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पाषाण काल – विश्व के संदर्भ में

पाषाण काल को जानने के लिए हमारे पास साहित्यिक साक्ष्य उपलब्ध नही है| इसे केवल पुरातात्विक साक्ष्यों जैसे जीवाश्म, पाषाण औजार, उत्खनन आदि के आधार पर जाना जाता है| इसे प्राक इतिहास (Pre history) भी कहते है|

पाषाण काल से क्या तात्पर्य है

इस काल के इतिहास की जानकारी का प्रमुख साधन पाषाण यानी पत्थर से बने विभिन्न प्रकार के औजार है| इसीलिए इसे पाषाण काल (Stone age) कहा जाता है| वैश्विक संदर्भ में लगभग 20 लाख ई.पू. से 3000 ई.पू. के काल को पाषाण काल (Stone Age) माना जाता है| लेकिन जलवायुगत एवं दुसरे वजहों से भारत में पाषाण काल 5 लाख BC से 3000 BC तक माना जाता है|

पाषाण काल के अंतर्गत मुख्य रूप से तीन परस्पर एवं अंतर्संबंधित संकल्पनाओं का अध्ययन किया जाता है, जो इस प्रकार है:

  1. आदि मानव का आधुनिक मानव में बदलाव कैसे हुआ?
  2. हिमकाल में जीवन के लिए संघर्ष
  3. पाषाण उपकरण यानी पत्थर के औजारों का प्रयोग

आदि मानव का आधुनिक मानव में बदलाव कैसे हुआ?

मानव का इस पृथ्वी पर अस्तित्व मानव उदविकास का परिणाम है. जीव विज्ञान के अनुसार पृथ्वी पर मानव सहित सभी जीवों का विकास क्रमिक रूप से हुआ है. चार्ल्स डार्विन का सिद्धांत, प्राकृतिक चयन का सिद्धांत (Theory of natural selection), प्रजातियों की उत्पत्ति (Origin of species) तथा योग्यतम उत्तरजीवता (Survival of the fittest) के सिद्धांत को अन्य जीवों के साथ-साथ मानव पर भी लागू किया जाता है.

अतः पृथ्वी पर मानव जाति सीधा अवतरित नहीं हुआ है बल्कि अपने पूर्ववर्ती जीव रूपों से उदविकास के फलस्वरूप उसके वर्तमान स्वरूप का निर्माण हुआ है. 1859 में चार्ल्स डार्विन की पुस्तक ‘Origin of species’ में दिए गये तर्क के सामने आने के बाद मानव को उदविकास का परिणाम मान लिया गया.

तमाम प्रयोगों के बाद यह प्रमाणित हो चुका है की 20 लाख से 1000 BC के बीच प्राइमेट्स से मानव का विकास हुआ है. 20 लाख ई.पू. प्राइमेट्स (सुपर फैमली) से दो शाखाओं के रूप में मानव एवं चिम्पैंजी, गोरिल्ला आदि का विकास हुआ.

प्राइमेट्स (सुपर फैमली) की एक शाखा होमोनिडे (Hominidae) के रूप में विकसित होते हुए 10,000 BC पूर्व तक होमोसेपियंस (मानव) में परिणत हो गया जबकि प्राइमेट्स (सुपर फैमली) की दूसरी शाखा पोगिंडे (pongidae) का रूपांतरण चिम्पैंजी (chimpanzee), गोरिल्ला (Gorilla), गिबन (Gibbon), आरंगुटान (Orangutan) में हो गया.

सुपर फैमली से होमिनिडे शाखा के रूप विकसित होते हुये आदि मानव का आधुनिक मानव में बदलाव हुआ. समय के साथ मानव की मस्तिष्क क्षमता के साथ ही शारीरिक संरचना में वृद्धि होती गई. आदि मानव से आधुनिक मानव के मस्तिष्क क्षमता को निम्न सारणी में देखा जा सकता है.

मानवमस्तिष्क क्षमता
ऑस्ट्रेलोपिथिकस450-500 cc
होमो हैबिलस500-700 cc
होमो इरेक्टस850-1200 cc
नियंडरथल1200-1400 cc
होमोसेपियंस1400-1600 cc

आदि मानव का आधुनिक मानव में बदलाव को समझने की दिशा में मानव के विकास क्रम एवं विभिन्न आदि मानवों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी निम्नलिखित है.

1. ऑस्ट्रेलोपिथिकस (australopithecus) –ऑस्ट्रेलोपिथिकस (australopithecus) प्रथम उपकरण निर्माता मनुष्य था. इसकी मस्तिष्क की क्षमता (brain capacity) 450-500 cc थी. इसके बाद के मानव मस्तिष्क की क्षमता में क्रमशः और वृद्धि होती गई.

2. होमो हैबिलस (homo habilis) –होमो हैबिलस (homo habilis) का मस्तिष्क की क्षमता 500-700 cc थी. यह केवल दक्षिण पूर्व अफ्रीका में स्थित था.

3. होमो इरेक्टस (homo erectus)- थोड़ी और अधिक विकसित मस्तिष्क वाले होमो इरेक्टस (homo erectus) ने सर्वप्रथम कुल्हारी का निर्माण किया. इसकी मस्तिष्क की क्षमता 850-1200 cc था. उसने आग का भी प्रयोग करना प्रारम्भ किया और अफ्रीका के बाहर यूरोप, एशिया आदि में फ़ैल गया.

4. नियंडरथल (neanderthal) –होमोइरेक्टस के बाद के मानव नियंडरथल (neanderthal) का मस्तिष्क 1200-1400 cc था. वह भारी-भरकम शरीर वाला था तथा कर्मकांड आदि का प्रदर्शन करने लगा था. नियंडरथल ने शवों को दफनाना प्रारम्भ किया.

5. होमोसेपियंस (homo sapiens) –नियंडरथल के बाद मानव का विकास होमोसेपियंस (homo sapiens) के रूप में हुआ. यह सर्वाधिक आधुनिक मानव था. यह उच्चतर भाषा का प्रयोग करने लगा तथा इसे कलाकार मनुष्य माना गया.

आदि मानव का आधुनिक मानव में बदलाव के विकास के क्रम में उसके जींस में भी लगातार परिवर्तन होते रहे. उसकी कपाल धारिता (Skull capillary) में विस्तार हुआ, शारीरिक लक्षण उभरते गये तथा समय के साथ बौद्धिक तथा कलात्मक प्रतिभा का विकास होता गया. परिणामस्वरूप मानव में भाषा, संचार, कला, विज्ञान, दर्शन तथा संस्कृति आदि तत्वों का विकास हुआ.

मानव उदविकास के संबंध में विसरण का सिद्धांत (Theory of diffusion) भी दिया जाता है. इसके अनुसार पृथ्वी पर मानव का प्रारम्भिक विकास अफ्रीका में हुआ तथा वही से मानव प्रजाति पूरी दुनिया में फैली. अफ्रीका के रिफ्ट घाटी में ओल्डवाईगार्ज (तंजानिया) तथा तुरकाना झील (केन्या) आदि स्तरों से प्रारम्भिक मनुष्य के जीवाश्म तथा पाषाण उपकरण प्राप्त हुए है.

हिमकाल में जीवन के लिए संघर्ष

जिस समय मानव का उदविकास हो रहा था उसी समय पृथ्वी के अधिकांस भागों पर हिम का जमाव हो रहा था. हिम की आंधिया चल रही थी तथा सतह बर्फ से लगभग ढँक चुकी थी. इसे हिमयुग कहा गया. पृथ्वी पर इस प्रकार के हिमयुग समय-समय पर आते रहे है. परन्तु मानव उदविकास के हिमयुग के दौर में मानव जीवन अति दुरूह तथा कठिन स्थिति में हो गया. ऐसे में मानव को प्रकृति के साथ काफी संघर्ष करना पड़ा.

प्राकृतिक रूप से ही पृथ्वी पर अंतर्हिमयुग की शुरुआत हुई. इससे बर्फ पिघलना शुरू हुआ और बर्फ अत्यंत छोटे क्षेत्र में सिकुड़ कर रह गया. अंतिम रूप से कहा जा सकता है की मानव ने चरम परिस्थितियों में भी अपनी उत्तरजीविता कायम रखी तथा उदविकास क्रमिक रूप से होता रहा.

पाषाण उपकरणों का प्रयोग

पाषाण यानी ‘पत्थर’ पाषाण काल की सर्वाधिक महत्वपूर्ण विशेषता थी. यह आदि मानव का एकमात्र सहारा होने के साथ ही हमारे द्वारा पाषाण काल के अध्ययन के लिए भी अति उपयोगी है. यह इतने महत्वपूर्ण है की पत्थर के औजार को आधार बनाकर इस काल का अध्ययन किया जाता है.

आदि मानव ने अपने विकास के लिए प्रकृति में विद्यमान पाषाण को उपकरण के रूप में इस्तेमाल किया. जहाँ एक ओर प्रकृति ने इसके समक्ष कई गंभीर चुनौतियां पेश की वहीं पत्थर के औजार उसके मित्र के रूप में सामने आये. चूँकि इस काल के इतिहास की जानकारी का प्रमुख साधन पाषाण (पत्थर) से बने विभिन्न प्रकार के औजार है. इसीलिए इसे पाषाण काल (Stone age) कहा जाता है.

वैश्विक संदर्भ में पाषाण काल का विभाजन

वैश्विक संदर्भ में पाषाण काल ( 20 लाख BC से 3000 BC) को तीन भागों में बांटा जाता है.

  1. पुरापाषाण (Paleolithic Era) 20 लाख से 10,000 BC
  2. मध्यपाषाण (Mesolithic Era) 10000 से 6000 BC
  3. नवपाषाण (Neolithic Era) 6000 से 3000 BC

पुरापाषाण काल में मनुष्य के सामने प्रकृति की चुनौतियाँ ज्यादा गंभीर रही वह मुख्यतः भोजन इकठ्ठा करने वाला समुदाय के रूप में रहा लेकिन बाद में जैसे ही प्रकृति की चुनतियां थोड़ी कम हुई वह संग्राहक की बजाय उत्पादक बन गया.

पुरापाषाण (Paleolithic Era)

पुरापाषाण काल में मनुष्य मुख्यतः शिकारी, संग्रहकर्ता था. वह प्रकृति प्रदत्त वस्तुओं का ही प्रयोग करता था. पुरापाषाण काल में मनुष्य के सामने प्रकृति की चुनौतियाँ ज्यादा गंभीर रही. वह प्रकृति से भयभीत रहा. उसका जीवन काफी कष्टप्रद था. वैश्विक संदर्भ में पुरापाषाण काल के समय का निर्धारण 20 लाख से 10,000 BC तक किया जाता है.

मध्यपाषाण (Mesolithic Era)

मध्यपाषाण काल को पुरापाषाण और नवपाषाण काल का संक्रमण काल माना जाता है. इसमें दोनों काल की विशेषता रही. यह कहा जा सकता है की पुरा पाषाण कालिक मनुष्य इस समय नव पाषाण काल की विशेषताओं को प्राप्त करने की ओर बढ़ रहा था. वैश्विक संदर्भ में मध्यपाषाण काल के समय का निर्धारण 10000 से 6000 BC तक किया जाता है.

नवपाषाण (Neolithic Era)

नवपाषाण काल आते-आते मनुष्य कृषि, पशुपालन, मृदभांड निर्माण, स्थायी आवास आदि गतिविधियों में संलंग्न हो गया. उसके ये नवीन कार्य उत्पादक श्रेणी के थे तथा मानव विकास के लिए अति महत्वपूर्ण थे. वैश्विक संदर्भ में मध्यपाषाण काल के समय का निर्धारण 6000 से 3000 BC तक किया जाता है.

खाद्य संग्राहक से उत्पादक बनने तक का सफर
मनुष्य ने भोजन प्राप्त करने के अपने तरीके में बदलाव क्यों किया, इसके पीछे क्या कारण था, इस पर विभिन्न इतिहासकारों का अलग-अलग मत है. आर पेम्पली, गार्डन चाइल्ड आदि का मानना है की ऐसा जलवायु में परिवर्तन के कारण हुआ. वहीं विनफोर्ड, मार्क कोहेन जैसे इतिहासकार इसके पीछे जनसंख्या वृद्धि को वजह मानते है.
इनके अनुसार जनसंख्या में वृद्धि के कारण भोजन के लिए दबाब बढ़ा तथा इससे मनुष्य धीरे-धीरे उत्पादनकर्ता के रूप पशुओं को पालने तथा कृषि करने लगे
मनुष्य के उत्पादक बनने के पीछे बेडवुड जैसे इतिहासकार सांस्कृतिक कारणों को वजह मानते है, वहीं बारबरा वेंडर का मानना है की ज्ञान बढ़ने के साथ मनुष्य ने उत्पादन करना प्रारम्भ किया.

वजह चाहे जो भी रही हो, लेकिन मनुष्य द्वारा उत्पादन का कार्य करना एक महत्वपूर्ण बदलाव था. निष्कर्ष तो यह प्रतीत होता है की इतने बड़े बदलाव के पीछे कोई एक कारक जिम्मेदार नहीं हो सकता. केवल जलवायु परिवर्तन ही शिकारी संग्रहकर्ता मनुष्य के उत्पादक मनुष्य में तब्दील होने का एकमात्र कारण नहीं हो सकता. कम या अधिक, इसमें सभी कारकों की महत्वपूर्ण भूमिका थी.

पाषाण काल के जिस तरह के मानव जीवाश्म अफ्रीका, यूरोप आदि दुसरे देशों में प्राप्त हुए है, उस प्रकार के साक्ष्य भारत में नहीं प्राप्त होते है. इसके पीछे बड़ी वजह जलवायु गत समस्या है. भारत में भी पाषाण काल के मानव का अध्ययन पुरातात्विक स्त्रोतों के आधार पर किया जाता है.

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