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भारत में कठपुतली

भारत में कठपुतली कला का सबसे पहला वर्णन तमिल ग्रन्थ शिलाप्पदिकारम में मिलता है| इसमें सामान्यतया कलाकार द्वारा किसी कहानी को गद्य या पद्य के रूप में वर्णन करते हुए कठपुतली को दृश्य रूप में प्रदर्शित किया जाता है| भारत में कठपुतली प्रदर्शन का विषय पौरोणिक साहित्य और किवदंतियों, कहानियों आदि से संबंधित रहा है|

भारत में कठपुतली कला को मुख्य रूप से चार प्रकार में विभाजित किया जा सकता है:

धागा कठपुतली (String Puppetry)

इसमें कठपुतली के अंगों को धागे से जोड़कर नियंत्रित किया जाता है| कुछ प्रसिद्ध धागा कठपुतली के उदाहरण के तौर पर राजस्थानी कठपुतली, ओड़िसा के कुनढेई, कर्नाटक के गोम्बेयेत्ता और तमिलनाडु के बोम्मालट्टा का नाम लिया जा सकता है|

छाया कठपुतली (Shadow Puppetry)

इसमें छाया के द्वारा प्रदर्शन किया जाता है| छाया के निर्माण के लिए हथेलियों को एक परदे के सम्मुख रख कर पीछे से तीव्र प्रकाश डाला जाता है| कुछ प्रसिद्ध छाया कठपुतली के उदाहरण के तौर पर आन्ध्र प्रदेश के तोलु बोम्मालट्टा, ओड़िसा के रावण छाया, कर्नाटक के तोगलू गोम्बेयेत्ता का नाम लिया जा सकता है|

दस्ताना कठपुतली (Glove Puppetry)

इसे भुजा अथवा हथेली कठपुतलियों के रूप में भी जाना जाता है| इसमें कठपुतली का सिर कपडे या लकड़ी से बना होता है तथा गर्दन के नीचे से दो हाथ बाहर की तरफ निकले हुए अवस्था में रहते है| शेष शरीर के रूप में लहराता घाघरा होता है| इसमें कलाकार द्वारा हाथों से कठपुतली के विभिन्न प्रकार कि गतिविधियों का संचालन किया जाता है| दस्ताना कठपुतली के उदाहरण के तौर पर केरल के पावाकुठू का नाम लिया जा सकता है|

छड़ कठपुतली (Rod Puppetry)

यह दस्ताना कठपुतली का ही विस्तृत रूप प्रतीत होता है| यह दस्ताना कठपुतली से बड़ी होती है तथा नीचे लगाये गए छड़ों पर आधारित तथा संचालित होती है| कुछ प्रसिद्ध छड़ कठपुतली के उदाहरण के तौर पर बिहार के यमपूरी, उड़ीसा के छड़ कठपुतली तथा पश्चिम बंगाल के पुत्तलनाच का नाम लिया जा सकता है|

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