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भारतीय राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग

भारतीय संसद ने मानवधिकार संरक्षण अधिनियम 1993 के तहत राष्ट्रीय मानवधिकार आयोग की स्थापना की|  इसका निर्माण संसद के द्वारा बनाए गए कानून के तहत हुआ है इसलिए यह एक सांविधिक निकाय है।

संरचना, सदस्यों की नियुक्ति एवं कार्यकाल

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में एक अध्यक्ष के अलावा 5 स्थायी और सात पदेन अर्थात पद के अनुसार सदस्य होते हैं|

अध्यक्ष एवं स्थायी सदस्य

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में एक अध्यक्ष का पद बनाया गया है| इस हेतु सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश को नियुक्त किया जाता है|

आयोग में अध्यक्ष के आलावा पांच स्थायी यानी पूर्णकालिक सदस्य भी होते है| इन पांच स्थायी सदस्य में से एक उच्चतम न्यायालय में कार्यरत अथवा सेवानिवृत्त न्यायाधीश और एक उच्च न्यायालय में कार्यरत सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश होते है| इसके आलावा तीन सदस्य मानवाधिकार संबंधी जानकारी या कार्यानुभव वाले व्यक्ति होते है|

सदस्यों की नियुक्ति: आयोग के अध्यक्ष समेत सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा प्रधानमंत्री के नेतृत्व में गठित 6 सदस्यीय समिति की सिफारिश पर होती है। इस समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा स्पीकर, राज्यसभा के उपसभापति, संसद के दोनों सदनों के मुख्य विपक्षी दल के नेता एवं भारत सरकार के गृह मंत्री होते हैं| सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की सलाह पर उच्चतम न्यायालय के किसी न्यायाधीस अथवा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को भी नियुक्त किया जा सकता है।

पदेन सदस्य

आयोग में अध्यक्ष एवं स्थायी सदस्य के आलावा पद के अनुसार सात अतिरिक्त सदस्य होते है| इन सदस्यों में से कम से कम एक महिला होनी चाहिए| पद के अनुसार निम्नलिखित लोगों को आयोग की सदस्यता प्राप्त होती है:

  1. राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष
  2. राष्ट्रीय अनुसूचित जाति के अध्यक्ष
  3. राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति के अध्यक्ष
  4. राष्ट्रीय महिला आयोग के अध्यक्ष
  5. राष्ट्रीय अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष
  6. राष्ट्रीय बाल अधिकार सुरक्षा
  7. विकलांग व्यक्तियों के लिए मुख्य आयुक्त

सदस्यों का कार्यकाल

आयोग के सदस्यों का कार्यकाल 3 वर्ष का होता है। आयोग के अध्यक्ष पद के लिए भी यह अवधि समान होती है| हालांकि 3 वर्ष पूरा न होने पर भी उम्र सीमा (70 वर्ष) के आधार पर उनका कार्यकाल समाप्त हो सकता है।

एक बार कार्यकाल समाप्त होने के बाद किसी सदस्य को पुनर्नियुक्त किया जा सकता है| हालाँकि उसे भारत सरकार या राज्य सरकार के अधीन कोई लाभ का पद नहीं प्रदान किया जा सकता है।

दिवालिया होने, शारीरिक व मानसिक रूप से अक्षम होने, न्यायालय द्वारा अपराधी घोषित किए जाने, किसी अन्य रोजगार में संलिप्त होने के आधार पर अध्यक्ष व सदस्यों को कार्यकाल पूरा होने से पूर्व हटाया जा सकता है| राष्ट्रपति द्वारा अध्यक्ष अथवा किसी सदस्य को दूराचरण या अक्षमता के आधार पर भी हटाया जा सकता है। लेकिन इसके लिए उच्चतम न्यायालय द्वारा जांच करवाया जाना और उसके द्वारा अनुशंसा किया जाना आवश्यक है।

कार्य

देश में मानवाधिकार का प्रहरी

आयोग भारतीय संविधान द्वारा निर्धारित मूल्यों के साथ अंतरराष्ट्रीय संधियों में बनाए गए मूल्यों से संबंधित अधिकारों के उल्लंघन की जांच करती है। यह कार्य वह खुद संज्ञान लेकर अथवा न्यायालय के आदेश से करता है। जीवन, स्वतंत्रता, समता और व्यक्तिगत मर्यादा जैसे अधिकारों के प्रहरी के रूप में अपनी भूमिका का निर्वाह करता है।

मानव अधिकारों के प्रति जागरूकता का प्रसार

आयोग इस संबंध में मीडिया की भूमिका निर्वाह करता है। वह लोगों के बीच मानव अधिकारों की जानकारी फैलाता है| वह उनकी सुरक्षा, लोगों की सुरक्षा के लिए उपलब्ध उपायों के प्रति उन्हें जागरूक करता है। वह संबंधित सरकारी और गैर सरकारी संगठनों को प्रोत्साहन प्रदान करता है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि को बेहतर बनाना

भारत अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार का पक्षधर है और भारत की छवि मानव अधिकार को लेकर वैश्विक पटल पर काफी अच्छा है। इस संबंध में आयोग की भूमिका सराहनीय है। आयोग मानवाधिकार से संबंधित अंतरराष्ट्रीय संधियों को दस्तावेजों का अध्ययन कर उन्हें प्रभावशाली तरीके से लागू करने हेतु सिफारिश करता है।

समीक्षक की भूमिका

आयोग मानव अधिकारों की रक्षा के संबंध में बनाए गए संवैधानिक और विधिक उपबंध की समीक्षा करता है और उसके प्रभावी क्रियान्वयन हेतु उपायों को साझा करता है।

आयोग के अधिकार

आयोग को सिविल न्यायालय जैसे सभी अधिकार एवं शक्तियां प्राप्त हैं। वह भारत में प्रधान कार्यालय जो कि दिल्ली में स्थित है कि अलावा किसी भी स्थान पर अपना कार्यालय खोल सकता है।

आयोग का चरित्र न्यायिक है। वह खुद की प्रेरणा से अथवा न्यायालय द्वारा सुझाये गए किसी मानव अधिकार उल्लंघन की जांच कर सकता है। वह केंद्र अथवा राज्य सरकार से किसी भी जानकारी पर रिपोर्ट की मांग कर सकता है। आयोग के पास स्वयं का एक स्वतंत्र जांच दल है फिर भी वह किसी अधिकारी अथवा एजेंसी की सेवाएं भी प्राप्त कर सकता है।

आयोग के अध्यक्ष व सदस्यों के वेतन, भत्ते व अन्य सेवा शर्तों का निर्धारण केंद्र सरकार द्वारा तय किया जाता है लेकिन नियुक्ति के बाद इन्हें हटाया या कम नहीं किया जा सकता। यह आयोग की कार्यशैली को सबल, स्वाधीनता तथा निष्पक्षता प्रदान करता है।

आयोग अपनी वार्षिक या विशेष रिपोर्ट केंद्र सरकार व संबंधित राज्य सरकार को भेजता है, जिसे विधानसभा या संसद पटल पर रखा जाता है। सरकार को संसद या विधानसभा में इसकी सिफारिशों को स्वीकार नहीं करने के कारणों का उल्लेख करना होता है।

आयोग की सीमाएं

आयोग की भूमिका सिफारिश अथवा सलाहकारी होती है। वह दोषी को दंड जुर्माने आदि का अधिकार नहीं रखता। उसकी सिफारिश से संबंधित सरकार उत्पन्न इकाई पदाधिकारी रुप से लागू नहीं होती है।

सशस्त्र बलों के सदस्यों द्वारा किए गए मानवाधिकार उल्लंघन के मामले में आयोग की भूमिका शक्तियां व न्यायिक अधिकार सीमित होती है।

आयोग किसी ऐसे मामलों की जांच के लिए अधिकृत नहीं है जिसे घटित हुए 1 वर्ष से अधिक हो गया हो।

मूल्यांकन

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग देश में मानव अधिकारों की गाड़ी है। यह संविधान की मूल भावना और अंतरराष्ट्रीय संधियों में बनाए गए मानव अधिकारों को देश के प्रत्येक व्यक्ति के लिए सुरक्षित करने का प्रयास करती है। हालांकि आयोग की भूमिका परामर्श कारी होती है लेकिन सरकार के ऊपर आयोग के निर्णय को स्वीकार करने का बड़ा दबाव होता है।

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