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संसद में संकल्प एवं प्रस्ताव

संकल्प अथवा प्रस्ताव संसद में सदस्यों द्वारा लाये जाते है यह विभिन्न विषयों से संबंधित होते है.

भारतीय संसद की विधायी प्रक्रिया में सभी संकल्प महत्वपूर्ण प्रस्तावों की श्रेणी में आते हैं अर्थात प्रत्येक संकल्प एक विशिष्ट प्रकार का प्रस्ताव होता है लेकिन यह अनिवार्य नहीं है कि सभी प्रस्ताव महत्वपूर्ण हो. इसी तरह यह भी अनिवार्य नहीं है कि सभी प्रस्तावों को सभा की स्वीकृति के लिए रखा जाए.

संकल्प (Motion)

साधारण लोक महत्व के मामलों पर सरकार का ध्यान आकृष्ट करने के लिए सदन में संकल्प लाया जा सकता है. किसी प्रस्तावित संकल्प को या संकल्प के संशोधन को सभा की अनुमति के बिना वापस नहीं किया जा सकता.

संकल्पों को तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है: 1. गैर सरकारी सदस्यों का संकल्प, 2. सरकारी संकल्प, 3.सांविधिक संकल्प.

1. गैर सरकारी सदस्यों का संकल्प: यह संकल्प गैर सरकारी सदस्यों द्वारा लाया जाता है. इस पर बहस केवल वैकल्पिक शुक्रवार एवं दोपहर बाद के बैठक में की जा सकती है.

2. सरकारी संकल्प: इसे किसी भी दिन सोमवार से गुरुवार तक लाया जा सकता है. यह संकल्प मंत्री द्वारा लाया जा सकता है.

3. सांविधिक संकल्प: इसे गैर सरकारी और मंत्री दोनों में से किसी के भी द्वारा लाया जा सकता है. इसे ऐसा इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसे संविधान के उपबंध या अधिनियम के तहत लाया जाता है.

प्रस्ताव (Resolution)

संसद में किसी भी विषय के लिए मंत्री अथवा गैर सरकारी सदस्यों द्वारा प्रस्ताव लाया जाता है. इस पर सदन अपना मत स्वीकृति अथवा अस्वीकृति के रूप में देता है.

सदस्यों द्वारा चर्चा के लिए लाए के प्रस्तावों की तीन प्रमुख श्रेणियां होती हैं: 1. महत्वपूर्ण प्रस्ताव, 2. स्थापन प्रस्ताव, 3. पूरक प्रस्ताव

महत्वपूर्ण प्रस्ताव

यह एक स्वयं वर्णित स्वतंत्र प्रस्ताव है. इसके तहत अत्यंत महत्वपूर्ण मामले जैसे राष्ट्रपति के खिलाफ महाभियोग, मुख्य निर्वाचन आयुक्त को हटाना आदि शामिल है.

स्थापन्न प्रस्ताव

यह वह प्रस्ताव है जो मूल प्रस्ताव का स्थान लेता है. यदि सदन इसे स्वीकार कर लेता है तो मूल प्रस्ताव स्थगित हो जाता है.

पूरक प्रस्ताव

यह ऐसा प्रस्ताव है जिसका स्वयं कोई अर्थ नहीं होता है इसे सदन में तब तक पारित नहीं किया जा सकता जब तक इसके मूल प्रस्ताव का संदर्भ ना हो.पूरक प्रस्ताव तीन तरह के होते है:

1. सहायक प्रस्ताव: इसे नियमित प्रक्रिया के रूप में विभिन्न कार्यों के संपादन में इस्तेमाल किया जाता है.

2. स्थान लेने वाला प्रस्ताव: इसे चर्चा के दौरान किसी अन्य मामलों के संबंध में लाया जाता है और यह उस मामले का स्थान लेने के लिए लाया जाता है.

3. यह मूल प्रस्ताव के केवल भाग को परिवर्तित या स्थान लेने के लिए लाया जाता है

कटौती प्रस्ताव

यह प्रस्ताव किसी सदस्य द्वारा वाद विवाद को समाप्त करने के लिए लाया जाता है. यदि यह प्रस्ताव स्वीकृत हो जाए तो वाद-विवाद को रोक कर इसे मतदान के लिए रखा जाता है. कटौती प्रस्ताव सामान्यतः चार प्रकार के होते है. 1. साधारण कटौती, 2. घटकों में कटौती, 3. कंगारू कटौती, 4. गिलोटिन प्रस्ताव.

1. साधारण कटौती: यह वह प्रस्ताव होता है जिसे किसी सदस्य की ओर से रखा जाता है की अब इस मामले पर पर्याप्त चर्चा हो चुकी है और अब इसे मतदान के लिए रखा जाए.

2. घटकों में कटौती: इस मामले में, किसी प्रस्ताव पर चर्चा से पूर्व विधेयक या लंबे संकल्पों का एक समूह बना लिया जाता है और केवल इसी भाग पर वाद-विवाद की जाती है और संपूर्ण भाग को मतदान के लिए रखा जाता है

3. कंगारू कटौती: इस प्रकार के प्रस्ताव में केवल महत्वपूर्ण खंड पर ही बहस और मतदान होता है और शेष खंडों को छोड़ दिया जाता है और उन्हें पारित मान लिया जाता है.

4. गिलोटिन प्रस्ताव: जब किसी विधेयक या संकल्प के किसी भाग पर चर्चा नहीं हो पाती है तो उस पर मतदान से पूर्व चर्चा कराने के लिए यह प्रस्ताव लाया जाता है.

विशेषाधिकार प्रस्ताव

यह किसी मंत्री द्वारा संसदीय विशेषाधिकार के उल्लंघन से संबंधित है.

यह किसी सदस्य द्वारा पेश किया जाता है जब यह महसूस किया जाता है कि किसी मंत्री ने सही तथ्यों को प्रकट नहीं कर तथा गलत सूचना देकर सदन की एक या एक से अधिक सदस्यों के विशेषाधिकार के उल्लंघन किया है इसका उद्देश्य संबंधित मंत्री की निंदा करना है.

ध्यानाकर्षण प्रस्ताव

इस प्रस्ताव द्वारा सदन का कोई सदस्य सदन के पीठासीन अधिकारी की अनुमति से किसी मंत्री का ध्यान अविलंबनिय लोक महत्व के किसी मामले पर आकृष्ट कर सकता है. यह भारतीय संसदीय प्रक्रिया की नवाचार है जो 1954 से अस्तित्व में लाया गया.

स्थगन प्रस्ताव

यह किसी अविलंबनीय लोक महत्व के मामले पर चर्चा सदन में चर्चा करने के लिए ,सदन की कार्यवाही को स्थगित करने का प्रस्ताव है. इसके लिए 50 सदस्यों का समर्थन आवश्यक है.

यह प्रस्ताव लोकसभा एवं राज्यसभा दोनों में पेश किया जा सकता है और सदन का कोई भी सदस्य इस प्रस्ताव को पेश कर सकता है.

स्थगन प्रस्ताव की चर्चा ढाई घंटे से कम की नहीं होती है. सदन की कार्यवाही सुचारू रूप से चलने के लिए स्थगन प्रस्ताव की निम्न सीमाएं भी निर्धारित की गई है.

  • इसके माध्यम से ऐसे मुद्दे को ही उठाया जा सकता है जो कि निश्चित, तथ्यात्मक, अत्यंत जरूरी एवं लोक महत्व का हो.
  • इसमें एक से अधिक मुद्दों को शामिल नहीं किया जाता
  • इसके माध्यम से वर्तमान घटनाओं के किसी महत्वपूर्ण विषय को ही उठाया जा सकता है ना कि साधारण महत्व के विषय को.
  • इसके माध्यम से विशेषाधिकार के प्रश्न को नहीं उठाया जा सकता.
  • इसके द्वारा ऐसे किसी विषय पर चर्चा नहीं की जा सकती जिस पर उसी सत्र में चर्चा की जा चुकी हो.
  • इसके माध्यम से न्यायालय में विचाराधीन विषय पर चर्चा नहीं की जा सकती.
  • इसे किसी पृथक प्रस्ताव के माध्यम से उठाए गए विषय को पुनः उठाने की अनुमति नहीं होगी.

अविश्वास प्रस्ताव

संविधान के अनुच्छेद 75 के अनुसार मंत्रिपरिषद लोकसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदाई है अर्थात मंत्रिपरिषद तब तक ही है जब तक उसे सदन में बहुमत प्राप्त है. लोकसभा मंत्रिमंडल को अविश्वास प्रस्ताव पारित कर हटा सकती है. अविश्वास प्रस्ताव के समर्थन में 50 सदस्यों की सहमति अनिवार्य है.

निंदा प्रस्ताव और अविश्वास प्रस्ताव में अंतर

निंदा प्रस्ताव को लोकसभा में स्वीकार करने का कारण बताना आवश्यक है जबकि अविश्वास प्रस्ताव स्वीकार करने का कारण बताना आवश्यक नहीं है.

निंदा प्रस्ताव किसी एक मंत्री या मंत्री के समूह या पूरे मंत्रिपरिषद के विरुद्ध लाया जा सकता है जबकि अविश्वास प्रस्ताव सिर्फ पूरे मंत्रिपरिषद के विरुद्ध लाया जाता है.

निंदा प्रस्ताव मंत्री परिषद की कुछ नीतियों या कार्य के खिलाफ निंदा के लिए लाया जाता है जबकि अविश्वास प्रस्ताव मंत्रिपरिषद में लोकसभा के विश्वास के निर्धारण हेतु लाया जाता है.

निंदा प्रस्ताव यदि लोकसभा में पारित हो जाए तो मंत्रिपरिषद को त्यागपत्र देना आवश्यक नहीं है जबकि अविश्वास प्रस्ताव के लोकसभा से पारित होने पर मंत्रिपरिषद को त्यागपत्र देना ही पड़ता है.

धन्यवाद प्रस्ताव

प्रत्येक वित्तीय वर्ष के पहले सत्र एवं प्रत्येक आम चुनाव के पहले सत्र में राष्ट्रपति सदन को संबोधित करता है इस संबोधन में राष्ट्रपति पूर्ववर्ती एवं आगामी वर्ष में सरकार की नीति एवं योजनाओं का खाका खींचता है. इस संबोधन पर दोनों सदनों में चर्चा होती है. इसे धन्यवाद प्रस्ताव कहते हैं.

बहस के बाद प्रस्ताव को मत विभाजन के लिए रखा जाता है. इस प्रस्ताव को सदन में पारित होना आवश्यक है नहीं तो इसका तात्पर्य सरकार का पराजित होना है.धन्यवाद प्रस्ताव सदस्यों को चर्चा तथा वाद विवाद के मुद्दे उठाने और कमियों हेतु सरकार और प्रशासन की आलोचना का अवसर उपलब्ध कराता है.

अनियत दिवस प्रस्ताव

यह ऐसा प्रस्ताव है जिसे अध्यक्ष चर्चा करने के लिए तिथि निर्धारित किए बिना रखता है. अध्यक्ष सदन के नेता से चर्चा द्वारा या कार्य मंत्रणा समिति की अनुशंसा द्वारा इस प्रकार के प्रस्ताव के लिए कोई दिन या समय नियत करता है.

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