य सभा की अध्यक्षता करना है. वह कभी-कभी ही राष्ट्रपति की अनुपस्थिति में कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में कार्य करता है.

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