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बिहार में राईट टू सर्विस एक्ट

आम जनता का यह अधिकार कि वह कुछ सार्वजनिक सेवाओ को तय समयावधि में पाने का हक रखती है – ‘सेवा का अधिकार’ कहलाता है। इसके तहत तय समयसीमा में काम का निबटारा करना सम्बंधित अधिकारियों की बाध्यता होती है। समयसीमा के अंदर सेवा नहीं उपलब्ध करानेवाले अधिकारियों के लिए दंड का प्रावधान किया जाता है।

भारत में मध्य प्रदेश राज्य ने लोक सेवा गारंटी अधिनियम 2010 (म.प्र.) के द्वारा सबसे पहले यह कानून लागू किया। अब बिहार, पंजाब, झारखण्ड उत्तराखंड में भी यह नियम लागू है। दिल्ली और केरल सरकारें यह नियम लागू करने जा रही हैं। बिहार में इसे बिहार लोकसेवा अधिकार अधिनियम 2011 के नाम से भी जाना जाता है.

15 अगस्त 2011 से बिहार में लागू यह विधेयक आम लोगों को निर्धारित समय सीमा के भीतर कुछ चुनी हुई लोक सेवाएं उपलब्ध कराने को सुनिश्चित करने वाला कानून है। इसके अंतर्गत राज्य सरकार ने फ़िलहाल दस विभागों से जुड़ी 50 सेवाएँ सूचीबद्ध की है। इनमें राशन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस और ज़मीन-जायदाद के दस्तावेज़ दिए जाने के अलावा आवास, जाति, चरित्र और आमदनी से संबंधित प्रमाण पत्र दिए जाने जैसी सेवाएँ प्रमुख हैं।

इस अधिनियम का सबसे ख़ास प्रावधान यह है कि तय की गई अवधि में आवेदकों को लोक सेवाएँ उपलब्ध नहीं करा सकने वाले सरकारी कर्मचारी या अधिकारी दंडित होंगे। इसके अंतर्गत ढाई सौ रूपए से लेकर अधिकतम पांच हज़ार रूपए तक के आर्थिक दंड का प्रावधान किया गया है और ज़रूरत पड़ी तो विभागीय कार्रवाई का डर दिखाया गया है। लेकिन इस क़ानून के तहत दोषी कर्मचारी या अधिकारी को दंडित करने के किए गए ये प्रावधान बहुत ढीले, मामूली और बेअसर जैसे हैं।

सरकारी दफ़्तरों में कर्मियों और ज़रूरी साधनों की कमी और सबसे ज़्यादा आवेदनों पर कार्रवाई की निगरानी ठीक से नहीं हो पाने की आशंकाएँ बनी हुई हैं। इसके अलावा इस क़ानून का सबसे कमज़ोर पक्ष ये माना जा रहा है कि जो तय समय-सीमा होगी, उसकी अंतिम तिथि से पहले कोई लोक सेवा उपलब्ध कराने में रिश्वत का खेल हो सकता है। जैसे कि दो-तीन दिनों में किसी को आवासीय प्रमाणपत्र लेना अत्यंत ज़रूरी हो, तो वह 21 दिनों की निर्धारित समय-सीमा तक इंतज़ार करने के बजाय घूस देकर जल्दी काम करा लेने को विवश हो सकता है।

 नीतीश सरकार अपने शासन की स्थापना काल से ही बिहार को भ्रष्टाचार से मुक्त कराने को प्रयासरत रही है। बिहार के पिछड़ापन का महत्वपूर्ण घटक भ्रष्टाचार रहा है। इसलिए नीतीश सरकार ने बिहार को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने की घोषणा की है और इसी उद्देश्य से राज्य में ‘स्पेशल कोर्ट एक्ट’ लाया था तथा भ्रष्टाचार रोकने में सख्ती लाने के लिए ‘राइट टू सर्विस एक्ट’ लागू किया गया है.

भ्रष्टाचार के माध्यम से अर्जित संपत्ति को ज़ब्त करने के लिए स्पेशल कोर्ट एक्ट के बारे में राज्य सरकार ने आदेश जारी कर दिया, किंतु इसके लिए सरकार को लंबी प्रतीक्षा करनी पड़ी। यह प्रस्ताव महीनों तक केंद्र सरकार के पास मंजूरी के लिए पड़ा रहा। काफी प्रयास के बाद अंततः हरी झंडी मिली थी। बिहार में उड़ीसा के पैटर्न पर इस एक्ट का निर्माण किया गया था। इससे अनुचित तरीकों से लोक सेवकों द्वारा अर्जित की गई संपत्ति सरकार जब्त कर सकेगी।

 जल्दी ही इसके लिए विशेष अदालत के गठन की दिशा में पहल पर जोर दिया गया है। भ्रष्टाचार पर नियंत्रण के लिए नीतीश सरकार ने स्पेशल विजिलेंस यूनिट का भी गठन कर रखा है । मगर सरकार भ्रष्टाचारियों के खिलाफ और कारगर हथियार चाहती थी ताकि उनकी नाजायज़ संपत्ति को भी जब किया जा सके।

राज्य में भ्रष्टाचार को जड़ से समाप्त करने के लिए मुख्यमंत्री ने विधानसभा के बजट सत्र 2011-12 में राईट टू सर्विस विधेयक लाने की घोषणा की। चाहे थाने से पासपोर्ट के लिए जांच का मामला हो, पेंशन, छात्रवृत्ति, बिजली कनेक्शन या जनता से जुड़े ऐसे दूसरे मसले हो, लोक सेवकों को यह सब काम समयबद्ध तरीके से पूरा करना होगा। काम निपटाने में अगर विलंब हुआ तो जिम्मेदार अधिकारी कर्मचारी को जेब से हर्जाना अदा करना होगा अर्थात इस एक्ट के द्वारा अधिकारी वर्ग को जिम्मेवार, उत्तरदायित्व पूर्ण एवं कर्तव्यनिष्ठ बनाने का प्रयास किया गया है.

इस एक्ट के पास होने के बाद सूचना के अधिकार का स्वरूप फलदाई सिद्ध हुआ है और व्यक्ति अपने अधिकारों का समुचित प्रयोग कर सकता है. दरअसल भारी जनादेश के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जनता से किए वायदों को पूरा करने के एजेंडे में जुट गए हैं. यह उसी का हिस्सा है. नीतीश कुमार ने चुनाव प्रचार अभियान के दौरान भ्रष्टाचारियों के घरों का स्कूल में तब्दील कर देने की घोषणा की थी जिसका राज्य के लोगों ने काफी स्वागत किया था 

राज्य में भ्रष्टाचार का आलम यह है कि बीपीएल में नाम दर्ज कराने के लिए गरीब लोगों को रिश्वत देनी पड़ती है अर्थात बिहार में भ्रष्टाचार स्तर पर चल चुका है योजना विभाग की समीक्षा के दौरान ज्ञात हुआ कि चालू वित्तीय वर्ष की योजना राशि अब तक 42 पैसा ही खर्च हो पाया है. मुख्यमंत्री ने निर्देश दिया कि प्राथमिकता के आधार पर बिजली भवन और खाद्य सुरक्षा के क्षेत्र में खर्च किए जाएं वहीं विभागीय सचिव जिलों का दौरा कर देखेंगे कि काम सही तरीके से और गति के साथ हो रहा है या नहीं. अतः इस एक्ट द्वारा बिहार को जमीनी स्तर से भ्रष्टाचार मुक्त कराया जा सकता है. 

इस एक्ट में वे सभी प्रावधान सम्मिलित हैं जो आम जनता के प्रत्यक्ष जीवन से संबंधित है. व्यक्ति निश्चित समय अवधि में अपने कार्य को अंजाम दे सकेगा और उसे बार बार चक्कर काटने से छुटकारा मिलेगा फलत आशा की जा सकती है कि यह एक्ट निश्चित रूप से सकारात्मक रंग दिखाएगा और बिहार को भ्रष्टाचार से मुक्त कराने में मदद करेगा जिसके परिणाम स्वरूप बिहार विकसित राज्यों में अपना नाम सुनिश्चित कर सकेगा।

ये भी पढ़ सकते हैं – बिहार लोक सेवाओं का अधिकार अधिनियम 15 अगस्त 2011 से लागू

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