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बिहार में जनजाति आन्दोलन

जब कंपनी ने सन् 1767 में इस क्षेत्र में पदार्पण किया, तभी यहाँ असंतोष व्याप्त हो गया था। जनजातीय शैली वैसे भी कठिन थी और फिर ऊपर से प्राकृतिक अकालों एवं आपदाओं ने इनके सामने बड़े भीषण संकट पैदा कर दिए। आर्थिक कठिनाइयों और अन्न के अभाव ने इन जनजातियों को तोड़कर रख दिया। उस पर भी मुगलों, मराठों एवं स्थानीय जमीदारों ने इनका दमन व शोषण करके इन्हें विद्रोही बना दिया।

प्रशासकीय स्तर पर जनजातीय लोगों के हितों एवं अधिकारों का हनन तथा दमन किया जा रहा था। इसके साथ इन लोगों को अपनी सभ्यता एवं संस्कृति पर भी खतरा मँडराता दिखाई दे रहा था। इस प्रकार के सभी कारणों ने जनजातीय विद्रोह को जन्म दिया।

इन जनजातीय लोगों को अपनी संस्कृति, अधिकारों एवं स्वतंत्रता में किसी का भी हस्तक्षेप पसंद नहीं था। अंग्रेजों के साथ आई उनकी दुरूह संस्कृति ही भारतीयों को पसंद नहीं थी, तो फिर जनजातीय लोग इसे कैसे सहन करते!

अंग्रेजों के आने से जनजातीय लोगों को अपनी पहचान व स्वतंत्रता खतरे में पड़ती दिखाई देने लगी थी। 17वीं शताब्दी के अंत में जनजातीय विद्रोह शुरू हो गए थे, जबकि अंग्रेज यहाँ केवल दो दशक पहले ही आए थे। इन जनजातीय विद्रोहों में अंग्रेजों की पक्षपातपूर्ण नीति का भी हाथ था। अंग्रेज किसी एक के हितैषी बनकर अन्य सबको शोषण की भट्ठी में झोंक देते थे। राजा, जमींदार, अधिकारी सभी जनजातीय प्रजा के लिए यमदूत सिद्ध हो गए थे। इन विद्रोहों के पीछे इन लोगों का स्वाभिमान स्पष्ट झलकता था। अंग्रेजी शासन में हुए मुख्य जनजातीय विद्रोह निम्नलिखित है –

‘हो’ विद्रोह (‘Ho’ Rebellion)

यह विद्रोह सन् 1821-22 छोटानागपुर के ‘हो’ लोगों ने सिंहभूम के राजा जगन्नाथ सिंह के विरुद्ध किया। जगन्नाथ सिंह के प्रति ‘हो’ लोग तटस्थ थे और इनका किसी से भी कोई झगड़ा नहीं था। नागवंश के राजा ने इन पर एक-दो बार आक्रमण किया था, लेकिन सिंहभूम के राजा के साथ इनके मैत्रीपूर्ण संबंध थे। जब बाद में सिंहभूम के राजा ने अंग्रेजों की अधीनता स्वीकार कर ली और अंग्रेजों की नीति के फलस्वरूप अपने ही ‘हो’ मित्रों के साथ वह दुर्व्यवहार करने लगा तो ‘हो’ लोग भडक उठे। मेजर रफसेज ने भी इन लोगों को अपने कई स्वार्थों में प्रयोग किया और इन्हें झूठे आश्वासन देकर बेवकूफ भी बनाया।

‘हो’ लोग जल्दी ही समझ गए थे कि उन्हें मूर्ख बनाकर उनके भोलेपन का लाभ उठाया जा रहा है। जब उन्होंने इसका विरोध किया तो रफसेज समझ गया कि वे लोग विद्रोही होते जा रहे हैं। उनके विद्रोह की झलक चाईबासा में एक वापसी दल को लूटने और कुछ लोगों की जान लेने से मिली। रफसेज ने तुरंत एक सेना की टुकड़ी ‘हो’ लोगों के विरुद्ध भेजी। ‘हो’ लोगों ने एकत्रित होकर इस सेना को तहस-नहस कर दिया। इससे रफसेज घबरा गया, इसलिए उसने अपनी सेना को गुटियालोर गाँव भेज दिया, जहाँ ‘हो’ लोगों की संख्या अधिक थी। अंग्रेजों ने गाँव में आग लगाने के साथ-साथ वहाँ बहुत तबाही मचाई। ‘हो’ लड़ाकों ने भी हथियार नहीं डाले और वे जी-जान से लड़ते रहे। रफसेज को हालात चिंताजनक लगने लगे, अत: उसने और सैनिक बुला लिये। एक महीने तक लगातार संघर्ष करने के बाद ‘हो’ विद्रोहियों को आत्मसमर्पण करना पड़ा। इस प्रकार कुछ शर्तों और करों के साथ अंततः शांति स्थापित हो सकी।

सरदारी आंदोलन (Sardari Movement)

1850 ई. और उसके बाद बिहार क्षेत्र में अनेक आदिवासियों द्वारा ईसाई धर्म अपना लेने से भूमि की समस्या और बदतर हो गई। ईसाई धर्म के व्यापक प्रचार-प्रसार के विरुद्ध जनजातीय सुधारवादी आंदोलन चले। इन्हीं में सरदारी आंदोलन सन् 1859 से 1881 के मध्य चला। इसका उल्लेख एस.सी. राय ने अपनी पुस्तक ‘द मुंडाज (The Mundaj)’ में किया है। वास्तव में यह भूमि के लिए लड़ाई थी। इसका मूल उद्देश्य जमींदारों को बाहर निकालना, बेगारी प्रथा को समाप्त करना और भूमि पर लगाए गए प्रतिबंधों का विरोध करना था। सामान्यतः यह आंदोलन तीन चरणों में पूर्ण हुआ।

खरवार आंदोलन (Kharvar Movement)

खरवार आंदोलन, जिसका नेतृत्व भागीरथ माँझी ने किया था, का उद्देश्य प्राचीन मूल्यों और जनजातीय परंपराओं को पुनः स्थापित करना था। इस आंदोलन का प्रभाव क्षेत्र संथाल परगना था। इसके साथ ही वे भूमि संबंधी समस्याओं में सुधार के अलावा सामजिक कर्मों में शुद्धि के प्रवर्तक भी थे। इसीलिए मदिरा आदि का इसमें विरोध किया गया। आंदोलन के प्रति पूर्ण समर्पणवाले सफाहोर कहलाए और उदासीन लोग ‘बाबजिया’ कहलाए। बेमन पूजकों को मेलबरागर कहा गया।

कोल विद्रोह (Kol Rebellion)

यह व्यापक विद्रोह छोटानागपुर, पलामू, सिंहभूम और मानभूम की कई जनजातियों का संयुक्त विद्रोह था, जो अंग्रेजों के बढ़ते हस्तक्षेपों के शोषण के खिलाफ उपजा था।

कोल विद्रोह का कारण

अंग्रेज समर्थित जमींदार इन वर्गों, विशेषकर कृषकों, का ऐसा खून चूस रहे थे कि इन्हें भोजन के लिए भी तरसना पड़ रहा था। कितने ही अवांछित करों और जबरन वसूली ने इन लोगों को खून के आँसू रुला दिए थे। कृषि और शिकार पर आश्रित इन लोगों से मनमाना कर वसूलने के लिए इन पर तरह-तरह के अत्याचार किए जाते तथा कर चुकाने की असमर्थता में इनकी जमीन ‘दीकुओं’ (बाहरी लोग) को दे दी जाती थी। जमींदार इनसे बेगार कराते थे। वे स्वयं पालकी में चलते और कहारों का कार्य आदिवासी लोग करते थे। इनके पशुओं की देखभाल भी आदिवासी ही करते थे।

कैथबर्ट ने कहा है, “इन जमींदारों ने किसानों पर इतने अत्याचार किए कि गाँव-के-गाँव उजड़ गए। इस सामंती व्यवस्था में जमींदार शायद ही किसानों के हित की कोई बात सोचता हो और प्रशासनिक वर्ग अलग से इनका खून चूस रहा था। फलत: आबादी का हस हो रहा था और लोग बस किसी प्रकार अपना जीवन-यापन कर रहे थे।”

इसी संबंध में डब्ल्यू.डब्ल्यू. ब्लेट ने कहा है, “राजा की शासन व्यवस्था घोर निराशावादी और इन दबे वर्गों के प्रति शोचनीय थी। किसानों की जमीन इनसे जबरन छीनी जा रही थी और बाहरी लोगों को दी जा रही थी। इनकी शिकायत पर किसी शासक या प्रशासक का रवैया सहानुभूतिपूर्ण भी नहीं था। इस लूट, दंड और उत्पीड़न ने कितनी ही जाने ले ली थीं।”

इनके अतिरिक्त भी कुछ ऐसे नैतिक कारण थे, जिन्होंने इन आदिवासी लोगों के मन में विद्रोह की भावना पैदा कर दी थी। अतः इन लोगों में असंतोष व्याप्त हो गया था और यह कभी भी ज्वालामुखी की तरह फट सकता था। मुंडा जनजाति ने बंदगाँव में आदिवासियों की एक सभा बुलाई। इस सभा में लगभग सात कोल आदिवासी आए और वहीं से यह भीषण विद्रोह आरंभ हुआ। इसकी चपेट में दीकू, अंग्रेज और उनके समर्थित जमींदार आए। विद्रोहियों ने गाँव-के-गाँव जला दिए। इसका परिणाम यह हुआ कि इस विद्रोह और इसके तात्कालिक कारण ने विद्रोह की आग को सिंहभूम, टोरी, हजारीबाग और मानभूम तक के क्षेत्रों में प्रज्वलित कर दिया। उनके इस विद्रोह में लगभग 1,000 लोग मारे गए।

इस व्यापक विद्रोह को दबाने के लिए अंग्रेज सरकार ने रामगढ़ में सेना एकत्रित की और बाहर से भी सेना बुलाई गई। विद्रोहियों का नेतृत्व बुधू भगत, सिंग राय और सूर्य मुंडा कर रहे थे। अंग्रेजी सेना की कमान कैप्टन विल्किंसन के हाथों में थी। जब अंग्रेजी सेना का विद्रोहियों से सामना हुआ तो बहुत जन-धन की हानि हुई। बुधू भगत अपने डेढ़ सौ सहयोगियों के साथ मारा गया। यह विद्रोह लगभग पाँच साल तक चला, जिसमें मरनेवाले विद्रोहियों की संख्या अधिक रही, तब कंपनी को भी इसकी चिंता हुई।

कंपनी ने विद्रोह के कारणों की जाँच-पड़ताल की और झारखंड की शासन व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन किए गए। बेहतर न्याय-व्यवस्था और पारदर्शी प्रणाली के गठन की आवश्यकता महसूस हुई। उस समय तक झारखंड में अंग्रेजों ने बंगाल के ही सामान्य नियम लागू कर रखे थे, लेकिन अब परिस्थिति की जटिलता को देखकर कंपनी ने ‘रेगुलेशन-XIII’ नाम से एक नया कानून बनाया, जिसके अंतर्गत रामगढ़ जिले को विभाजित किया गया। एक और अलग नए प्रशासनिक क्षेत्र का गठन किया गया, जिसमें जंगल महाल और ट्रिब्यूटरी महाल के साथ एक नान-रेगुलेशन प्रांत बनाया गया। इस प्रशासनिक क्षेत्र को जनरल के प्रथम एजेंट के रूप में गवर्नर के अधीन किया गया। इस व्यवस्था में विल्किंसन को पहला गवर्नर बनाया गया, जो पहले सेना में कैप्टन था और इस विद्रोह के दमन के लिए भेजा गया था। कोल विद्रोह’ झारखंड के इतिहास में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है, क्योंकि इसके अनेक दूरगामी परिणाम हुए। इसी विद्रोह ने प्रशासनिक व्यवस्था के सुधार की नींव रखी।

तमाड़ विद्रोह (Tamad Rebellion)

सन् 1771 में अंग्रेजों ने छोटानागपुर पर अपना अधिकार जमा लिया था और यहाँ के राजाओं एवं जमींदारों को कंपनी का संरक्षण मिल चुका था, जिससे इन लोगों को प्रजा के शोषण की छूट मिल गई थी। जमींदारों ने किसानों की जमीनें हड़पनी शुरू कर दी थीं। इस शोषण नीति ने उराँव जनजाति के लोगों में विद्रोह की आग भड़का दी। इस जनजाति ने सन् 1789 में अपने विद्रोही तेवर दिखाने शुरू कर दिए और जमींदारों पर टूट पड़ी। सन् 1794 तक इन विद्रोहियों ने जमींदारों को इतना भयभीत कर दिया कि उन्होंने अंग्रेज सरकार से अपनी रक्षा करने की गुहार लगाई।

अंग्रेजों ने परिस्थिति को भाँपा और पूरी शक्ति से विद्रोह को कुचल दिया। इससे कई व्यवस्थाओं का सूत्रपात हुआ और कुछ समय तक शांति बनी रही। जब दुबारा इनकी जमीन को हड़पा जाने लगा तो यह विद्रोह व्यापक हो गया।

चेरो विद्रोह (Chero Revolt)

यह आंदोलन सन् 1800 में चेरो किसानों ने अपने राजा के विरुद्ध शुरू किया। यह विद्रोह तब अंग्रेजों की पक्षपातपूर्ण नीति के विरोध में हुआ, जब कंपनी ने कूटनीति से जयनाथ सिंह को अपदस्थ कर दिया और उसके स्थान पर गोपाल राय को राजा बना दिया। कुछ समय बाद गोपाल राय कुछ विद्रोही चेरो सरदारों के साथ मिल गया, जिससे अंग्रेज रुष्ट हो गए। अंग्रेजों ने गोपाल राय को बंदी बनाकर पटना जेल में डाल दिया। इसके बाद अंग्रेजों ने चूड़ामन को वहाँ का राजा बना दिया। चूड़ामन राय कोई भी कार्य अंग्रेजों की सलाह से ही करता था और इससे जनजातीय हित प्रभावित होते थे। इससे लोगों में असंतोष व्याप्त हो गया और चेरो सरदार भूषण सिंह के नेतृत्व में खुला विद्रोह शुरू हो गया। चूड़ामन राय ने अंग्रेजों से मदद की गुहार लगाई और इस विद्रोही दल पर टूट पड़ा। कर्नल जोंस ने इस विद्रोह को कुचलने के हरसंभव प्रयास किए, लेकिन उसे अपेक्षित सफलता नहीं मिली। दो वर्षों तक चेरो विद्रोही अंग्रेजों और चूड़ामन राय को छकाते रहे। अंततः भूषण सिंह को गिरफ्तार कर लिया गया। सन् 1802 में इस विद्रोही चेरो नेता को फाँसी दे दी गई और इसके बाद यह विद्रोह भी धीरे-धीरे समाप्त हो गया।

संथाल विद्रोह (Santhal Rebellion)

भूमिका-  संथाल विद्रोह ब्रिटिश औपनिवेशिक व्यवस्था के विरुद्ध प्रथम व्यापक सशस्त्र विद्रोह था. यह विद्रोह 1855 में प्रभावी हुआ तथा 1856 में इसका दमन कर दिया गया.इस विद्रोह का केंद्र भागलपुर से लेकर राजमहल की पहाड़ियों तक था. इस विद्रोह का मूल कारण अंग्रेजों के द्वारा  जमीदारी व्यवस्था तथा साहूकारों एवं महाजनों के द्वारा शोषण एवं अत्याचार था. इस विद्रोह का नेतृत्व सिद्धू, कान्हू, चांद और भैरव में किया था.

विश्लेषण –  संथाल, दामन ए कोह  नामक क्षेत्र में निवास करने वाले आदिवासी थे. वे उस क्षेत्र में अपनी परंपरागत  व्यवस्था एवं अपनी सामाजिक, आर्थिक व्यवस्थाओं के तहत शांतिपूर्ण तरीके से जीवन यापन कर रहे थे.  संथालों का अपना राजनीतिक ढांचा भी था. परहा पंचायत के द्वारा सारे क्षेत्रों पर उनके प्रतिनिधियों के द्वारा शासन किया जाता था . परहा पंचायत के सरदार हमेशा
संथालों के हितों की रक्षा का ख्याल रखते थे.वे गांव के लोगों से  लगान वसूलते थे तथा उसे एक साथ राजकोष में जमा करते थे.धार्मिक अनुष्ठानों के लिए भी वे अपने लोगों से ही पुरोहित या पाहन का चुनाव करते थे.इस क्षेत्र में अंग्रेजो के द्वारा किए गए शोषण एवं अत्याचार के कारण विद्रोह प्रारंभ हुआ.

विद्रोह के कारण-  

अंग्रेजों की जमींदारी व्यवस्था

  1. संथाल  क्षेत्र में अंग्रेजों का आगमन
  2. भू राजस्व का ऊँचा दर
  3. जमीन हड़प

भागलपुर से वर्धमान के बीच रेल परियोजना में संथालो से बेगारी करवाना इस विद्रोह का तात्कालिक कारण था.

साहूकारों का अत्याचार .

विद्रोह का निर्णय –  30 जून 1855 को भगनीडीह में संथालों ने विद्रोह करने का निर्णय लिया.

उद्देश्य –  इस विद्रोह का मुख्य उद्देश्य  बाहरी लोगों को भगाना, विदेशियों का राज हमेशा के लिए समाप्त करना तथा न्याय व धर्म का राज स्थापित करना था.

विद्रोह का विस्तार –

  • संथालों  ने महाजनों एवं जमींदारों पर हमला शुरू किया.
  • साहूकारों के मकानों को उन दस्तावेजों के साथ जला दिया गया जो गुलामी के प्रतीक थे.
  • पुलिस स्टेशन, रेलवे स्टेशन और डाक ढोने वाली गाड़ियों को जला दिया गया.
  • रेलवे इंजीनियर के बंगलों को  जला दिया गया.
  • फसल जला दिए गए.

विद्रोह का दमन

  • इस संगठित विद्रोह को कुचलने के लिए सेना का सहारा लिया गया.
  • मेजर जनरल बरो के नेतृत्व में सेना की टुकडिया भेजी गई.
  • उपद्रव ग्रस्त क्षेत्र में मार्शल लॉ लागू कर दिया गया और विद्रोही नेताओं की गिरफ्तारी के लिए इनामों की भी घोषणा की गयी.
  • लगभग 15000 संथाल मारे गए. गांव के गांव उजाड़ दिए गए.
  •  सिद्धू और कान्हो को पकड़ लिया गया.

विद्रोह का स्वरूप

जातीय विद्रोह

  • संथालों  का विद्रोह एक जातीय विद्रोह था जो मूलतः  जाति एवं धर्म के नाम पर संगठित किया गया था.
  • उनमे वर्ग भावना का संचार नहीं हुआ था.
  • उन्होंने जातीय आधार पर अपनी पहचान बनाई थी.

सुसंगठित आंदोलन

  • संथाल विद्रोह एक संगठित आंदोलन था जिसमें करीब 60000 से ज्यादा लोगों को एकजुट किया.

सशस्त्र विद्रोह

  • संथाल विद्रोह एक सशस्त्र क्रांति के रूप में प्रकट हुआ था.
  • इस आंदोलन का मुख्य उद्देश्य ब्रिटिश साम्राज्य की सुनियोजित सत्ता से टकराना था.
  • विद्रोहियों के हथियार परंपरागत एवं दकियानूसी था. वह तीर धनुष एवं भाले का प्रयोग करते थे. जबकि ब्रिटिश सैनिक अत्याधुनिक  शस्त्रों से लैस थे.

सीमित क्षेत्र

  • यह एक स्थानीय आंदोलन था जिसके लिए बहुत सारे जातिगत एवं धर्मगत बातें जिम्मेदार थी.

परिणाम

  • संथाल परगना नामक एक प्रशासनिक इकाई का गठन किया गया.
  • संथाल परगना टेनेंसी एक्ट को लागु किया गया.
  • अंग्रेजों तथा संथालो के बीच संवाद स्थापित करने के लिए ग्राम प्रधान को मान्यता दी गयी.

निष्कर्ष – इस प्रकार स्पष्ट है की संथाल विद्रोह औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध प्रथम सशस्त्र विद्रोह था. सिद्धू और कान्हो  के संघर्ष की प्रशंसा रविन्द्र नाथ टैगोर ने भी की है.


वीरभूम, ढालभूम, सिंहभूम, मानभूम और बाकुड़ा के जमींदारों द्वारा सताए गए संथाल 1790 ई. से ही संथाल परगना क्षेत्र, जिसे दामिन-ए-कोह कहा जाता था, में आकर बसने लगे। इन्हीं संथालों द्वारा किया गया यह विद्रोह झारखंड के इतिहास में सबसे अधिक चर्चित हुआ, क्योंकि इसने कंपनी और उसके समर्थित जमींदारों, सेवकों और अधिकारियों को बहुत बड़ी संख्या में जनहानि पहुँचाई थी।

विद्रोह के कारणों

इस प्रकार विद्रोह के कारणों में कृषक उत्पीड़न प्रमुख था। संथाल जनजाति भी कृषि और वनों पर निर्भर थी, लेकिन जमींदारी प्रथा ने इन्हें इनकी ही भूमि से बेदखल करना शुरू कर दिया था। अंग्रेज समर्थित जमींदार पूरी तरह से संथालों का शोषण कर रहे थे और साथ ही कंपनी ने कृषि करों को इतना अधिक कर दिया था कि संथाल लोग इसे चुकाने में अक्षम थे। इसके अतिरिक्त बाहरी लोगों के आवागमन ने इन संथालों को अपनी ही भूमि पर सिमटने को विवश और निर्धन कर दिया था। संथाल जीवननिर्वाह के लिए साहूकारों व जमींदारों के शोषणचक्र में फस रहे थे। ये लोग ऊँची ब्याज दर पर ऋण देते थे और फिर वसूली के नाम पर मानसिक एवं शारीरिक शोषण भी करते थे। न्याय-व्यवस्था भी इन्हीं संपन्न एवं समृद्ध शोषकों का साथ देती थी। इस उत्पीड़न जाल से बाहर निकलने का मार्ग संथालों के सामने न होने से ये लोग आत्महत्या कर रहे थे।

ऐसी विकट स्थिति में तो साधारण लोग ईश्वर के अवतार की ही कामना करते हैं। ईश्वर भी ऐसे लोगों की पुकार अनसुनी नहीं करता, तभी तो संथालों के ऐसे घोर उत्पीड़न का विरोध करते सिधू-कान्हू नामक दो जवान सामने आए। इन दोनों ने दिन-रात एक करके संथालों में विद्रोह का साहस भरा और उन्हें एकजुट होने के लिए प्रोत्साहित किया।

सन् 1855 में हजारों संथालों ने भोगनाडीह के चुन्नू माँझी के चार पुत्रों सिधू, कान्हू, चाँद तथा भैरव के नेतृत्व में एक सभा की, जिसमें उन्होंने अपने उत्पीड़कों के विरुद्ध लामबंद लड़ाई लड़ने की शपथ ली। सिधू-कान्हू ने लोगों में एक नई ऊर्जा व उत्साह भर दिया। उन्होंने एकजुट होकर अपनी भूमि से दीकुओं को चले जाने की चेतावनी दी। इन दीकुओं में अंग्रेज और उनके समर्थित कर्मचारी, अधिकारी तथा जमींदार आदि थे। सरकारी आज्ञा न मानने, दामिन क्षेत्र में अपनी सरकार स्थापित करने और लगान न देने की घोषणा की गई। इसी बीच दरोगा महेशलाल दत्त की हत्या कर दी गई। चेतावनी देने के दो दिन बाद संथालों ने अपने शोषकों को चुन-चुनकर मारना शुरू कर दिया। अंबर के जमींदार की हवेली जला दी गई। महेशपुर राजमहल पर विद्रोहियों ने कब्जा करने का प्रयास किया। अधिकारी और जमींदार इनके मुख्य निशाने पर थे, फिर जो बाहरी व्यापारी थे, उनके मकान एवं दुकानों को तोड़ दिया गया। यह खुला सशस्त्र विद्रोह थाजो कहलगाँव से राजमहल तक फैल गया। यह विद्रोह 1856 में वीरभूम, बाँकुड़ा और हजारीबाग में भी फैल गया। यह देख कंपनी चिंतित हो गई और बातचीत के द्वारा संथालों को समझाने का प्रयास किया जाने लगा, लेकिन धैर्य की सीमा पार करके उपजा संथालों का आक्रोश कुछ भी सुनने को तैयार नहीं था। संथाल तो अपनी भूमि से अंग्रेजों और उनके समर्थकों को भगाने या समाप्त करने की शपथ ले चुके थे। अंग्रेजों के कार्यालयों को भस्म किया जाने लगा। जहाँ भी कोई अंग्रेज दिखाई देता, उसे वहीं ढेर कर दिया जाता। संथाल साक्षात् कालबन गए थे। दुर्दीत होकर उन्होंने अंग्रेज महिलाओं और बच्चों को भी मार डाला।

संथालों के हंगामे से अंग्रेजी प्रशासन में हड़कंप मच गया। कंपनी ने सेना को खुली छूट देकर इस विद्रोह को दबाने का आदेश दिया। अंग्रेजों ने भी संथालों के प्रति बहुत बर्बरता दिखाई और उनके गाँव-के-गाँव जला दिए। अंग्रेजी सेना संथालों के नेताओं की धरपकड़ में दिन-रात एक करने लगी और इसमें उसे सफलता भी मिली। अधिकांश विद्रोही नेता या तो मारे गए थे या फिर बंदी बना लिये गए थे। चाँद और भैरव गोलियों के शिकार हो वीरगति को प्राप्त हुए। सिद्धू और कान्हू पकड़े गए, उन्हें बरहेट में फाँसी दे दी गई। इस विद्रोह को फिर भी कुछ सफलता अवश्य मिली थी, क्योंकि संथालों ने अपने क्षेत्र से अधिकांश अंग्रेजों और उनके समर्थकों को या तो मार दिया था या भगा दिया था। जो शेष बचे भी थे, वे भी बहुत समय तक आतंक के साए में जीते रहे। इस विद्रोह के जनक सिधू-कान्हू वर्तमान झारखंड के लोगों के लिए पूजनीय हो गए और आज भी उन्हें झारखंड के जननायक के रूप में याद किया जाता है। सिधू-कान्हू की गाथाएँ आज भी झारखंड के लोगों के लिए ओज एवं शक्ति की प्रेरणास्रोत हैं।

जनवरी 1856 ई. तक संथाल परगना क्षेत्र में संथाल विद्रोह दबा दिया गया, लेकिन सरकार ने संथालों की वीरता और शौर्य को स्वीकार किया। सरकार को प्रशासनिक परिवर्तनों की अनिवार्यता स्वीकार करनी पड़ी।

इस संथाल विद्रोह के परिणामस्वरूप 30 नवंबर, 1856 ई. को विधिवत् संथाल परगना जिला की स्थापना की गई और एशली एडेन को प्रथम जिलाधीश बनाया गया।

टाना भगत आंदोलन (Tana Bhagat Movement)

यह आंदोलन बिरसा आंदोलन से ही जनमा था। यह भी एक बहुआयामी आंदोलन था, क्योंकि इसके नायक भी अपनी सामाजिक अस्मिता, धार्मिक परंपरा और मानवीय अधिकारों के मुद्दों को लेकर आगे आए थे। यह आंदोलन सन् 1914 में शुरू हुआ। टाना भगत कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि उराँव जनजाति की एक शाखा थी, जिसने कुडुख धर्म अपनाया था। इन लोगों की स्थिति अत्यंत दयनीय थी और इनसे अधिकांशतः श्रमवाले कार्य ही कराए जाते थे।

सुबह से शाम तक भवन, सड़क आदि के निर्माण कार्यों के लिए ये लोग ईंट, पत्थर ढोते रहते और मजदूरी के नाम पर इन्हें कुछ विशेष नहीं मिलता था। एक प्रकार से इन्हें खच्चरों की भाँति प्रयोग किया जाता था। इस आंदोलन के नायक के नाम पर ‘जतरा भगत’ नामक नौजवान को मान्यता मिली थी, जो अलौकिक सिद्धियों में रत रहता था। जनश्रुति के आधार पर इसी जतरा भगत को ‘धर्मेश’ नामक उराँव देवता ने दर्शन दिए थे और उसे कुछ निर्देश देकर इस आंदोलन को शुरू करने की आज्ञा दी थी।

जतरा भगत ने ‘धर्मेश’ देवता का आदेश पाकर भूत-प्रेत की साधना का कार्य छोड़ दिया और निरामिष हो गया। उसने लोगों को अंधविश्वास में आस्था रखने से मना किया और आचरण में सात्त्विकता लाने का संदेश दिया, साथ ही उसने बेगार या कम मजदूरी पर काम करनेवालों को ऐसा काम न करने का आदेश दिया। लोगों में जल्दी ही वह बहुत लोकप्रिय हो गया और लोग उसकी प्रत्येक बात को आत्मसात् करने लगे। इससे अंग्रेज घबरा गए और उन्होंने जतरा भगत को गिरफ्तार कर लिया। इससे उराँव लोगों में रोष फैल गया। अंग्रेज इस आंदोलन से संबंधित सभी लोगों को गिरफ्तार करने में जुट गए। परिणाम यह हुआ कि हिंसा भड़क उठी और एक सामाजिक जनजागरण व्याप्त हो गया। अंग्रेजों ने बड़ी क्रूरता से इस आंदोलन को दबा दिया, फिर भी यह आंदोलन सामाजिक चेतना जगाने में सफल रहा।

इस प्रकार अंग्रेज सरकार के विरुद्ध हुए जनजातीय विद्रोहों ने कुछ हद तक बिहार के दबे-कुचले लोगों को उनके अधिकार दिलाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन आंदोलनों में आक्रामकता, बर्बरता, आक्रोश, शक्ति संगठन और नीतिगत कारण जैसे वे सभी तत्त्व मौजूद थे, जो विद्रोह को जन्म देते हैं। बिहार की तत्कालीन स्थिति दयनीय थी और विडंबना यह थी कि प्राकृतिक रूप से संपन्न इस क्षेत्र का शोषण और दोहन करने पहुँचे बाहरी लोगों ने यहाँ की मूल जनजातियों को लगभग बेदखल ही कर दिया था। शिक्षा से दूर और सुविधाओं से वंचित यह जनजातीय समाज शांतिपूर्वक अपना जीवन निर्वाह कर रहा था। उनके अपने पर्वो, रीतियों और अपने सामाजिक ताने-बाने में ही उनके लिए सभी खुशियाँ थीं। लगभग 300 वर्ष अस्थिरता, अराजकता, शोषण, दमन, अपमान और निर्धनता के साए में रहकर भी इन जनजातियों ने अपने अस्तित्व को बचाए रखा तो यह उनकी जिजीविषा ही है। इतने पर भी बिहार के लोगों ने देश के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वाह किया। इन लोगों ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अतुलनीय योगदान दिया, जिसे विस्मृत नहीं किया जा सकता।

नोनिया विद्रोह (Noniya Rebellion)

यह विद्रोह 1770 से 1800 ई. के बीच बिहार के शोरा उत्पादक क्षेत्रों हाजीपुर, तिरहुत, सारण और पूर्णिया में हुआ था। इस काल में बिहार शोरा उत्पादन का प्रमुख केंद्र था। शोरा का उत्पादन बारूद बनाने के लिए किया जाता था। शोरा उत्पादन करने का कार्य मुख्य रूप से नोनिया जाति द्वारा किया जाता था। ब्रिटिश कंपनी और नोनियों के बीच आसामी मध्यस्थ का कार्य करते थे, जो नोनिया लोगों से कच्चा शोरा लेकर कारखानों को देते थे। आसामियों को ब्रिटिश कंपनियों द्वारा शोरे की एक-चौथाई रकम अग्रिम के रूप में मिलती थी। कल्मी शोरा के लिए 2 से 4 रुपए प्रति मन और कच्चा शोरा 1 से 4 आना प्रति मन आसामी कंपनी से लेते थे तथा नोनिया लोगों को 12, 14 या 5 आना प्रति मन देते थे, जबकि अन्य व्यापारी जो कंपनी से संबंधित नहीं थे, वे नोनिया लोगों को 3 रुपए प्रति मन शोरा देते थे। अतः कंपनी द्वारा नोनिया लोगों का अत्यधिक शोषण हो रहा था, इसलिए गुप्त रूप से वे लोग व्यापारियों को शोरा बेचने लगे। इसकी जानकारी जब ब्रिटिश सरकार को हुई, तब उसने नोनिया लोगों पर क्रूरतापूर्वक कार्रवाई की।

लोटा विद्रोह (Lota Rebellion)

1857 ई. के विद्रोह के पूर्व ही 1856 ई. में मुजफ्फरपुर में अंग्रेजों के प्रति लोगों का गुस्सा बढ़ रहा था। अंग्रेजी शोषण एवं अत्याचार के कारण लोगों के मन में असंतोष बढ़ता जा रहा था। इसी समय मुजफ्फरपुर की जेल में बंद कैदियों ने विद्रोह कर दिया, जिसे लोटा विद्रोह कहा जाता है। इस समय कैदियों को जेल के अंदर पीतल का लोटा दिया जाता था, लेकिन सरकार ने अचानक निर्णय लिया और पीतल के स्थान पर मिट्टी का लोटा देना प्रारंभ किया। अतः कैदियों ने इसका विरोध करना शुरू कर दिया। विद्रोह के जेल के बाहर भी फैलने की आशंका को देखकर पुनः कैदियों को पीतल का लोटा देना शुरू कर दिया गया।

भूमिज विद्रोह (Bhumij or Land Revolt)

भूमिज विद्रोह को गंगानारायण हंगामा (Ganga Narayan Hangama) भी कहा जाता है। यह विद्रोह जनजातीय जमींदारों और जनजातीय लोगों का संयुक्त विद्रोह था, जिसकी अगुआई बड़ाभूम के राजा बेलाक नारायण के पोते गंगानारायण ने की थी।

विद्रोह के कारण

इस विद्रोह के पीछे कुछ राजनीतिक कारण तो थे ही, साथ ही मूल रूप से यह विद्रोह आदिवासी उत्पीड़न से उपजा था। बड़ाभूम की जागीर को गंगानारायण से उसके भाई माधव सिंह ने हड़पने का षड्यंत्र रचा था। माधव सिंह दीवान था। उसने जनता का बहुत शोषण किया था। जब गंगानारायण ने उसका विरोध किया तो वह कंपनी सेना की शरण में जा पहुँचा। गंगानारायण ने भी हालात की गंभीरता को समझा और उसने उन जमींदारों से संपर्क किया, जो अंग्रेजी व्यवस्था से त्रस्त थे। उनके साथ गंगानारायण को जनजातीय लोगों का भी समर्थन मिला, क्योंकि आदिवासी लोग भी इस व्यवस्था से बहत निराश थे। कोल और ‘हो’ जाति के लोग तो बुरी तरह से नाराज थे। इस प्रकार गंगानारायण के नेतृत्व में एक संयुक्त विद्रोह की भूमिका बनी, जिसमें जनजातीय लोगों की भूमिका रही। सन् 1832 में ही जब कोल विद्रोह को दबाने के प्रयास चल रहे थे, उसी दौरान गंगानारायण ने अपने विद्रोही गुट के साथ विद्रोह का बिगुल बजा दिया। इस विद्रोह को अंग्रेजों ने ‘भूमिज विद्रोह’ की संज्ञा दी। शीघ्र ही विद्रोह ने व्यापक रूप ले लिया और कंपनी सेना इन विद्रोहियों को दबाने के लिए लेफ्टिनेंट बैंडन और टिमर के नेतृत्व में निकल पड़ी। खरसावाँ का ठाकुर अंग्रेजों की ओर से लड़ा।

इस लड़ाई में गंगानारायण मारा गया और खरसावाँ के ठाकुर ने उसका सिर काटकर कैप्टन विल्किंसन को उपहार में भेज दिया। विद्रोह का दमन हो चुका था, लेकिन विल्किंसन को इस विद्रोह ने कुछ और सोचने पर विवश कर दिया। उसने अपने वरिष्ठ अधिकारियों को वस्तुस्थिति समझाकर उनसे परामर्श किया और जंगल महाल में प्रशासकीय परिवर्तन की आवश्यकता बताई। रेगुलेशन-XIII के अंतर्गत जंगल महाल जिले को स्थगित कर इसकी दीवानी अदालत बंद कर दी गई। नई गठन नीति लागू हुई, जिसमें शेरगढ़, विष्णुपुर और सोनपहाड़ी को वर्धमान में शामिल कर लिया गया तथा शेष भागों को मिलाकर मानभूम को जिला बना दिया गया। इस जिले में झालदा, धनबाद, सुपुर, रायपुर, अंबिका नगर, बड़ाभूम और श्यामसुंदरपुर सहित कई मुख्य क्षेत्रों को शामिल किया गया। इसका तात्कालिक मुख्यालय मानबाजार बनाया गया, जिसे सन् 1838 में बदलकर पुरुलिया ले जाया गया।

इस प्रकार ‘भूमिज विद्रोह’ भी प्रशासनिक व्यवस्था के सुधार का एक कारण बना। अंग्रेज अधिकारी जान गए थे कि आदिवासी लोगों को न्याय-व्यवस्था की पारदर्शिता न मिलना और उनका किसी भी प्रकार का उत्पीड़न रोज नए विद्रोह को जन्म देनेवाले कारण थे। प्रशासनिक व्यवस्था को गवर्नर के अधीन करके इस दिशा में सार्थक कदम उठाया गया था।

बिरसा मुंडा आंदोलन (Birsa Munda Movement)

भूमिका –  जनजातीय आंदोलनों में सबसे विस्तृत व संगठित बिरसा आंदोलन था. इस आंदोलन का नेतृत्व बिरसा मुंडा ने किया था. इस विद्रोह को उलगुलान भी कहते हैं, जिसका तात्पर्य महाविद्रोह से है. जगीदारों के द्वारा खुंटकुटी के अधिकारों का उल्लंघन , औपनिवेशिक शोषण की नीतियाँ तथा बढती बेगारी इस आंदोलन के  मूल कारणों में प्रमुख थे. इस विद्रोह का उद्देश्य आंतरिक शुद्धीकरण, औपनिवेशिक शासकों से मुक्ति व स्वतंत्र मुंडा राज्य की स्थापना करना था.

विश्लेषण –  जनजातीय समाज के बीच में खुंटकुटी व्यवस्था मौजूद थी. यह व्यवस्था सामूहिक भू – स्वामित्व पर आधारित कृषि व्यवस्था थी. ब्रिटिश सरकार ने इस व्यवस्था को खत्म कर निजी भू स्वामित्व की व्यवस्था उन पर लागू कर दी. इसके साथ ही राजस्व को बढ़ा दिया गया. यहां की भूमि अनुपजाऊ थी तथा परंपरागत तरीके से कृषि कार्य करने से उपज काफी कम होती थी.जिसके कारण बढ़ी हुई राजस्व दर से लगान देने में अधिकांश कृषक असमर्थ थे. लगान देने किए लिए कृषक साहुकारों और महाजनों से ऋण लेते थे आयर वे इस ऋण जाल में फंसते चले जाते थे . जो कृषक लगान नहीं दे पाते थे उनकी भूमि अंग्रेजी शासकों के द्वारा जब्त कर लिया जाता था. अपनी ही जमीन से बेदखल होने की वजह से जनजातीय समाज में आक्रोश था.

इस शोषण और उत्पीड़न के खिलाफ इस आंदोलन का नेतृत्व बिरसा मुंडा नामक एक जनजातीय नेता ने किया. बिरसा मुंडा का जन्म 18 नवंबर 1875 को उलीहातु में हुआ था.बिरसा ने मुंडा समाज को संगठित किया .उन्होंने मुंडा समाज को परंपरागत रीति रिवाज से मुक्त होकर ईश्वर पर आस्था रखने के लिए प्रेरित किया.उन्होंने नैतिक आचरण की शुद्धता ,आत्म सुधार एवं एकेश्वरवाद का उपदेश दिया. उन्होंने अनेक देवी देवताओं को छोड़कर एक ईश्वर सिंहबोंगा की आराधना का आदेश अपने अनुयायियों को दिया. उन्होंने स्वयं को ईश्वर का प्रतिनिधि घोषित किया और कहा की ईश्वर ने मुंडा को विदेशी दासताओं से मुक्ति एवं एक सभ्य समाज की स्थापना के लिए उन्हें  भेजा है.उन्होंने अपने उपदेशों में राजनीतिक अधिकारों की बात की तथा ब्रिटिश सत्ता के अस्तित्व को अस्वीकार करते हुए अपने अनुयायियों को सरकार को लगान नहीं देने का आदेश दिया. बिरसा के उपदेशों से अनेक लोग प्रभावित हुए तथा धीरे धीरे बिरसा आंदोलन का प्रचार-प्रसार पूरे जनजातीय क्षेत्र में हो गया.

विद्रोह की शुरुआत औपनिवेशिक शोषणकारी तत्व ( ईसाई मिशनरियों, साहूकारों, अधिकारियों आदि) पर आक्रमण द्वारा किया गया. इसके उपरांत बिरसा को गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें 2 वर्ष  की सजा हुई. महारानी विक्टोरिया के हीरक जयंती के अवसर पर 1898 में बिरसा को कैद से मुक्त कर दिया गया .उन्होंने फिर से मुंडा आंदोलन को संगठित करना प्रारंभ किया तथा विदेशी शासन के विरुद संघर्ष के लिए लोगों को तैयार किया.बिरसा के अनुयायियों ने यूरोपीय मिशनरियों पर छापेमारी की. रांची, खूंटी, तमार आदि जगहों पर हिंसक झड़पें हुई. परिणाम स्वरूप सरकार द्वारा आंदोलन के दमन और बिरसा की गिरफ्तारी के लिए तैयारी शुरू कर दी. 3 फरवरी 1900 को बिरसा को पुनः बंदी बना लिया गया. जेल में हैजा की बीमारी से उनकी मृत्यु हो गयी. इसके बाद इस आंदोलन का दमन कर दिया गया.

यद्यपि इस आंदोलन का दमन कर दिया गया परंतु इसके परिणाम सकारात्मक तथा उत्साहवर्धक रहे. इस आंदोलन के उपरांत मुंडा समाज में आंतरिक सुधार की भावना जगी.

परिणाम

  • काश्तकारी संशोधन अधिनियम के तहत खुंटकुटी की कृषि व्यवस्था को कानूनी मान्यता मिल गई.
  • छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम को पास करके भूमि संबंधी समस्या का समाधान किया गया.
  • 1905 में खूंटी को तथा 1908 में गुमला को अनुमंडल बनाया गया.

 निष्कर्ष

इस प्रकार बिरसा मुंडा के नेतृत्व में हुए मुंडा विद्रोह ने जनजातीय समाज की दशा व दिशा बदल दी और वे अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो गए. आज भी बिरसा मुंडा को स्थानीय समाज में ईश्वर की तरह पूजा जाता है.


यह आंदोलन बिहार के जनजातीय क्षेत्रों में सबसे अधिक संगठित और व्यापक माना जाता रहा है। इस आंदोलन के नायक बिरसा मुंडा को भगवान के अवतार रूप में मान्यता मिली है। मुंडा जनजाति भी अन्य जनजातियों की तरह कृषि और वनों पर निर्भर होकर अपनी परंपराओं-मान्यताओं को सहेज रही थी। यह जनजाति छोटानागपुर क्षेत्र की प्रमुख जनजातियों में से एक थी और इसके लोग कभी विवादों की सुर्खियाँ नहीं बने थे। शांतिपूर्ण जीवन व्यतीत करनेवाले मुंडा लोग भी उत्पीड़न और अंग्रेजी लूटमार से बगावत पर उतरे।

विद्रोह का कारण

इनके विद्रोह का एक मुख्य कारण इनकी संस्कृति पर अन्य संस्कृतियों की परछाई का भी पड़ना था। कुछ आपसी मतभेद, जो हर जाति-जनजाति में पाए जाते हैं, मुंडा लोगों में भी रहते थे। इनका मेल-जोल हिंदुओं से भी था और इसी कारण कुछ मुंडा हिंदू परंपराओं का अनुसरण भी करने लगे थे। मतभेदों के कारण कुछ मुंडा ईसाई मिशनरियों की ओर भी चले गए, जैसा कि छोटानागपुर में जमींदार और राजाओं का शोषण-चक्र चल रहा था, तो ये लोग भी उसकी चपेट में आ गए थे। इनकी जमीन को हड़पा जा रहा था और इन पर करों का बोझ भी बढ़ता जा रहा था। फलतः ऋण का जाल भी इनको अपने शिकंजे में जकड़ रहा था। न्याय-व्यवस्था तो बस नाममात्र के लिए रह गई थी और सबसे बड़ा झटका तो मुंडाओं को तब लगा, जब न तो हिंदू मित्रों ने और न ही ईसाई मिशनरियों ने उनकी कोई सहायता की, जिनके कहने पर ये लोग अपने पारंपरिक नियमों से भी दूर हो गए थे।

मुंडा लोग इन सब बातों से पूरी तरह हतोत्साहित हो चुके थे और अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए चिंतातुर थे। ऐसे समय में बिरसा मुंडा नामक नौजवान मुंडा जनजाति के उत्थान का बीड़ा उठाकर आगे आया। उसका यह कहना था कि वह ईश्वर की आज्ञा और शक्ति लेकर मुंडाओं को उनके अधिकार और बाहरी शक्तियों से उन्हें आजाद कराने के लिए अवतार के रूप में आया है। इस युवक की वाणी में ओज था और इसमें तत्कालीन व्यवस्था पर चोट करने की क्षमता भी थी। जल्दी ही कुछ मुंडा युवक प्रभावित होकर उससे जुड़ गए। वह धार्मिक आख्यानों के माध्यम से लोगों में नवचेतना जाग्रत करता। इसी कारण वह छोटानागपुर क्षेत्र में देवदूत की तरह माना जाने लगा। उसके विचारों में लगभग सभी विषयों पर मनन करने की क्षमता थी। वह सभाएँ आयोजित कर लोगों को कुरीतियों से दूर रहने के लिए कहता, जीवन में निर्भरता को स्थान देने की बात कहता और साथ ही अपनी संगठन शक्ति का ज्ञान करने की बात कहता। उसके मित्रमंडल ने भी शीघ्र ही उसे लोगों के बीच ईश्वरीय शक्ति के रूप में स्थापित कर दिया।

बिरसा मुंडा ने सन् 1895 तक लगभग छह हजार मुंडाओं को एकत्रित कर दिया। यह अब तक का सबसे बड़ा दल था। भले ही यह मिथक था, लेकिन बिरसा को भगवान का अवतार ही माना जाने लगा। उसने लोगों को अपने उद्देश्यों से अवगत कराया, जिन्होंने मुंडा जनजाति को नए ओज से भर दिया।

उसके प्रमुख उद्देश्य इस प्रकार थे

  • अंग्रेज सरकार का पूरी तरह दमन कर देना।
  • छोटानागपुर सहित सभी अन्य क्षेत्रों से ‘दीकुओं’ को भगा देना।
  • स्वतंत्र मुंडा राज्य की स्थापना करना।

बिरसा मुंडा ने इन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए हिंसात्मक होने से भी गुरेज न करने का संदेश दिया। उसने सभी मुंडाओं को साहस के साथ इस धर्मयुद्ध में कूदने का आह्वान किया और योजना बनाकर साहूकारों, जमींदारों, मिशनरियों तथा दीकुओं आदि पर हमला कर दिया। हमला तो जोरदार था, लेकिन शासन-व्यवस्था ने इसे उतना सफल नहीं होने दिया, जितना सफल होने की बिरसा ने आशा की थी। उसे राँची में कंपनी सेना द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया, लेकिन कुछ दिनों बाद उसे मुक्ति भी मिल गई और वह फिर से अपने दल में आ मिला।

इस बार बिरसा मुंडा ने अपनी योजना को भली-भाँति सुदृढ रूप दिया और 25 दिसंबर, 1897 को, जब क्रिसमस का दिन था तथा ईसाई लोग इस दिन जश्न मनानेवाले थे, हमले के लिए चुना। इस हमले में अधिक-से-अधिक ईसाइयों को मौत के घाट उतारने का संकल्प लिया गया। निश्चित दिन मुंडा विद्रोहियों ने चारों ओर हाहाकर मचा दिया और जश्न में डूबे ईसाइयों तथा उन मुंडाओं को मार दिया गया, जो ईसाई धर्म अपना चुके थे। यह एक बड़ा नरसंहार था, जिसने ब्रिटिश शासन को झकझोरकर रख दिया। स्थानीय पुलिस बल भी इस मुंडा विद्रोह का शिकार हुआ। चारों ओर त्राहि-त्राहि मच गई, तब कंपनी ने राँची से सेना भेजी और निर्दयतापूर्वक इस विद्रोह को दबाया गया। बिरसा मुंडा और उसके साथी गया मुंडा को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया।

जेल में रहते हुए कुछ असाध्य बीमारियों और समुचित उपचार के अभाव में बिरसा मुंडा की मृत्यु हो गई। वहीं कंपनी के लिए यह विद्रोह एक सबक सरीखा साबित हुआ। उसने अपनी नीतियों में बदलाव किया। अंग्रेजों ने भूमि अधिकार संबंधी नए नियम बनाए और काश्तकारी अधिनियम के अंतर्गत पहली बार ‘मुंडारी बँटकारी व्यवस्था’ को लागू किया गया। प्रशासनिक सुविधाओं को और भी बेहतर बनाया गया। आदिवासियों के दिलों से प्रशासन के प्रति घृणा को समाप्त करने का प्रयास किया गया। सन् 1908 में गुमला अनुमंडल बनाया गया, जबकि खूटी को सन् 1905 में ही अनुमंडल बना दिया गया था। यह प्रशासन व आदिवासियों के बीच विश्वास बहाल करने के प्रयास थे।

बिरसा आंदोलन सही मायनों में एक सफल आंदोलन कहा जाता है। इसने जनजातियों में आत्मसम्मान, अधिकारों की रक्षा, धार्मिकता की रक्षा जाग्रत् करने के साथ ही इन्हें रूढ़ियों-अंधविश्वासों से दूर रहने की प्रेरणा भी दी। इसी आंदोलन ने अंग्रेज सरकार को जनजातियों के प्रति संवेदनशील रहने को विवश किया। बिरसा मुंडा ने अपने अल्प जीवन में लोगों को जाग्रत् कर दिया था और आज भी उसे भगवान बिरसा मुंडा के रूप में याद किया जाता है।

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