मानसून

मानसून एक वृहद प्रभाव वाली मौसमी पवन है. लगभग 6 माह ग्रीष्म काल में यह दक्षिण पश्चिम से उत्तर उत्तर पूर्व की ओर और शीत काल में उत्तर पूर्व से दक्षिण पश्चिम की ओर प्रवाहित होता है. इन्हें क्रमशः दक्षिणी पश्चिमी मानसून एवं उत्तर पूर्वी मानसून कहते है.

मानसून की प्रकृति

दक्षिण पश्चिमी मानसून भारत का प्रमुख मानसून है. इससे भारत के प्रायः सभी क्षेत्रों में वर्षा प्राप्त होती है. भारत की कुल वर्षा का 85% से अधिक दक्षिण पश्चिम मानसून से ही प्राप्त होता है. यह भारत के कृषि का मुख्य आधार है.

उत्तर पूर्वी मानसून से शीत काल में कोरोमंडल तट पर (तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश का कुछ भाग) वर्षा प्राप्त होती है. तमिलनाडू के 80 % वर्षा उत्तरी पूर्वी मानसून से होती है.

भारत में दक्षिणी पश्चिमी मानसून के आगमन का समय जून प्रथम सप्ताह होता है और 15 अक्टूबर तक मानूसन का प्रवेश होता रहता है. इस अवधि में जून से सितम्बर तक मानसूनी वर्षा का 80 % से अधिक प्राप्त होती है. यह समय खरीफ कृषि के लिए महत्वपूर्ण है. ऐसे में मानसूनी वर्षा की अनिश्चितता और अनियमितता की स्थिति में भारतीय कृषि पर प्रतिकूल प्रभाव होता है, यह इस तथ्य को स्थापित करता है की भारतीय कृषि मानसून का जुआ है.

मानसून की प्रकृति के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है की इसके आगमन के समय, ठहराव के समय और निवर्तन (समाप्त) होने के समय में प्रत्येक वर्ष परिवर्तन होता रहता है. कभी अतिवृष्टि और कभी अनावृष्टि की समस्या उत्पन्न होती है जो बाढ़ और सूखे का भी कारण है. मानसूनी वर्षा का रुक-रुक कर होना भी एक समस्या है. अर्थात मानसूनी वर्षा लगातार नहीं होती इसमें एक अंतराल पाया जाता है. कभी जून में औसत वर्षा अच्छी होती है लेकिन जुलाई-अगस्त में सूखा पड़ जाता है. कभी जून या जुलाई में सूखे की स्थिति उत्पन्न होती है और अगस्त में बाढ़ की समस्या उत्पन्न हो जाती है.

मानसून की उत्पत्ति एवं उसे प्रभावित करने वाले कारक

मानसून की उत्पत्ति एवं उसे प्रभावित करने वाले कारक निम्नलिखित है:

  • तापीय कारक,
  • ITCZ,
  • जेट स्ट्रीम,
  • अलनिना प्रभाव एवं ENSO,
  • लालिना प्रभाव,
  • हेडली एवं वाकर चक्र प्रभाव,
  • सोमाली जलधारा प्रभाव,
  • पछुआ विक्षोभ प्रभाव
  • उष्ण चक्रवात प्रभाव

उपरोक्त कारको में से प्रथम तीन कारक को मानसून की उत्पत्ति के लिए जिम्मेदार कारक के रूप में माना जाता है. और बाकी कारको को मानसून को प्रभावित करने वाले कारक के तौर पर जाना जाता है.

तापीय कारक

तापीय संकल्पना मानसून की उत्पत्ति की प्रारम्भिक संकल्पना है. इसमें सूर्य के उत्तरायण-दक्षिणायन के आधार पर भारत एवं हिन्द महासागर के तापमान में परिवर्तन को आधार मानकर मानसून की उत्पत्ति की व्याख्या की गई. तापीय संकल्पना का विकास अरब भूगोल वेत्ताओं द्वारा किया गया जिसमें जलीय एवं स्थलीय समीर के रूप में मानसूनी पवनों की उत्पत्ति को समझाया गया.

इस सिद्धांत में यह माना जाता है की सूर्य के उत्तरायण के साथ भारत का प्रायद्वीपीय क्षेत्र एवं तिब्बत के पठार का क्षेत्र अधिक गर्म हो जाता है और इससे निम्न वायुदाब का विकास होता है. इसी समय अरब सागर, बंगाल की खाड़ी एवं हिन्द महासागर में कम तापमान के कारण उच्च वायुदाब पाया जाता है. ऐसे में हवाएं समुद्र से भारत के निम्न वायु दाब क्षेत्र की ओर प्रवाहित होने लगती है जो दक्षिण पश्चिम मानसून कहलाती है. इसमें आर्द्रता होने के कारण इससे भारत में वर्षा प्राप्त होती है.

तापीय संकल्पना की समुद्री समीर या जलीय समीर की अवधारणा को वैज्ञानिक नहीं कहा जा सकता क्योंकि समुद्री समीर अत्यंत धीमी या मंद गति की पवन होती है जिसका प्रभाव तटवर्ती भागों में ही 60-65 किलोमीटर तक होता है जबकि मानसून का आगमन तीव्र गति से आक्रामक रूप में होता है और इससे लगभग सम्पूर्ण भारत में वर्षा होती है.

सिद्धांत की इस कमी को दूर करने का कार्य डेडले स्टीम्प एवं बेकर ने किया. इनके अनुसार जब भारत में ग्रीष्मकाल होता है उस समय ऑस्ट्रेलिया के पश्चिमी मरुस्थलीय भाग में उच्च वायुदाब का विकास होता है जहां से दक्षिण पूर्वी व्यापारिक पवन विषुवतीय प्रदेश की ओर प्रवाहित होने लगती है. यह पवने हजारों किलोमीटर से आर्द्रता प्राप्त करती हुई आती हैं.

जब यह पवनें विषुवत रेखा को पार करती है तब पृथ्वी के घूर्णण गति के प्रभाव में आकर विचलित होकर दायी ओर (उत्तर पूर्व की ओर) मुड़ जाती हैं. यह अरब सागर में विकसित उच्च वायुदाब से उत्पन्न होने वाली हवाओं के साथ तीव्र गति से भारत में विकसित निम्न वायुदाब क्षेत्र की ओर प्रवाहित होने लगती है यह पवनें ही दक्षिण पश्चिम मानसून कहलाती हैं.

उत्तर पूर्वी मानसून की उत्पत्ति का कारण सूर्य का शीतकाल में विषुवत रेखा के दक्षिण स्थानांतरण होना है. इस समय भारत के ऊपर उच्च वायुदाब और सागरीय क्षेत्रों पर निम्न वायुदाब का विकास होता है अर्थात तापीय दशाएं ग्रीष्म काल के विपरीत हो जाती है. उच्च वायुदाब क्षेत्र से ठंडी एवं शुष्क पवने बंगाल की खाड़ी की ओर प्रवाहित होती है जो बंगाल की खाड़ी से आर्द्रता प्राप्त करती हुई पृथ्वी के घूर्णन के प्रभाव में उत्तर पूर्व से दक्षिण पश्चिम की ओर प्रवाहित होने लगती है इसे उत्तर पूर्वी मानसून कहा जाता है.

स्पष्टतः प्रारंभिक संकल्पना में तापमान के प्रत्यक्ष प्रभाव के आधार पर मानसून की उत्पत्ति की व्याख्या की गई. यह मानसून की उत्पत्ति के आधारों को स्पष्ट करती है लेकिन मानसून वर्षा एवं मानसून की अनियमितता अनिश्चितता एवं अन्य प्रवृत्तियों की व्याख्या इससे नहीं हो पाती है यदि इतनी सामान्य प्रक्रिया से मानसून की उत्पत्ति होती तब मानसून को प्रत्येक वर्ष निश्चित समय पर आना चाहिए और मानसूनी वर्षा की मात्रा भी एक समान होना चाहिए जबकि ऐसा नहीं होता.

विषुवतीय पछुआ पवन की संकल्पना (आईटीसीजेड की संकल्पना)

मानसून के संदर्भ में विषुवतीय पछुआ पवन का सिद्धांत क्लोन महोदय ने ITCZ के आधार पर दिया था. इसके अनुसार विषुवतीय पछुआ पवन ही सूर्य के उत्तरायण के साथ भारत में प्रवेश कर जाता है जिसकी दिशा दक्षिण पश्चिम से उत्तर पूर्व होती है.

विषुवतीय प्रदेश में उत्तर पूर्वी व्यापारिक पवन एवं दक्षिण पूर्वी व्यापारिक पवन के अभिसरण से विषुवतीय पछुआ पवन की उत्पत्ति होती है. सूर्य के उत्तरायण की स्थिति में विषुवतीय पछुआ पवन का क्षेत्र उत्तर की ओर विस्थापित होने लगता है. इसका कारण आईटीसीजेड का उत्तर की ओर विस्थापित होना है.

ITCZ का विस्तार यदि भारत के ऊपर अधिक क्षेत्र में हो जाता है तब मानसूनी हवाएं अधिक मजबूत होती है. इस स्थिति में भारत के ऊपर निम्न वायुदाब का क्षेत्र अधिक विस्तृत हो जाता है. इस समय दक्षिण पूर्वी व्यापारिक पवन विषुवत रेखा को पार कर विषुवतीय पछुआ पवन को उत्तर की ओर विस्थापित करती है और यही दक्षिण पश्चिम मानसून को जन्म देती है.

यह संकल्पना भी एक प्रकार की तापीय संकल्पना ही है जिसमें आईटीसीजेड के आधार पर दक्षिण पश्चिम मानसून की व्याख्या की गई है लेकिन किसी वर्ष ITCZ भारत के ऊपर अधिक सक्रिय और कभी कम सक्रिय क्यों रहता है यह तथ्य स्पष्ट नहीं हो पाता.

सूर्य का उत्तरायण दक्षिणायन तो निश्चित समय पर होता है ऐसे में ITCZ की स्थिति में परिवर्तन भी एक निश्चित समय पर होना चाहिए और इसकी सक्रियता भी एक समान रहना चाहिए. ऐसे में इस सिद्धांत द्वारा मानसून की अनियमितता एवं अनिश्चितता की व्याख्या नहीं हो पाती. इसके अतिरिक्त विषुवतीय पछुआ पवन की अवधारणा को स्वीकार नहीं किया जा सकता क्योंकि मानसून पवन एक विशिष्ट प्रादेशिक पवन है लेकिन इस सिद्धांत की आईटीसीजेड की अवधारणा को मानसून की उत्पत्ति का एक प्रमुख कारण माना गया है.

जेट स्ट्रीम और मानसून

जेट स्ट्रीम सिद्धांत द्वारा मानसून की उत्पत्ति की अधिक वैज्ञानिक व्याख्या हो सका. भारतीय वैज्ञानिक कोटेश्वरम ने भारतीय मानसून एवं जेट वायु धारा के अंतर संबंधों की व्याख्या की.

वैश्विक स्तर पर यीस्ट ने जेट स्ट्रीम संकल्पना का प्रतिपादन किया था. 1973 में भारत और पूर्व सोवियत संघ ने मानसून की अध्ययन के लिए उपग्रह आधारित मोनिक्स अभियान प्रारंभ किया. मोनिक्स के अध्ययन के आधार पर मानसून एवं जेट स्ट्रीम के अंतर संबंधों की वैज्ञानिक व्याख्या की जा सकी और मानसून की अनियमितता एवं अनिश्चितता को भी समझा जा सका.

इस सिद्धांत के अनुसार भारतीय मानसून को उपोष्ण पछुआ जेट और उष्ण पूर्वी जेट प्रभावित करता है. दोनों के अंतर्संबंध से मानसून की सक्रियता निर्धारित होती है. 

अलनिना प्रभाव एवं ENSO (अलनिना दक्षिणी दोलन)

अलनिना दक्षिण अमेरिका के पेरू तट पर सामान्यतः 3-4 वर्षो के अंतराल पर दिसंबर माह में उत्पन्न होने वाली एक उपसतही (सतह से थोड़ा नीचे) गर्म जल धारा है. इसका सामान्य प्रभाव पेरू तट पर अधिक वर्षा एवं ताप में वृद्धि के रूप में होता है.

जब कभी अलनिना जलधारा अधिक गर्म हो जाती है तब यह प्रशांत महासागर को गर्म करते हुए विषुवतीय जलधारा के साथ पश्चिम की ओर प्रवाहित होता हुआ दक्षिणी मध्य हिंद महासागर तक पहुंच जाती है. इसके कारण हिंद महासागर के ऊपर निम्न वायुदाब के क्षेत्र का विकास होता है. इस समय तक सूर्य की स्थिति विषुवत रेखा के उत्तर होने लगती है और भारत में मानसून की उत्पत्ति की दशाएं विकसित होने लगती है और भारत में मानसून की उत्पत्ति की दशाएं विकसित होने लगती है.

मई-जून में जब अरब सागर में उच्च वायुदाब और भारत में निम्न वायुदाब की स्थिति उत्पन्न होती है तब इस समय अलनीना द्वारा विकसित निम्न वायुदाब का क्षेत्र अरब सागर से हवाओं को खींचने लगता है. ऐसे में दक्षिणी पश्चिमी मानसून हवाएं कमजोर पड़ जाती है और मानसून कमजोर हो जाता है. इससे भारत में अनावृष्टि और सूखे की समस्या उत्पन्न होती है.

जब कभी अलनीना द्वारा विकसित निम्न वायुदाब का क्षेत्र अधिक मजबूत होता है तब भारत के स्थलीय भाग से भी हवाएं अलनिना निम्न वायुदाब की ओर वायुधारा प्रवाहित होने लगती है. यह स्थिति बड़े सूखे को उत्पन्न करती है.

अलनिना की उत्पत्ति दक्षिणी आईटीसीजेड की स्थिति में होती है. ITCZ की विषुवत रेखा के दक्षिण स्थिति को दक्षिणी दोलन कहते हैं. इस समय अलनिना के अधिक गर्म होने की स्थिति में दक्षिणी महासागरों के तापमान में अधिक वृद्धि हो जाती है और वृहद क्षेत्र पर निम्न वायुदाब का विकास होता है. इस घटना को संयुक्त रूप से अलनीना दक्षिणी दोलन (ENSO) कहते हैं. ENSO के कारण भारतीय मानसून कमजोर हो जाता है.

स्पष्ट है कि मानसून की प्रवृत्तियों को कई कारक प्रभावित करते हैं इसमें अलनीना एवं ENSO भी प्रमुख है.

लालिना

यह अलनीना जलधारा के विपरीत ठंडी जलधारा है. इसके कारण सागरों के सतह के तापमान में कमी आने से इन क्षेत्रों में उच्च वायुदाब का विकास होता है. इस समय दक्षिण मध्य हिंद महासागर के तापमान में भी कमी आ जाती है, जिसके कारण दक्षिणी पश्चिमी मानसून मजबूत होता है. जब अलनीना प्रभाव नहीं होता तब लालीना प्रभाव उत्पन्न होता है. इससे अतिवृष्टि की समस्या भी उत्पन्न होती है जो बाढ़ का एक प्रमुख कारण है.

हेडली चक्र

यह तिब्बत का पठार और मेडागास्कर के मध्य विकसित वायु कोस है. ग्रीष्म काल में हेडली कोष के विकसित होने की स्थिति में भारतीय मानसून मजबूत होता है. क्योंकि मेडागास्कर के उच्च वायुदाब से हवाएं हिंद महासागर से आर्द्रता ग्रहण करते हुए भारत की ओर आती है यह दक्षिणी पश्चिमी मानसून को भारत की ओर धकेलने का कार्य करती है.

वाकर चक्र

यह जलीय सतह पर विकसित वायु कोष है जो मानसून पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है. इसकी उत्पत्ति का कारण अलनीना गर्म जलधारा द्वारा मध्य पश्चिमी प्रशांत महासागर का गर्म होना और निम्न वायुदाब का विकास है. प्रशांत महासागर में निम्न वायुदाब से ऊपर उठने वाली हवाएं प्रशांत महासागर में प्रशांत वाकर चक्र और हिंद महासागर में हिंद वाकर चक्र का विकास करते है. हिंद वाकर चक्र प्रशांत महासागर एवं अरब सागर के मध्य विकसित होता है. यह हेडली चक्र को कमजोर करती है और अरब सागर (उच्च वायु दाब) से प्रशांत महासागर की ओर ले जाने का कार्य करती है.

ध्रुवीय भंवर

ध्रुवीय प्रदेश में ठंडी हवाओं के क्षेत्र को जो ध्रुवीय क्षेत्र को घेरे रहते हैं उन्हें ध्रुवीय भंवर कहते हैं. यह वर्ष भर विकसित रहता है लेकिन शीतकाल में अधिक विस्तृत हो जाता है. इसका प्रभाव मानसूनी दशाओं पर भी होता है.

सूर्य के उत्तरायण के समय दक्षिणी ध्रुवीय भंवर का विस्तार उत्तरी हिंद महासागर तक होने से यहां उच्च वायुदाब क्षेत्र में वृद्धि हो जाती है जो दक्षिण पश्चिम मानसून के लिए अनुकूल होती है. इस समय उत्तरी ध्रुवीय भवर उत्तरी ध्रुव की ओर भी स्थापित हो जाता है और इसके क्षेत्र में कमी आ जाती है. इस स्थिति में तिब्बत का पठार और हिमालय क्षेत्र अधिक गर्म होने लगता है जो मानसून की उत्पत्ति में सहायक है.

स्पष्ट है की मानसून एक वृहद प्रभाव वाली मौसमी पवन है और ऋतु के अनुसार इसकी दिशा में उत्क्रमण होता है. लगभग 6 माह ग्रीष्म काल में यह दक्षिण पश्चिम से उत्तर उत्तर पूर्व की ओर और शीत काल में उत्तर पूर्व से दक्षिण पश्चिम की ओर प्रवाहित होता है. इन्हें क्रमशः दक्षिणी पश्चिमी मानसून एवं उत्तर पूर्वी मानसून कहते है. इसके उत्पत्ति एवं विचलन के लिए कई कारक जिम्मेदार है.

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