मौर्य कला

मौर्य काल की संस्कृति एवं कला को राजकीय कला एवं लोक कला में बांटकर देखा जा सकता है. राजकीय कला में राजप्रसाद (महल), स्तूप, गुफाएं एवं स्तम्भ आते है, जबकि लोक कला के अंतर्गत यक्ष-यक्षिणी की प्रतिमाएं, धौली का हाथी और मृदमूर्तियों को देखा जाता है. हम यहाँ इसके बारे में अलग-अलग समझेंगें.

राजकीय कला

चन्द्रगुप्त का राजप्रसाद (चन्द्रगुप्त का महल)

एरियन, फाह्यान तथा ह्वेन त्सांग आदि ने पाटलिपुत्र में चन्द्रगुप्त मौर्य के विशाल महल की चर्चा की है. आधुनिक काल में D. B स्पूनर ने उत्खनन द्वारा पाटलिपुत्र (कुम्हराहार) से 80 पाषाण स्तंभों का निचला हिस्सा प्राप्त किया था. माना जाता है की यह चन्द्रगुप्त का महल था जो बड़े-बड़े पाषाण स्तम्भों पर लकड़ी का इस्तेमाल कर बनाया गया होगा.

स्तूप

बौद्ध परम्परा के अनुसार असोक ने 84000 स्तूपों का निर्माण करवाया था. अशोक द्वारा निर्मित स्तूपों में साँची एवं भरहुत (दोनों मध्य प्रदेश), धर्मरजिता (तक्षशिला), चौखंडी (सारनाथ), एवं बोधगया का स्तूप महत्वपूर्ण है.

गुफाएं

सर्वप्रथम मौर्यों ने (अशोक ने) पहाड़ी काटकर गुफाओं का निर्माण करवाया. अशोक द्वारा बराबर की पहाड़ी पर कुल 4 तथा दसरथ द्वारा नागार्जुनी की पहाड़ी पर कुल 3 गुफाओं का निर्माण कराया गया. ये सभी गुफाएं केवल आजीवकों को दान में दी गई. इन पर मौर्यकालीन पॉलिश मिलती है.

अशोक द्वारा निर्मित गुफाएं :

  • सुदामा
  • विश्वझोंपड़ी
  • लोमषऋषि
  • कर्ण चौपर

दसरथ द्वारा निर्मित गुफाएं :

  • बहियका
  • बद्थिका
  • गोपिका

अशोक का स्तम्भ

अशोक ने कई स्तम्भों का निर्माण कराया. ये स्तम्भ कला के महत्वपूर्ण उदाहरण है. ये एकाश्म है अर्थात पूरा स्तम्भ एक पत्थर को काटकर बनाया गया गया है, इसमें कहीं भी कोई जोड़ नहीं है. शीर्ष पर कमल, पीठिका और जानवर बनाया गया है. चूलें काटकर स्तम्भ के साथ फिक्स किया गया है. कला की दृष्टि से इन स्तंभों को चार भागो में बांटकर अध्ययन किया जाता है.

1. यष्टि: स्तंभों की यष्टि एक ही पत्थर को काटकर बनाई गई है. इन पर इतनी अच्छी पॉलिश की गई है की ये शीशे की भांति चमकते है.

2. यष्टि के ऊपर उलटे कमल की आकृति: यष्टि के सिरे पर उल्टे कमल अथवा उल्टे घंटे जैसी आकृति है.

3. पीठिका: घंटे के उपर पीठिका बनाये गए है. पीठिका पर विभिन्न पशु आकृतियां जैसे हंस, हाथी, बैल आदि मिलते है.

4. शीर्ष पर बनाये गए जानवर: विभिन्न स्तम्भों में विभिन्न जानवर की मूर्तियाँ जैसे की शेर, हंस, हाथी, बैल आदि बनाये गए है. इनमे सारनाथ के स्तम्भ पर बनाये सिंहशीर्ष सर्वोत्कृष्ट है. इसके पीठिका पर चार सजीव से शेर पीठ से पीठ सटाये हुए तथा चरों दिशा में मुंह किये दृढ़तापूर्वक बैठे है. ये सम्राट अशोक के शक्ति के प्रतीक प्रतीत होते है.

अशोक स्तम्भ का उद्देश्य

  • राजकीय वैभव का प्रदर्शन
  • जनता से संवाद
  • धम्मनीति के प्रति लोगों का समर्थन जुटाना
  • इसे बनाने के पीछे दार्शनिक, राजनितिक, तकनीकी और सामाजिक आयाम सन्निहित थे.

विदेशी प्रभाव का मुद्दा

कुछ विद्वानों ने अशोक के स्तम्भ को ईरानी प्रभाव से विकसित बताया है. इसके पीछे वे निम्न तर्क देते है:

  • सुसा तथा एक पत्ना में मौर्यों से पहले स्तम्भों का निर्माण हुआ. मौर्यों ने इसका अनुसरण कर स्तम्भ बनवाए.
  • अशोक के स्तम्भ पर बने घंटे की भांति वहां भी एक घंटा है जो पहले से है.
  • दोनों स्तम्भों पर शीर्ष पर मूर्तियाँ बनी है.

हालाँकि कुछ विद्वानों का ठीक विपरीत मत है उनका मानना है अशोक का स्तम्भ विदेशी प्रभाव से ग्रसित नहीं है. इसके पीछे वे निम् मत देते है.

  • अशोक के स्तम्भ स्वतंत्र स्तम्भ है जबकि ईरानी स्तम्भ स्वतंत्र नहीं है बल्कि भवन के भगा के रूप में बने है.
  • अशोक का स्तम्भ एकाश्म है जबकि ईरानी स्तंभ कई टुकड़ों में बने है तथा उसमें बांसुरीनुमा छिद्र मिलते है.
  • अशोक के स्तम्भ पर घंटा न होकर उल्टा कमल बना है.
  • पीठिका पर जो जानवर है (बैल, हाथी, घोडा, शेर) वे सभी भारतीय है. बैल तथा हाथी वैसे ही है जैसा हड़प्पा में दिखाई देते है.

ईरानी स्तंभों तथा अशोक के स्तम्भों का विश्लेषण तार्किक ढंग से किया जाना चाहिए. यह सही है की मौर्यों से पहले ईरानियों ने स्तंभ बनवाए लेकिन ईरानी प्रभाव सांस्कृतिक रूप में हो सकता है. यथार्थ में यह स्वदेशी शिल्पियों के कौशल तथा श्रम का परिणाम है. ऐसा नहीं है की शिल्पियों ने अंधाधुंध नकल किया हो.

लोक कला

यक्ष-यक्षिणी की प्रतिमाएं

मौर्य काल में आम लोगो द्वारा बेहतर यक्ष-यक्षिणी की प्रतिमाएं बनायी जाती थी. आमलोग इनकी पूजा करते थे. विविध धर्मों में हिन्दू, बौद्ध, जैन में ये प्रतिमाएं विद्यमान थी.

दीदारगंज (पटना) की चामरग्राहिणी यक्षिणी तथा परखम (मथुरा) की यक्ष प्रतिमा कला की दृष्टि से काफी सुंदर है.

धौली का हाथी

धौली की पहाड़ी (उड़ीसा) पर आम लोगों द्वारा हाथी की प्रतिमा पत्थर को काटकर बनाई गई है. यह ऐसे बनाया गया है मनो हाथी पहाड़ी से निकल रहा हो.

मृदमूर्तियां

मौर्या काल में भारी संख्या में मिटटी की मूर्तियाँ मिली है. इसमें स्त्री-पुरुष, पशु-पक्षी की मूर्तियाँ है. इन्हें काफी कलात्मक कहा जा सकता है.

स्पष्ट है की मौर्य काल कलात्मक उपल्ब्धियों का काल था. मौर्यकालीन संस्कृति एवं कला की सम्पन्नता के बारे में तत्कालीन दूत और यात्री द्वारा लिखे गए पुस्तकों के अतिरिक्त खुदाई से भी जानकारी मिलती है.

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