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जल प्रदूषण के मानक

जल का अधिकांश भाग लगभग 97% तो महासागरीय जल के रूप में है और अधिक अम्ल होने के कारण नहाने धोने के काम में नहीं आ सकता। बचे हुए 3% का भी अधिकांश हिस्सा मानवीय पहुंच से दूर है| इस तरह से जल का 1% से कम हिस्सा ही पेय योग्य है। ऐसे में जल प्रदूषण की समस्या अत्यंत गंभीर है|

जल प्रदूषण के मानक के तौर पर कुछ महत्वपूर्ण घटकों का प्रयोग किया जाता है जिनमें प्रमुख हैं: जैविक ऑक्सीजन मांग (बायो ऑक्सीजन डिमांड), रासायनिक ऑक्सीजन डिमांड (chemical oxygen demand), डी ओ (डिसोल्वड ऑक्सीजन-घुलित ऑक्सीजन), पीएच मान, भौतिक आधार, मौजूद अन्य अशुद्धता|

जैविक ऑक्सीजन मांग (बायो ऑक्सीजन डिमांड – BOD)

यह जल में उपस्थित ऑक्सीजन कि वह मात्रा होती है जो जल में उपस्थित सूक्ष्मजीवों के उपापचय क्रिया के लिए आवश्यक होती है। जैविक ऑक्सीजन मांग का अधिक होना जल प्रदूषण का संकेत है।

किसी भी जल में अपशिष्ट की मात्रा के हिसाब से उसमें अपघटक जीवो की उत्पत्ति होती है। ये अपघटक जीव अपशिष्ट का निपटान करते हैं, जिससे एक समय बाद जल स्वच्छ हो जाता है। हालांकि इस क्रिया में इस अपघटक जीवो के शरीर में उपापचय क्रिया संपन्न होती है जिससे जल में मौजूद ऑक्सीजन का उपयोग हो जाता है। इसे ही जैविक ऑक्सीजन मांग या बायो ऑक्सीजन डिमांड कहते हैं। ऐसे में यदि बीओडी का अधिक होना इस बात का संकेत है कि जल में प्रदूषक तत्व ज्यादा है जिसके लिए अपघटक सूक्ष्म जीव की संख्या अधिक है और उनके द्वारा ऑक्सीजन की मांग अधिक की जा रही है।

जैविक ऑक्सीजन मांग के अधिक होने से जल के बाकी जीव जैसे कि मछली आदि के लिए ऑक्सीजन की कमी हो जाती है। इसके अलावा ऑक्सीजन की कमी होने से स्वतः रूप से ch4, h2s, nh3 आदि की मात्रा बढ़ जाती है| इससे जल में दुर्गंध की समस्या उत्पन्न होती है।

इस तरह स्पष्ट है कि बीओडी जल प्रदूषण के मानक निर्धारण का महत्वपूर्ण घटक है। सामान्य रूप से नदियों में इसका स्तर 10 मिलीग्राम प्रति लीटर होना चाहिए।

घुलित ऑक्सीजन (डीओ-डिसोल्वड ऑक्सीजन)

यह जल में घुली अवस्था में उपस्थित ऑक्सीजन की मात्रा है। इसके कारण जलीय जीवो में स्वसन एवं उपापचय की क्रिया संपन्न होती है। ऐसे में यह जल में प्रदूषण निर्धारण का महत्वपूर्ण घटक है।

घुलित ऑक्सीजन की मात्रा घटने से जलीय जीवो के जीवन का संकट उत्पन्न हो जाता है क्योंकि उनके श्वसन कार्य में बाधा उत्पन्न होने लगती है| पेयजल में डीओ की मात्रा 5 मिलीग्राम प्रति लीटर और नहाने योग्य पानी में इसकी मात्रा 4 मिलीग्राम प्रति लीटर निर्धारित की गई है। इससे कम मात्रा होने पर जल को प्रदूषित माना जाता है। स्पष्ट है कि यह भी जल प्रदूषण के निर्धारण का महत्वपूर्ण घटक है।

रासायनिक ऑक्सीजन मांग (केमिकल ऑक्सीजन डिमांड- सीओडी)

यह जल प्रदूषण को निर्धारित करने वाला एक महत्वपूर्ण घटक है। यह कुल ऑक्सीजन का वह मांग है जो जल में उपस्थित कुल अकार्बनिक पदार्थ- बायोडिग्रेडेबल और नॉन बायोडिग्रेडेबल के ऑक्सीकरण के लिए आवश्यक है। सरल शब्दों में कहें तो जल में उपस्थित अकार्बनिक पदार्थ द्वारा उत्पन्न किए गए ऑक्सीजन की मांग को रसायनिक ऑक्सीजन मांग या केमिकल ऑक्सीजन डिमांड- सीओडी कहते हैं।

सीओडी का बहुत अधिक होना जल प्रदूषण का संकेत है| इसकी अधिकतम मात्रा 20 मिलीलीटर प्रति लीटर है और इससे अधिक सीओडी वाला जल प्रदूषित माना जाता है| स्पष्ट है कि यह भी जल प्रदूषण का महत्वपूर्ण घटक है|

पीएच मान

पीएच किसी विलयन में अम्ल या क्षारकता का एक माप है। इसके आधार पर जल की शुद्धता एवं प्रदूषण का आकलन किया जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार पर जल का पीएच मान 7 से 8.5 के बीच होना चाहिए। इससे कम या अधिक पीएच मान वाला जल प्रदूषित माना जाता है। इस तरह पीएच मान के आधार पर भी तय किया जाता है कि जल प्रदूषित है अथवा नहीं।

भौतिक आधार

भौतिक आधार को भी जल की गुणवत्ता निर्धारण के घटक के रूप में स्वीकार किया गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार पेयजल स्वच्छ, शीतल, स्वादयुक्त तथा गंधरहित होना चाहिए।

अन्य अशुद्धता

जल स्वच्छ साफ सुथरा होना चाहिए लेकिन उनमें मौजूद अशुद्धता से इनकार नहीं किया जा सकता। क्योंकि विभिन्न तत्व प्राकृतिक और अप्राकृतिक रूप से इसमें पाए जा सकते हैं। इसके बाद भी यह अशुद्धता एक सीमा से अधिक पाए जाने पर जल प्रदूषित माना जाता है। नीचे दिए गए सारणी में जल में उपस्थित अशुद्धियों की उच्चतम निर्धारित सीमा को देखा जा सकता है|

शुद्धताउच्चतम निर्धारित सीमा (मिलीग्राम प्रति लीटर)
सल्फेट200
chlorides200
calcium75
zinc5
लोहाO.10
तांबा0.05
मैंगनीज30
साइनाइड0.05
शीशा0.01
कैडमियम0.05
पारा0.001
फिलोनिक पदार्थ0.001
मैग्नीशियम30
आर्सेनिक0.05

उपरोक्त प्रमुख कारकों के आधार पर तय किया जाता है कि कोई जल प्रदूषित है अथवा नहीं। जल प्रदूषण एक गंभीर समस्या है| विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार 50 से 60% व्यक्ति प्रदूषित जल के कारण होने वाले रोगों से पीड़ित हैं। भारत जैसे देश में 80% बीमारियां अशुद्ध जल के सेवन से होती है। वैज्ञानिकों के अनुसार भारत में उपलब्ध जल संसाधन का 70% भाग प्रदूषित है इसमें 30% जल विषाक्तता के स्तर तक पहुंच गया है। ऐसे में जल प्रदुषण को रोकने कि दिशा में गंभीरता से प्रयास किया जाना चाहिए, जिसमें जनजागरूकता सर्वाधिक महत्वपूर्ण है|

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