संसद

राष्ट्रपति, लोकसभा और राज्यसभा संसद के प्रमुख अंग है. लोकसभा और राज्यसभा के सदस्यों को संसद सदस्य अर्थात सांसद कहा जाता है. भारतीय संविधान के भाग 5 में अनुच्छेद 79 से 122 तक संसद के बारे में बात की गई है

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संसद सदस्य बनने की अहर्ताएं (योग्यताएं)

संविधान द्वारा निर्धारित

भारतीय संविधान में संसद सदस्य बनने के लिए कुछ न्यूनतम योग्यताओं एवं शर्तों का निर्धारण किया गया है. ये निम्नलिखित है –

नागरिकता संबंधी शर्तें: सांसद बनने की इच्छा रखने वाले व्यक्ति को अनिवार्य रूप से भारत का नागरिक होना चाहिए.

आयु संबंधी शर्ते: उसे कम से कम एक निश्चित आयु सीमा का होना चाहिए. राज्यसभा के सदस्य बनने हेतु न्यूनतम 30 वर्ष एवं लोकसभा का सदस्य बनने के लिए न्यूनतम 25 वर्ष की आयु होनी चाहिए.

निष्ठा की शर्तें: उसे चुनाव आयोग द्वारा नियुक्त किये गए व्यक्ति के समक्ष भारतीय संविधान के प्रति सच्ची आस्था और निष्ठा के साथ-साथ भारत की संप्रभुता एवं अखंडता को अक्षुण्य रखने की शपथ लेनी होती है.

संसद द्वारा निर्धारित अहर्ताएं: जन प्रतिनिधित्व अधिनियम के अंतर्गत

संविधान में कहा गया है की संसद को यह अधिकार है की वह संसद सदस्यों के अहर्ता के विषय में अतिरिक्त नियम-विनयम बना सकती है. इस आधार पर संसद ने 1951 में जन प्रतिनिधित्व अधिनियम को बनाया. इसमें कुछ अहर्ताएं निर्धारित की है, जो निम्नलिखित है.

कोई व्यक्ति जिस क्षेत्र से चुनाव लड़ना चाहता है वहां का वह पंजीकृत मतदाता होना चाहिए. यह लोकसभा एवं राज्यसभा दोनों के निर्वाचन के लिए अनिवार्य था लेकिन बाद में एक संसोधन द्वारा इस अनिवार्यता को ख़त्म कर दिया गया.

यदि कोई व्यक्ति आरक्षित सीट पर चुनाव लड़ना चाहता है तो उसे किसी राज्य या केंद्रशासित क्षेत्र में अनुसूचित जाति या जनजाति का सदस्य होना चाहिए. हालाँकि अनुसूचित जाति या जनजाति के सदस्य उन सीटों के लिए चुनाव लड़ सकते है जो उनके लिए आरक्षित नहीं है.

संसद सदस्य बनने की निरर्हताएं (अयोग्यता)

निरर्हताएं से तात्पर्य है की किस स्थिति में कोई व्यक्ति संसद का सदस्य नहीं बन सकता. आइये इसे समझते है.

संविधान द्वारा तय की गई निरर्हताएं

निम्न तरह के व्यक्ति संसद सदस्य बनने हेतु अयोग्य हो सकते है.

1. यदि वह भारत सरकार अथवा राज्य सरकार के अधीन कोई लाभ का पद धारण करता है. यह उल्लेखनीय है की मंत्री पद अथवा संसद द्वारा तय कोई ऐसा ही पद लाभ का पद नहीं माना जाता.

2. यदि कोई व्यक्ति विकृत चित्त है और न्यायालय द्वारा ऐसी घोषणा की जा चुकी है.

3. यदि वह दिवालिया घोषित किया जा चुका हो,

4. भारत का नागरिक न रह जाए अर्थात स्वेच्छा से विदेशी राज्य की नागरिकता अपना ले अथवा विदेशी राज्य के प्रति निष्ठा अभिस्वीकार कर लें.

संसद द्वारा तय की गई निरर्हताएं: जन प्रतिनिधित्व अधिनियम के अंतर्गत

संसद ने जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 द्वारा कुछ निर्हताएं निर्धारित की है. अनुच्छेद 103 कहता है की किसी सदस्य को निर्रह ठहराए जाने संबंधी प्रश्न पर राष्ट्रपति का फैसला अंतिम रूप से मान्य होता है. हालाँकि राष्ट्रपति इस संबंध में निर्णय लेने के लिए निर्वाचन आयोग से राय-मशवरा प्राप्त करते है.

इसके अनुसार निम्न स्थिति में किसी व्यक्ति को अयोग्य ठहराया जा सकता है.

1. उसे चुनाव में भ्रष्ट आचरण अथवा अपराध के लिए दोषी पाया गया हो

2. उसे किसी अपराध में दो वर्ष या उससे अधिक की सजा मिली हो,

यह उल्लेखनीय है की जब तक किसी व्यक्ति को न्यायलय द्वारा दोषी करार न दे दिया जाए तब तक मात्र उसके कैद में रहने के आधार पर अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता.

3. उसने निर्धारित समय के भीतर चुनावी खर्चा का ब्यौरा न प्रस्तुत किया हो.

4. उसके द्वारा सरकारी ठेके में दिलचस्पी प्रदर्शित की गई हो.

5. किसी ऐसे कंपनी में लाभ के पद पर हो, जिस कम्पनी मे सरकार की 25% से ज्यादा की हिस्सेदारी है.

6. उसे भ्रष्टाचार या निष्ठाहीन होने के कारण सरकारी सेवा से सस्पेंड किया हो.

7. उसे शत्रुता बढ़ाने के लिए दण्डित किया गया हो.

8. उसे छुआछुत, दहेज़, सती प्रथा जैसे सामाजिक अपराध में अथवा उसके प्रसार में संलिप्त पाया गया हो.

नोट: यदि कोई अयोग्य व्यक्ति संसद में निर्वाचित होता है तो ऐसे मुद्दों को लोक प्रतिनिधित्व अधिनयम द्वारा सुलझाया जाता है. इसके द्वारा उच्च न्यायालय पुरे चुनाव को अमान्य घोषित कर सकता है और असंतुष्ट व्यक्ति को उच्चतम न्यायालय में जाने का अधिकार होता है.

दल-बदल कानून के आधार पर निरर्हताएं

भारतीय संविधान की दसवीं सूची में वर्णित दल-बदल कानून के आधार पर किसी व्यक्ति को दल-बदल हेतु दोषी पाए जाने पर संसद सदस्य बनने हेतु अयोग्य ठहराया जा सकता है. इससे संबंधित विवादों का निपटारा राज्यसभा में राज्यसभा के सभापति और लोकसभा में लोकसभा स्पीकर करते है.आपने उपर पढ़ा था की जन प्रतिनिधित्व अधिनियम के विवाद के विषय पर आख़िरी निर्णय राष्ट्रपति का होता है जबकि यहाँ आख़िरी निर्णय लोकसभा स्पीकर एवं राज्यसभा के सभापति का होता है.

इसके अंतर्गत आने वाले प्रमुख प्रावधान निम्नलिखित है.

1. अगर वह व्यक्ति स्वेच्छा से उस राजनितिक दल का त्याग करता है जिस दल के टिकट पर वह निर्वाचित किया गया हो,

2. अगर वह अपने राजनितिक दल द्वारा दिए गए निर्देशों के विरुद्ध सदन में मतदान करता है या नहीं करता है,

3. अगर वह निर्दलीय चुने जाने के बाद किसी राजनितिक दल में शामिल हो जाता है,

4. अगर कोई नॉमिनेटेड किया गया सदस्य 6 महीने के बाद किसी राजनितिक दल में शामिल होता है.

संसद सदस्य को अपना स्थान कब रिक्त करना होता है

कुछ स्थितियों में सांसद को अपना स्थान खाली करना होता है. ऐसी प्रमुख स्थितियां निम्नलिखित हो सकती है.

दोहरी सदस्यता

हम जानते है की संसद में दो सदन लोकसभा और राज्यसभा है और कोई भी व्यक्ति एक बार में दोनों का सदस्य नहीं बन सकता. इस संबंध में लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 के अनुसार निम्न प्रावधान देखने को मिलते है.

1. यदि कोई व्यक्ति संसद के दोनों सदन के लिए चुन लिया जाता है तो उसे 10 दिन के अंदर यह बताना होगा की उसे किस सदन में रहना है. अगर वह व्यक्ति इस संबंध में स्वयं कोई सुचना नहीं देता है तो राज्यसभा से उसकी सदस्यता समाप्त हो जाती है.

2. अगर किसी सदन का सदस्य दुसरे सदन का भी सदस्य चुन लिया जा है तो पहले वाले सदन से उसका स्थान रिक्त हो जाता है.

3. अगर कोई एक व्यक्ति एक ही सदन में दो सीटों के लिए चुना जाता है तो उसे खुद से बताना होता है की वह कौन सी किसी एक सीट पर सदस्य के रूप में रहना चाहता है. अगर वह ऐसा नहीं करता है की उसकी दोनों सीटों के लिए दावेदारी ख़त्म हो जाती है.

4. कोई व्यक्ति एक साथ राज्य विधानसभा और संसद का सदस्य नहीं हो सकता. अगर वह दोनों के लिए चुना जाता है तो उसे 14 दिनों के भीतर राज्य विधानमंडल की सीट खाली करने के संबध में सूचना देनी होती है. ऐसी सुचना न देने की स्थिति में संसद के लिए उसकी सदस्यता समाप्त हो जाती है.

निरर्हताएं

यदि कोई व्यक्ति संविधान में निर्धारित निरर्हताएं से ग्रस्त पाया जाता है तो संसद में उसका स्थान रिक्त हो जाता है.

पदत्याग

कोई भी संसद सदस्य सदन के पीठासीन अधिकारी को त्यागपत्र दे सकता है और इसके स्वीकार हो जाने पर उसका स्थान रिक्त हो जाता है. लोकसभा के लिए स्पीकर और राज्यसभा के लिए राज्यसभा के सभापति पीठासीन अधिकारी होते है और उन्हें ही त्यागपत्र सौंपा जा सकता है.

अनुपस्थिति

अनुपस्थिति के आधार पर भी सदस्यता खत्म की जा सकती है. अगर कोई व्यक्ति बिना अनुमति 60 दिनों से अधिक समय तक सदन की सभी बैठकों में अनुपस्थित रहता है तो सदन से उसका पद रिक्त हो सकता है.

इस 60 दिन की अवधि में सदन के स्थगन या सत्रावसान की लगातार 4 दिन से अधिक अवधि को शामिल नहीं किया जाता.

अन्य स्थितियां

उपरोक्त प्रावधानों के अतिरिक्त भी कुछ स्थितियों में किसी व्यक्ति को सांसद का पद खाली करना पद सकता है. ये स्थितियां निम्नलिखित हो सकती है.

1. यदि न्यायालय उस चुनाव को अमान्य करार कर दें जिससे किसी व्यक्ति का निर्वाचन हुआ हो.

2. यदि उसे संबंधित सदन द्वारा निष्काषित कर दिया जाए

3. यदि वह राष्ट्रपति अथवा उपराष्ट्रपति के रूप में निर्वाचित हो जाए

4. यदि उसे किसी राज्य का राज्यपाल बना दिया जाए

हम उपर चर्चा कर चुके है की संविधान संसद को यह अधिकार देता है की वह इस संबंध में नियमें बना सकती है. अतः संसद सदस्य के अहर्ता निरर्हता से जुड़े नये नियम बनाये जा सकते है.

संसद की शक्ति एवं कार्य

संसद की विधायी शक्ति एवं कार्य

विधायी शक्ति से तात्पर्य है की विधि, अधिनियम, नियम-कानून आदि से संबंधित शक्तियां. भारतीय संविधान संसद को व्यापक स्तर पर विधायी कार्य सौंपती है. क्योंकि संसद में लोकसभा को सर्वाधिक वरीयता प्राप्त है और लोकसभा के सदस्य जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित होते है ऐसे में संसद को यह अधिकार सौंपा जाना लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिहाज से सर्वाधिक अनुकूल प्रतीत होता है. आइये संसद के विधायी शक्ति एवं कार्य को देखें.

संसद देश के संचालन हेतु नियम-अधिनियम को बनाता है. आप आये दिन समाचार और न्यूज में सुनते होंगें की किसी विशेष अधिनियम को संसद में लाया गया अथवा किसी अधिनियम में संसोधन किये जाने की बात हो रही है.

दरअसल भारतीय संविधान में वर्णन किया गया है की देश में लागू होने वाले किसी नियम-कानून को बनाने की शक्ति संसद के पास है. संसद में इसके लिए विधेयक पेश किया जाता है जिसे संसद के दोनों सदनों राज्यसभा और लोकसभा से पारित करने के पश्चात राष्ट्रपति की मंजूरी प्राप्त की जाती है. इसके बाद यह विधेयक कानून बन जाता है.

संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची के विषयों पर कानून:

हम जान चुके है की संसद को विधायी शक्ति के तहत कानून बनाने का अधिकार प्राप्त है लेकिन ऐसा नहीं है की संसद किसी भी विषय पर कानून बना सकती है.

भारत एक संघीय देश है जहाँ राज्यों को भी काफी हद तक शक्तियां प्रदान की गई है. राज्यों के विधान सभा को भी कुछ विषयों पर कानून बनाने का अधिकार सौंपा गया है. ऐसे में प्रश्न उठता है की यह कैसे तय किया जाता है की किन विषयों पर संसद और किन विषयों को राज्य विधानसभा कानून बनाये. इस बात को संसद में स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है.

संविधान में संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची के रूप में स्पष्ट रूप से वर्णित किया गया है की संसद संघ सूची के विषयों पर, राज्य राज्य सूची के विषयों पर कानून बना सकते है. वहीँ समवर्ती सूची में वर्णित विषयों पर संसद और राज्य दोनों कानून बना सकते है लेकिन किसी विवाद की स्थिति में संसद को ही अधिक शक्तिशाली बनाया गया है. अर्थात संसद द्वारा बनाया गया कानून ही मान्य होगा.

ऐसे में दो या अधिक राज्यों के बीच आपसी विवाद की स्थिति में अथवा असामान्य परिस्थितियों में संसद राज्य सूची के विषयों पर भी कानून बना सकती है.

संविधान में 97 विषयों को संघ सूची के रूप में शामिल किया गया था लेकिन वर्तमान में इसमें 99 विषय शामिल है. संविधान संसोधन द्वारा इनमें परिवर्तन कर विषयों को बढाया गया है.

अवशिष्ट विषयों पर कानून बनाने की शक्ति:

संभव है की कुछ ऐसे भी विषय होंगें जिसे किसी भी सूची में शामिल नहीं किया गया है. ऐसे में संसद को यह अधिकार है की वह इन विषयों पर भी कानून बना सकती है.

अध्यादेशो की अनुमोदन की शक्ति:

अध्यादेश राष्ट्रपति द्वारा जारी एक आदेश है जो संसद द्वारा पारित कानून की तरह ही मान्य होता है. यह तब जारी किया जाता है जब संसद का सत्र न चल रहा हो. लेकिन यह संसद द्वारा पारित कानून के समानांतर शक्ति नहीं होता है क्योंकि इसे निश्चित अवधि के भीतर संसद से पारित करवाया जाना आवश्यक होता है अन्यथा यह समाप्त हो जाता है. इस तरह अध्यादेशो की अनुमोदन की शक्ति संसद के पास होती है. वह चाहे तो इसे तत्कालिक रूप से समाप्त भी कर सकती है.

संसद की कार्यकारी शक्ति एवं कार्य

कार्यकारी शक्ति से तात्पर्य है की शासन करने की शक्ति. हम जानते है की भारतीय संसदीय व्यवस्था में कार्यपालिका सरकार चलाती है लेकिन वह संसद से और विशेषकर लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होती है. जहाँ एक और संसद कार्यपालिका के रूप में सरकार चलाती है वहीँ दूसरी और वह अपने अन्य उपकरणों द्वारा सरकार पर नियंत्रण भी रखती है. इसका सबसे सरल उदाहरण है की कार्यपालिका के रूप में किसी दल का अस्तित्व तभी तक है जब तक संसद का विश्वास उस पर बना है.

इसी तरह संसद प्रश्नकाल. शून्यकाल, ध्यानाकर्षण, स्थगन, अविश्वास, निंदा प्रस्ताव आदि के द्वारा कार्यपालिका पर नियंत्रण करती है वहीँ विभिन्न समितियों जैसे सरकारी आश्वासन संबंधी समिति, याचिका समिति आदि के द्वारा कार्यपालिका के कार्यों का अधीक्षण भी करती है.

संसद अविश्वास प्रस्ताव पारित कर, राष्ट्रपति के उद्घाटन भाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव को पास ना कर, धन विधेयक को अस्वीकार कर, निंदा प्रस्ताव या स्थगन प्रस्ताव पास कर, आवश्यक मुद्दे को सरकार को हराकर, कटौती प्रस्ताव पास कर सरकार गिरा सकती है. इस तरह बिना संसद का विश्वास हासिल किये हुए सरकार का अस्तित्व संभव नहीं है.

स्पष्ट है की संसद उस समूह का चयन करती है जो सरकार बनाती है उसे सत्ता में बने रहने हेतु सहयोग करती है और विश्वास न होने पर उसे हटाकर लोगों पर पुनः फैसला छोड़ देती है, जो लोकतंत्र का आधार है.

संसद की वित्तीय शक्ति एवं कार्य

संसद कार्यपालिका के वित्तीय मामलों पर नियंत्रण रखती है. यह नियंत्रण दो तरीके से हो पाता है.

1. बजटीय नियंत्रण: यह बजट के प्रभावी होने से पूर्व अनुदान की मांगों के स्वीकृति देने के रूप में होता है.

2. बजट के बाद का नियंत्रण: यह अनुदान मांगों की स्वीकृति दिए जाने के पश्चात वित्तीय समितियों के माध्यम से स्थापित किया जाता है

बजट वार्षिकता के सिद्धांत पर आधारित होता है. इसमें संसद सरकार को 1 वर्ष में व्यय करने के लिए धन उपलब्ध कराती है. यदि मंजूर किया गया धन वर्ष के अंत तक व्यय नहीं होता है तो वह वापस भारत की संचित निधि में चला जाता है. इससे संसद का प्रभावी वित्तीय नियंत्रण स्थापित होता है तथा उसकी अनुमति के बिना कोई भी आरक्षित कोष नहीं बनाया जा सकता है.

संविधान में संसोधन करने की शक्ति

भारत का संविधान न तो अधिक कठोर है और न ही अधिक लचीला. अर्थात न तो इसके प्रावधानों को आसानी से बदला जा सकता है और ना ही किसी कीमत न बदले जाने वाली व्यवस्था है. इसीलिए इसे दुनिया का सबसे अच्छे संविधान में से एक माना जाता है.

संविधान में संसोधन करने के शक्ति संसद के पास है. संविधान संसोधन विधेयक को संसद में पारित कर संविधान में संसोधन किया जा सकता है. हालाँकि इसके द्वारा संविधान के मूल ढांचे में परिवर्तन नहीं किया जा सकता.

संविधान की मूल ढांचा क्या है: आपने कई बार सुना होगा की किसी अधिनियम की संवैधानिकता को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी गई है. दरअसल कुछ मूल्यों को संविधान की मूल आत्मा कहा गया है, इनमें किये गये संसोधन को न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है.

इस तरह संसद को मूल ढांचे के अतिरिक्त किसी भी संविधान की व्यवस्था को संशोधन की शक्ति होती है.

न्यायिक शक्ति एवं कार्य

कुछ मामलों के संदर्भ में संसद को न्यायिक शक्ति भी प्राप्त है. कुछ प्रमुख न्यायिक शक्ति निम्नलिखित है.

1. राष्ट्रपति पर महाभियोग: संविधान के उल्लंघन पर राष्ट्रपति को पद मुक्त करने के संदर्भ में राष्ट्रपति पर महाभियोग चलाया जा सकता है.

2. उपराष्ट्रपति पर महाभियोग: संविधान के उल्लंघन पर उपराष्ट्रपति को पद मुक्त करने के संदर्भ में उपराष्ट्रपति पर महाभियोग चलाया जा सकता है.

3. सुप्रीम कोर्ट एवं हाई कोर्ट के न्यायाधीश, सीईओ, नियंत्रण एवं महालेखा परीक्षक को हटाने की सिफारिश राष्ट्रपति से करना

4. अपने सदस्यो या बाहरी लोगों को इसकी अवमानना या विशेष अधिकारों के उल्लंघन के लिए दंडित कर सकती है.

निर्वाचक शक्तियां एवं कार्य

1. लोकसभा अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष तथा राज्यसभा के उपसभापति का चयन .

2. राष्ट्रपति एवं उपराष्ट्रपति के चुनाव में भाग लेना

3. निर्वाचन से संबंधित नियम बनाना एवं उसमें संसोधन करना. जैसे राष्ट्रपति एवं उपराष्ट्रपति निर्वाचन अधिनियम 1952, लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1950, लोकप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 आदि.

अन्य शक्तियां एवं कार्य

1. यह देश में विचार-विमर्श की सर्वोच्च इकाई है. यह राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय महत्व के मुद्दे पर बहस करती है.

2. संसद तीनों तरह के आपातकाल की संस्तुति करता है.

3. संबंधित राज्य विधानसभा की स्वीकृति से विधान परिषद की समाप्ति या उसका गठन कर सकती है.

4. राज्यों के क्षेत्र, सीमा एवं नाम में परिवर्तन करना.

5. सुप्रीम कोर्ट एवं हाई कोर्ट का गठन एवं न्याय क्षेत्र को नियंत्रित करना.

6. दो या दो से अधिक राज्यों के बीच समान न्यायालय की स्थापना करना.

संसद के प्रभावी होने के मार्ग में बाधक कारण

कई ऐसे कारक है जो संसद के प्रभावी और वास्तविक नियंत्रण के मार्ग में बाधक है.

विशाल एवं जटिल प्रशासन, समय तथा विशेषज्ञता का आभाव

व्यवहारिक रुप से संसद के प्रभावी होने के मार्ग में विशाल एवं जटिल प्रशासन व्यवस्था काफी चुनौती उत्पन्न करती है. समय की कमी और विशेषज्ञता का आभाव इस चुनौती को और बढ़ा देता है. कम समय होने के कारन विभिन्न उपकरणों का उपयोग करते हुए बिल, प्रस्ताव आदि को जल्दी पास करा लिया जाता है.

हम अन्य पोस्ट में चर्चा कर चुके है की लोकसभा सदस्य जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित किये जाते है. ऐसे में वह संसदीय उपकरणों के विशेषज्ञताओं और जटिलताओं से रूबरू नही होते है. इस माहौल में संसद का प्रभावी होने का मसला प्रभावित होता है.

कार्यपालिका का नीति निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका और कार्यपालिका के साथ संसद का बहुमत

हम जानते है की लोकसभा में बहुमत प्राप्त समूह सरकार बनाती है और उसे कार्यपालिका कहा जाता है. यह स्पष्ट है की कार्यपालिका की नीति निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका होती है. वह विभिन्न विधेयक-कानून को संसद में पेश करती है.

चूँकि कार्यपालिका का संसद में बहुमत होता है ऐसे में वह काफी हद तक अपने हिसाब से विधेयक को पारित करवा लेती है. हालाँकि राज्य सभा इसमें कुछ संतुलन स्थापित करती है लेकिन साधारण विधेयक और कुछ प्रकार के वित्त विधेयक की स्थिति में संयुक्त बैठक द्वारा उनको पारित करवा लिया जाता है.

हालाँकि संविधान संसोधन के केस में किसी एक सदन की मनमानी नहीं चल पाती है लेकिन सामान्य रूप से संसद में बहुमत प्राप्त होने के कारण कार्यपालिका पर संसद प्रभावी रूप से नियंत्रण नहीं कर पाती है.

संसदीय समिति का कार्य पोस्टमार्टम की तरह

संविधान में विभिन्न समितियों के अस्तित्व की चर्चा की मिलती है जिनमें कुछ स्थायी और अस्थायी होते है. इन समितियों का कार्य विधेयकों प्रस्तावों मुद्दों आदि पर विचार करना होता है. लेकिन इनकी भूमिका सलाहकारी होती है.

इसी तरह लोकलेखा समिति जैसी वित्तीय कार्यों की जाँच करने वाले समितियां कार्यपालिका द्वारा राशि खर्च किये जाने के बाद जांच करती है. स्पष्ट है की जब राशि खर्च की जाती है तो फिर जाँच का क्या महत्व? और वह भी इस स्थिति में जब उसके जांच का कोई मजबूत दबाब न बनाया जा सकें. यह तो मरने के बाद लाश के पोस्टमार्टम किये जाने जैसी बातें है.

इस तरह संसदीय समिति को दी गयी अल्प अधिकार एवं शक्तियां भी संसद के प्रभावी होने के मार्ग में बाधक है.

कटौती प्रस्ताव जैसे उपकरणों की भूमिका भी कुछ कम नहीं

कटौती प्रस्ताव लाये जाने के बाद किसी मुद्दे पर वाद-विवाद रोक कर उस पर सीधे मतदान करा दिया जाता है. सरल शब्दों में इसका अर्थ है की किसी मुद्दे पर संसदीय बहस न करते हुए सीधे मतदान करा कर विधेयक को पारित कराने का प्रयास किया जाना.

इस तरह के उपकरणों के प्रयोग के बाद संसद में अल्प मत वाले लोगों की भूमिका समाप्त हो जाती है और चूँकि कार्यपालिका बहुमत में होती है और इसीलिए विधेयक पारित करा लिया जाता है. ऐसे में कई बार इस विधेयक की कमियों, चुनौतियों आदि पर चर्चा नहीं हो पाती है और न ही इसे सामने लाने का विपक्षी दल को उचित अवसर प्राप्त होता है.

ऐसे में कहा जा सकता है की कटौती प्रस्ताव जैसे उपकरणों के कारण भी संसद की नियंत्रण और निर्देशन की शक्तियां प्रभावित होती है.

अधिकतम अध्यादेश जारी किया जाना भी है जिम्मेवार

संवैधानिक प्रावधानों से यह स्पष्ट होता है की राष्ट्रपति की अध्यादेश जारी करने की शक्ति संसद द्वारा कानून बनाने की शक्ति के समानांतर नहीं है. इसका उपयोग केवल संसद सत्र के न चलने की स्थिति में विशेष परिस्थितियों में किया जा सकता है लेकिन इसका अधिकतम उपयोग किया जाना संसद के शक्तियों को प्रभावित करता है.

हालाँकि अध्यादेश के संबंध में यह नियम है की उसे 6 महीनों के अंदर ससंद से पारित करवाया जाना आवश्यक है लेकिन यह भी उल्लेखनीय है की संसद द्वारा इसे पारित न किये जाने के बाबजूद इसके द्वारा किये गये अब तक के कार्य मान्य बने रहेंगें. ऐसे में इसके दुरुपयोग की पूरी गुंजाईस बनी रहती है. दुसरे बहुमत वाली सरकार आसानी से इसे संसद में पारित करवा लेती है.

स्पष्ट है की अधिकतम अध्यादेश लाये जाने की प्रवृति भी संसद के शक्तियों को प्रभावित करता है.

राजनीतिवाद की स्याह पक्ष की भूमिका

वस्तुनिष्ठता, मूल्यों से परे संसदीय नियंत्रण घटिया राजनीतीवाद की शिकार हो जाती है और यह संसद को सौंपे गए दायित्वों के निर्वहन में सर्वाधिक बड़ी बाधा है.

कई बार समर्थन और बहुमत जुटाने के खेल में सही-गलत का साथ छोर संसद सदस्यों को उनके निजी हितों के हवाले अपने साथ मिलाया जाता है. ऐसे में संसद द्वारा अपने शक्तियों का सही उपयोग करने की बात कल्पना से परे है.

सशक्त एवं स्थिर विपक्ष का आभाव

किसी संसदीय और लोकतान्त्रिक व्यवस्था वाले देश में सशक्त एवं स्थिर विपक्ष का न होना चुनौतियों को बढ़ाता है.

संसदीय व्यवस्था में विपक्ष की भूमिका काफी सशक्त होती है. वह सरकार की कमियों को सामने लाती है और हर मुद्दे के लिए एक बेहतर विकल्प प्रस्तुत करती है. इससे कार्यपालिका सजग और जागरूक रहती है. उसे पता होता है की अगर उसने जनता के हितों को छोड़कर तानाशाह रवैया अख्तियार किया तो अगले चुनाव में जनता उसे नकार सकती है. ऐसे में वह बेहतर कदम उठाती है जिससे देश का विकास सुनिश्चित होता है.

उपरोक्त बातों से स्पष्ट है की सशक्त एवं स्थिर विपक्ष संसदीय और लोकतांत्रिक व्यवस्था वाले देश के लिए अहम् कड़ी है और इसका होना देश के लिए अत्यंत जरुरी है. ऐसे में कल्पना करें की जब यह न रहें तो क्या होगा?

सशक्त एवं स्थिर विपक्ष का न होने पर सरकार खुद को सुप्रीम मानने लग सकती है और अगर वह नैतिक और आत्म संयमित न हो तानाशाह भी बन सकती है और ऐसा होना किसी भी लोकतांत्रिक देश के लिए सबसे बुरा है.

अगर बुरा न हो भी तो एक बात तो तय है की कमजोर विपक्ष की स्थिति में संसद अपनी शक्तियों का उपयोग कर सरकार पर नियंत्रण नहीं कर सकती.

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