Home BPSC मुख्य परीक्षा GS पेपर 1 - भारत का आधुनिक इतिहास टैगोर के सामाजिक और राजनीतिक चिंतन संबंधी विचार की व्याख्या करें

टैगोर के सामाजिक और राजनीतिक चिंतन संबंधी विचार की व्याख्या करें

विश्व साहित्य क्षेत्र में टैगोर का नाम सदैव श्रद्धा के साथ लिया जाता है। उनकी विशेषता थी प्रकृति का सजीव चित्रण एवं जीवन के विभिन्न पहलुओं का मार्मिक वर्णन । वे मानवता के प्रति चिंतित सौंदर्य के प्रेमी थे। वे अत्यधिक सार्वभौमिक विचारशील तथा पूर्व व्यक्तित्व के मालिक थे। भारत में व्याप्त विभिन्न सामाजिक बुराइयों तथा उसकी दास्तां से वह बहुत दुखी थे। उन्होंने भारत को बुराइयों एवं दासता से मुक्त कराने हेतु जीवनपर्यंत संघर्ष  किया तथा स्वयं को गांधी नेहरू जैसे भारत के महानतम सपूतों के समकक्ष अपने को लाकर खड़ा किया।

टैगोर के चिंतन पर प्रभाव टैगोर के चिंतन पर सबसे पहला प्रभाव उनके पिता देवेंद्र नाथ की चारित्रिक श्रेष्ठता और गहन धार्मिक आस्था का पड़ा। जिससे उन्होंने अपने विचारों में जीवन का एकता और ब्राह्मण की सभ्यता को आत्मसात किया। टैगोर के साहित्य पर वैष्णव कवियों का स्पष्ट प्रभाव परिलक्षित होता है । टैगोर विज्ञान के क्षेत्र में पाश्चात्य सभ्यता द्वारा की गई प्रगति से प्रभावित है तथा इसे उन्होंने मानवता केंद्रित पाश्चात्य सभ्यता का योगदान बताया। टैगोर अपने समय के तीन प्रमुख आंदोलनओ राजा राम मोहन राय द्वारा ब्रह्म समाज के माध्यम से किया गया धार्मिक सामाजिक सुधार आंदोलन,  बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा साहित्य के क्षेत्र में की गई क्रांति तथा 18 साल सावन का पल्लव जिसमें उनका परिवार तथा संबंधित है। इन सारी घटनाओं से पूरी तरह प्रभावित हुए थे । इन प्रभावों के कारण उनमें अंधविश्वास और रूढ़ियों के प्रति आलोचनात्मक भाव का जन्म हुआ था।

टैगोर मानवतावादी कवि के रूप में टैगोर के काव्य ने स्पष्ट रूप से अत्यंत समृद्ध काव्यात्मक विचार समाज को दिए हैं।  टैगोर ने विश्व काव्य धारा में एक अभिनव और अनूठा काव्य प्रवाह लेकर आए थे जिसकी विशेषता थी सार्वभौमिकता। उनकी साधना में व्यक्ति और सर्व भौमिक सत्ता के बीच सामंजस्य की मूल संकल्पना पाई गई है, जो कि भारतीय संस्कृति का आधार है। टैगोर के हृदय में क्रियात्मक सौंदर्य के प्रति गहरा झुकव था। टैगोर ने विश्व के समक्ष उपनिषद के सच्चे अर्थ को उजागर किया। निष्क्रिय जीवन और स्थिर चिंतन संसार के प्रति उदासीनता की जगह टैगोर ने जीवन की दृढ़ता तथा अमरता पर जोर दिया था ।जिन्होंने उन्होंने उपनिषदों में से ग्रहण किया था।

टैगोर का शिक्षा के ऊपर विचारटैगोर ने इस तथ्य को अत्यंत निकटता से महसूस किया था कि विद्यालय की प्रणाली छात्रों को समाज और प्रकृति से अलग कर देती है और असामान्य स्कूल का वातावरण तैयार करती है इसीलिए उन्होंने शांतिनिकेतन में एक विद्यालय खोलने का निर्णय लिया था । जिसका उद्देश्य शिक्षा को एक प्रभावशाली औजार बनाना था और आनंददायक अनुभव द्वारा बच्चों को शिक्षा देना था टैगोर ने शिक्षण संस्थाओं को ग्रामीण पद्धति से जोड़ दिया जो कि प्राचीन काल की तपोवन शिक्षा का ही एक रूप था । उन्होंने एक तर्क प्रस्तुत किया कि जीवन खुले आकाश के नीचे  बिताना बच्चों के शरीर और मन दोनों के लिए लाभकारी हैं । इससे बच्चों के व्यवहारिक ज्ञान की परख होती है।

टैगोर का मानना था कि बनावटी शहरी वातावरण बच्चों के मूल्यों का ह्रास करते हैं। यह आध्यात्मिक वृद्धि में भी बाधक हैं। खुली हवा में बच्चों को जब पढ़ाया जाता है और प्रकृति के साथ जब संपर्क बढ़ता है तो शिक्षा ज्यादा आनंददायक बन जाता है। और सबसे बढ़कर यह है कि अशिक्षा को सस्ता बनाता है टैगोर चाहते थे कि स्कूलों में कुछ ऐसा प्रावधान हो जिससे नैतिक चरित्र का निर्माण करने में सहायता मिले टैगोर यही चाहते थे कि शिक्षण की प्रक्रिया में कुछ सुधार हो तथा इसको इस ढंग से साकार किया जाए कि यह ज्यादा आनंददायक और रुचिकर हो। इस आधारभूत सुधार के लिए टैगोर ने ऐसी आवासीय संस्थाओं की आवश्यकता को महसूस किया । जहां शिक्षक छात्र साथ-साथ रह सके तथा अपने बीच व्यक्तिगत संबंध स्थापित कर सकें। टैगोर ने ब्रह्मचर्य व्यवस्था को फिर से बहाल करना चाहा । जहां छात्रों को अनुशासन की शिक्षा दी जा सके और शिक्षा के लिए आधार तैयार किया जाए। टैगोर की योजना में अनुशासन और आवासीय प्रणाली एक दूसरे के पूरक थे । अतः दोनों को मिलाकर चलना ही विकास का मार्ग तैयार करता है।

टैगोर के अनुसार शिक्षा का चार बड़ा उद्देश्य था –

पहला , मनुष्य के संपूर्ण प्रकृति को विकसित करना ।

दूसरा , छात्रों को अपने आप को अभिव्यक्त करने में सक्षम बनाना टैगोर ने सोचा था कि एक ऐसी शिक्षा प्रणाली व्याप्त हो जहां छात्रों को भावों पंक्तियों में वर्णित ध्वनि तथा शरीर के क्रियाकलापों द्वारा व्यक्त करने का समाज में अवसर मिले। जैसे चित्रकला , संगीत और नृत्य द्वारा ललित कला का प्रशिक्षण न सिर्फ भावनात्मक क्षमता को विकसित करता है बल्कि छात्रों को शब्दों के अतिरिक्त अन्य माध्यम के द्वारा भी अभिव्यक्त करने में मदद करता है। शिक्षा की उपयोगिता सिर्फ तथ्यों को एकत्रित करना मात्र नहीं बल्कि मनुष्य को समझना तथा खुद को दूसरे मनुष्य के समझने योग्य बनाना है। अतः टैगोर ने ललित कला को महाविद्यालयों और विद्यालयों में विज्ञान तथा मानविकी विषयों के समकक्ष ही मान्यता पर जोर दिया था। टैगोर ने ललित कला और संगीत को राष्ट्रीय अभिव्यक्ति का सबसे बड़ा स्रोत माना इसके बिना लोग अंधेरे में रहते हैं ।

तीसरा, छात्रों को इस लायक बनाना कि वे खुद ज्ञान की उत्पत्ति कर सके जो कि शिक्षण संस्थाओं का प्रमुख कार्य है।

चौथा , स्थानीय लोगों की सामाजिक आर्थिक समस्याओं के लिए ज्ञान के प्रयोग को सुनिश्चित बनाना।

टैगोर की ग्रामीण पुनर्रचना टैगोर के अनुसार शिक्षा के उद्देश्यों में से एक यह भी बहुत जरूरी उद्देश्य है कि इसी में शैक्षणिक स्थान से प्राप्त ज्ञान का प्रयोग स्थानीय लोगों के भौतिक कल्याण में लगाना। उन्होंने संस्थाओं और उसके आसपास के गांवों की सामाजिक आर्थिक व्यवस्था के बीच स्वभाव गत संबंधों के बारे में विचार किया था। इसके अनुसार लियोनार्ड की सहायता से शांतिनिकेतन में ग्रामीण कल्याण विभाग जोड़ा गया। इसके द्वारा आसपास के गांवों में ग्राम पुनर्रचना का कार्य चलता रहा। इस योजना के लिए आर्थिक सहायता लियोनार्ड ने ही किया था जो कि एक अंग्रेज विद्वान थे। उसने योजना की क्रियान्वयन पर भी नजर रखी थी।ग्रामीण पुनर्रचना के कार्य को देखते हुए टैगोर ने दो बातों पर जोर दिया था। पहला, इन कार्यों को पूरा करने में बाहरी व्यक्तियों की सहायता नहीं ली जानी चाहिए। तथा दूसरा, की ग्रामीण समस्याओं को समाप्त करने में समेकित दृष्टि अपनाई जानी चाहिए ।इसे सिर्फ ज्ञान के द्वारा ही नहीं बल्कि शारीरिक श्रम तथा ग्रामीण मजदूरों की सहायता से दूर किया जाना चाहिए। इस विकेंद्रीकरण की योजना के बाद सामुदायिक विकास योजना को प्रभावित किया जाना चाहिए। इससे एक विधि का प्रतिपादन किया गया इसके प्रभाव से कृषि का ढर्रा ही बदल गया कुटूर उद्योग और व्यवसायिक शिक्षा को प्रोत्साहन मिलने लगा आंध्रा इसके माध्यम से टैगोर ने ग्रामीण पूरा रचना के कार्यों में लोगों को ज्ञान के प्रकाश से आलोकित किया।

टैगोर के राज्य के संबंध में विचारटैगोर का राज्य एवं उसकी संस्था में घोर अविश्वास था और वे इसके प्रभाव को कम किए जाने के पक्षधर थे । उनके अनुसार मानव विकास केवल राजनीतिक कार्यों के माध्यम से सुनिश्चित नहीं किया जा सकता ।टैगोर का मानना था कि राजे द्वारा जनमानस को शक्ति एवं प्रेरणा दी जानी चाहिए। परंतु इसे अपने ऊपर कार्यों को नहीं ले जाना चाहिए जिन्हें करने‌ का उत्तरदायित्व जनमानस का है। टैगोर प्राचीन भारत में विद्यमान व्यवस्था के प्रशंसक थे जिसमें राज्य पर अतिरिक्त भार डाले बिना जनमानस स्वता समुदाय के कल्याण के दायित्व को पूरा करता था । इस प्रकार उन्होंने राज्य और समाज के मध्य स्पष्ट अंतर किया और समाज को राज्य की तुलना में अधिक महत्व दिया है । टैगोर मानव अधिकारों के पक्के हिमायती थे। यह अपने अधिकार के लिए याचना करने के विरुद्ध थे । उनका मानना था कि व्यक्ति के अधिकार रचनात्मक पीड़ा तथा धैर्य युक्त आत्म त्याग के द्वारा स्वत: अपने लिए पैदा होने चाहिए । टैगोर अधिकार का संबंध आत्मा से मानते थे। टैगोर का मत था कि भारत में स्वराज की आधारशिला जनता की आत्मनिर्भरता उनके पुरुषार्थ पर और उसको प्रदान किए जाने वाले न्याय पर निर्भर करती है। विशेष रूप से गांव की आत्मनिर्भरता पर ही देश का भविष्य निर्भर है। उनका मानना था कि राज्य का भला तभी संभव है जब देश की निर्धनता से दबी जनता में आशा की किरण जागृत हो।

टैगोर का राष्ट्रवाद एवं अंतरराष्ट्रीयतावाद

टैगोर एक राष्ट्रवादी होने के साथ ही साथ एक अंतर राष्ट्रवादी भी थे । वह संकुचित राष्ट्रवाद में विश्वास नहीं करते थे बल्कि उनका विश्वास विश्व बंधुत्व में था। वह साम्राज्यवाद से घृणा करते थे। इसी क्रम में अंग्रेजों के व्यवहार से क्षुब्ध होकर उन्होंने अपना स्वदेशी भंडार प्रारंभ किया जिसका उद्देश्य भारत के उद्योगों तथा कला का प्रदर्शन एवं प्रोत्साहन मात्र था। वे राष्ट्रवाद का अर्थ किसी भी व्यक्ति द्वारा अपने देश की सभ्यता संस्कृति कला और संगीत साहित्य तथा पूर्वजों की गौरवमयी परंपराओं के प्रति श्रद्धा पूर्ण समर्पण को मानते थे। टैगोर अध्यात्मिक मानवतावाद की अवधारणा के प्रशंसक थे। वे राष्ट्रवाद के उस रुप को स्वीकार करते थे जिसमें सामाजिक संघर्ष, जातीयता, धार्मिक उन्माद और राजनैतिक संकीर्णता तथा संप्रदायिकता का समावेश नहीं हो। इन्हीं कारणों से वे खिलाफत आंदोलन के विरुद्ध थे । वह विश्व बंधुत्व की भावना से ओतप्रोत एक सच्चे अंतरराष्ट्रीयवादी थे। उन्होंने एक विश्व सरकार की परिकल्पना की थी ।उनका मत था कि यदि पूर्वी और पश्चिमी सभ्यताओं का मिश्रण कर दिया जाए तो विश्व शांति, विश्व एकता तथा विश्व सरकार की स्थापना संभव है । अपनी इसी आदर्श कल्पना को साकार करने हेतु उन्होंने विश्व भारती की नींव रखी थी। अंततः टैगोर का यही सपना संयुक्त राष्ट्र संघ के रूप में विश्व पटल पर उभरा । टैगोर का विचार था कि प्रत्येक देश तथा व्यक्ति को अपने गौरवशाली व्यक्तित्व के विकास के लिए कुछ ना कुछ अधिकार मिलने चाहिए और उसमें इतनी सामर्थ्य तो होनी चाहिए कि वे अपने अधिकारों के लिए लड़ सके । उसका मानना था कि राष्ट्र को राज्य की जनता के हित में कार्य करना चाहिए । टैगोर का सपना था कि अंतरराष्ट्रीयवाद के माध्यम से विश्व की विभिन्न संस्कृतियों का संगम करा के एक ऐसी नवीन संस्कृति की धारा प्रवाहत की जाए जो कि सभी के लिए पूजनीय हो तथा विश्व मानवता के समग्र विकास में सहायक हो।

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