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बिहार की भाषा एवं चित्रकला

मैथिली प्राचीन मिथिला (विदेह, वर्तमान तिरहुत) की भाषा है, जिसमें ब्राह्मणवादी जीवन व्यवस्था की प्रधानता है। मैथिली बिहार की एकमात्र बोली है, जिसकी अपनी लिपि (तिरहुत) और समृद्ध साहित्यिक इतिहास है। मैथिली के प्राचीनतम और सर्वाधिक प्रसिद्ध रचनाकारों में विद्यापति अपने श्रृंगारिक व भक्ति गीतों के लिए विख्यात हैं।

भोजपुरी बोली में शायद ही कोई लिखित साहित्य है, लेकिन इसका मौखिक लोक साहित्य प्रचुर है। मगही का लोक साहित्य भी काफ़ी समृद्ध है। आधुनिक हिन्दी व उर्दू साहित्य में बिहार के मैदानी क्षेत्रों के रचनाकारों का भी उल्लेखनीय योगदान है।

आज बिहार की आधिकारिक भाषाएँ हिन्दी भाषा और उर्दू हैं, परन्तु अधिकांश लोग बोलचाल में बिहारी भाषा (मागधी, मैथिली, भोजपुरी और अंगिका) का प्रयोग करते हैं।

पटना कलम

मुगल साम्राज्य के पतन के काल में शाही दरबार में कलाकारों को प्रशय ना मिलने के कारण इनका पलायन अन्य क्षेत्रों में होने लगा था. फलतः चित्रकला विभिन्न क्षेत्रीय रूपों में भी विकसित हुई. इन्हीं में से एक पटना कलम या पटना शैली भी है . इस चित्र कला के विकास का युग 18 वीं शताब्दी के मध्य से लेकर 20 वीं शताब्दी की शुरुआत तक रहा. इस शैली पर एक ओर मुगलशाही शैली का प्रभाव दृष्टिगोचर होता है तो दूसरी ओर तत्कालीन ब्रिटिश कला का भी.  साथ ही साथ इसमें स्थानीय विशिष्टताएं भी स्पष्ट है.

पटना कलम की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित है

लघुचित्र

पटना कलम के चित्र लघुचित्रों की श्रेणी में आते हैं, जिन्हें अधिकतर कागज और कहीं-कहीं हाथी दांत पर बनाया गया है. इस शैली की प्रमुख विशेषता इसका सादगीपूर्ण तथा समानुपातिक होना है. इन चित्रों में मुग़ल चित्रों की भव्यता का अभाव है. साथ ही कांगड़ा चित्र शैली के विपरीत इनमें भवन स्थापत्य कला की विशेषताएं भी अनुपस्थित है. इसमें चटख रंगों का प्रयोग नगण्य है.

सामान्य जनजीवन का चित्रांकन

इस शैली में बिहार के सामान्य जन जीवन का चित्रण हुआ है. इसके द्वारा परंपरागत भारतीय शैली की भी अभिव्यक्ति हुई है. इसके चित्रों में श्रमिक वर्ग, दस्तकारी वर्ग, तत्कालीन आवागमन के साधनों, बाजार के दृश्यों (मछली की दुकान, साड़ी की दुकान, गांजे की दुकान, मिठाई की दुकान आदि) का चित्रांकन हुआ है. इसी तरह मदरसा, पाठशाला, दाह संस्कार, त्योहारों एवं साधु-संतों के भी चित्र बनाए गए हैं.

बारीकी एवं अलंकरण की विशेषता

जहां तक बारीकियों का प्रश्न है, पटना कलम शैली के चित्रकारों को इसमें महारत हासिल था. इस शैली के चित्रों में चिड़ियों का चित्रण खास तौर से देखने योग्य है. इन चित्रों को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि इन कलाकारों को पक्षियों के शरीर विज्ञान की गहन जानकारी थी.

कहीं-कहीं इन कलाकारों की दबी हुई कल्पनाएं अलंकरण के साथ मुखरित होती हैं जैसे – महादेव लाल द्वारा बनाई गई रागिनी गांधारी चित्र, जिसमें नायिका के विरह के अवसाद को बहुत बारीकी से दर्शाया गया है. माधोलाल द्वारा बनाई गई रागिनी तोड़ी पर आधारित चित्र भी उल्लेख्य है, जिसमें विरहिणी नायिका को वीणा लिए हुए दिखाया गया है. इसी तरह शिवलाल द्वारा निर्मित मुस्लिम निकाह का चित्र तथा यमुना प्रसाद द्वारा चित्रित बेगमों की शराबखोरी का चित्र महत्वपूर्ण है.

पृष्ठभूमि एवं लैंडस्केप का कम प्रयोग

इस शैली में पृष्ठभूमि एवं लैंडस्केप का ज्यादा प्रयोग नहीं किया गया है. कारण इसमें चित्रकार की कल्पना को मूर्त रूप देना पूर्ण रूप से संभव नहीं था क्यूंकि पृष्ठभूमि एवं प्राकृतिक दृश्यों को बढ़ाना महंगा पड़ता था और इसकी पूर्ति करने वाला कोई नहीं था. अतः इन लोगों ने कम खर्चीले प्रयोग करना ज्यादा उचित समझा. जैसे मनुष्य के चित्रों में ऊंची नाक, भारी भवें, पतले चेहरे, गहरी आंखें और घनी मूंछे दिखाई गई है.

रंगने की निजी शैली

कलाकार 1-2 बालों वाले ब्रशों का इस्तेमाल महीन कार्यों के लिए किया करते थे. तूलिकाएं  गिलहरी की दुम के बालों से तैयार की जाती थी, कारण वे  मुलायम होती थी. मोटे कामों के लिए बकरी, सूअर अथवा भैंस के गर्दन के बालों का इस्तेमाल किया जाता था.

चित्रकार विभिन्न शेड्स के लाल रंग लाह से सफेद रंग विशेष प्रकार की मिट्टी से, काला रंग कालिख अथवा जलाए गए हाथी – दांत की राख से, नीला रंग नील से, लाजवर्त रंग लेपिस लेजूली नामक पत्थर से प्राप्त करते थे.

मुगल शैली सेभिन्न शैली

पटना कलम शैली में मुगल शैली के चित्रों की भव्यता का अभाव है. इसमें ना तो मुगल शैली के चित्रों की भांति राजे रजवाड़ों से संबंधित विषय वस्तु है और ना ही इनकी ट्रीटमेंट में उस वैभव के भी दर्शन होते हैं. पटना कलम में सजीवता और सामान्य जीवन से उनके घनिष्ठ संबंध सबसे महत्वपूर्ण बात है इसके अलावे रंगो के उपयोग और छायांकन के तरीके में भी स्पष्ट अंतर दिखता है.

उद्भव, विकास एवं पतन

पटना कलम शैली के कलाकारों के पूर्वज मुगल शैली अथवा पहाड़ी चित्र शैली के चित्रकार रहे हैं. इस शैली के प्रारंभिक चित्रों पर मुग़ल शैली एवं पहाड़ी शैली की छाप स्पष्ट दिखलायी देती है. पटना में रहने वाले कुछ ऐसे कलाकारों ने जो कोलकाता में लगातार संपर्क में थे कोलकाता के माध्यम से यूरोपीय प्रभाव को भी ग्रहण किया एवं अपनी कृतियों में उसे प्रदर्शित किया. परंतु आगे चलकर इन चित्रों की प्रस्तुति में सादगी एवं विषय वस्तु में सरलता तथा मौलिकता आती चली गयी.

लगभग एक शताब्दी तक यह शैली खूब प्रचलित रही लेकिन 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में इस शैली का पतन प्रारंभ हो गया क्योंकि इस समय तक अनेक कला संरक्षक काल कवलित हो गए थे एवं अनेक कलाकार आश्रयहीन  हो गए थे.

पटना शैली के कलाकारों में सबसे पहला नाम सेवकराम का है. उन्हीं के समकालीन हैं – हुलास लाल. अन्य महत्वपूर्ण चित्रकार हैं – श्री जयराम दास, शिवदयाल लाल ,गुरसहाय लाल आदि. इस चित्रकला के अंतिम आचार्य ईश्वरी प्रसाद वर्मा के पटना से कोलकाता चले जाने के बाद बिहार में इस कला की पहचान बरकरार रखने के लिए राधा मोहन बाबू ने दिन-रात अथक प्रयास किया था.

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