अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय

किसी आधुनिक देश की भौगोलिक सीमा के अंदर उस देश का सर्वोच्च न्यायालय न्याय व्यवस्था का निर्वाह करता है, लेकिन यदि बात दो देशों के बीच विवाद की हो तो इसे किसी एक देश की न्यायपालिका के ऊपर छोड़ना सही नहीं हो सकता था। यहीं से अंतरराष्ट्रीय न्यायपालिका की अवधारणा का सूत्रपात होता है।

अंतरष्ट्रीय न्यायालय एक ऐसी संस्था है जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर न्याय व्यवस्था का कार्यभार संभालती है। दो या दो से अधिक देशों के आपसी विवाद के निपटारे की दृष्टि से यह संस्था बहुत अधिक महत्व धारण करता है।

अंतरराष्ट्रीय न्यायालय की स्थापना नीदरलैंड के हेग में 3 अप्रैल 1946 को की गई। इसकी स्थापना, कार्य आदि के बारे में संयुक्त राष्ट्र की घोषणा पत्र के अध्याय 14 के अनुच्छेद 92-96 तक में चर्चा की गई है।

अंतरराष्ट्रीय न्यायपालिका का एक पृथक संविधान है जिसे अंतरराष्ट्रीय न्यायालय की संविधि भी कहा जाता है| इसमें 5 अध्याय तथा 70 अनुच्छेद है। इसमें न्यायालय के अधिकार, अधिकार क्षेत्र, कार्य संचालन के नियम, संगठन आदि प्रावधानों की चर्चा की गई है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कार्य कर रहे इस न्यायालय में न्यायाधीश की भूमिका के रूप में किस देश का व्यक्ति कार्य करेगा, यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है| जिस तरह संयुक्त राष्ट सुरक्षा परिषद् में कुछ देशों को विशेष वरीयता प्राप्त है उसी तरह क्या केवल कुछ देशों के नागरिक ही इसमें न्यायाधीस की भूमिका निर्वाह करेंगें?

अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में न्यायाधीशों अथवा जजों की संख्या 15 होती है और ये किसी भी सदस्य देश के नागरिक हो सकते है| ये व्यक्ति अपने राष्ट्र में विधिवेत्ता के रूप में ख्याति प्राप्त कर चुके अंतरराष्ट्रीय कानून के विशेषज्ञ होते हैं| इंटरनेशनल कोर्ट के संविधान के अनुसार न्यायाधीशों का नैतिक चरित्र ऊंचा होना चाहिए और उनमें वह योग्यताएं होनी चाहिए जो उनके देश की न्याय संबंधी उच्च संस्थाओं के मुख्य न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति के लिए आवश्यक हो।

अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति संयुक्त राष्ट्र महासभा एवं सुरक्षा परिषद में अलग-अलग मतदान द्वारा 9 वर्षों के लिए किया जाता है। किसी भी व्यक्ति को इसके लिए एक से अधिक बार भी चुना जा सकता है| न्यायाधीशों का चुनाव जाति, रंग तथा धर्म के आधार पर न करते हुए योग्यता के आधार पर किया जाता है। इसमें ध्यान रखा जाता है कि आईसीजे में संसार के सभी न्याय व्यवस्थाओं को प्रतिनिधित्व प्राप्त हो सके।

न्यायाधीशों की नियुक्ति में ध्यान रखा जाता है कि किसी एक राष्ट्र के एक से अधिक न्यायाधीशों की नियुक्ति न की जा सके| आईसीजे के 15 न्यायाधीश में से हर तीसरे वर्ष 5 न्यायाधीश पद मुक्त होते हैं| इन पदों को भरने के लिए पुनः चुनाव करवाया जाता है।

किसी भी न्यायाधीश को उसके स्वयं के अतिरिक्त अन्य सभी न्यायाधीशों के एकमत वोट द्वारा हटाया जा सकता है| इन न्यायाधीशों को कोई अन्य व्यवसाय अथवा कोई राजनीतिक कार्य करने की मनाही होती है।

न्यायालय अपने कार्य संचालन के नियम स्वयं बनाता है। यह अपने में से ही एक अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष को 3 वर्ष के लिए चुनते हैं| न्यायालय अपने मुख्यालय के अतिरिक्त विश्व में किसी भी स्थान पर अपना अधिवेशन तथा कार्य संचालन कर सकता है| किसी भी कार्यवाही संचालन के लिए न्यायाधीशों की न्यूनतम संख्या 9 है| न्यायालय के अधिकारिक मान्यता प्राप्त भाषाएं फ्रेंच और अंग्रेजी हैं|

यह उन सभी मामलों पर विचार कर सकता है जिन्हें कोई देश न्यायालय के सम्मुख प्रस्तुत करें। संयुक्त राष्ट्र घोषणा पत्र के अनुच्छेद 93 के अंतर्गत ऐसा कोई देश जो संयुक्त राष्ट्र का सदस्य नहीं है, भी संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा सुरक्षा परिषद की सिफारिश के आधार पर अंतरराष्ट्रीय न्यायालय की संविधान का एक पक्ष बनाया जा सकता है। इसके उदाहरण के रूप में नौरू का नाम लिया जा सकता है।

आईसीजे परामर्श देने का कार्य भी करती है| संयुक्त राष्ट्र घोषणा पत्र के अनुच्छेद 96 के अनुसार महासभा अथवा सुरक्षा परिषद किसी कानूनी प्रश्न पर अंतरराष्ट्रीय न्यायालय का परामर्श मांग सकता है। इसी तरह संयुक्त राष्ट्र संघ के दूसरे अंग तथा विशेष अभिकरण भी ऐसा परामर्श प्राप्त कर सकते हैं।

कोई भी देश स्वयं घोषणा करके संधि की व्याख्या, अंतरराष्ट्रीय कानून से संबंधित मसले आदि क्षेत्रों में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के आवश्यक क्षेत्राधिकार को स्वीकार कर सकता है। हालांकि यह उन्हीं राज्यों पर लागू होता है जो ऐसा घोषणा करें।

अंतरराष्ट्रीय न्यायालय संविधि के अनुच्छेद 38 के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय न्यायालय विवादों के निपटारे के संबंध में अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों का सहारा ले सकता है| इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय रीति-रिवाज जिन्हें कानूनी दर्जा प्राप्त है और कानून के ऐसे सिद्धांत जिन्हें सदस्य देश मानते हैं का उपयोग किया जा सकता है। विभिन्न देशों के न्यायिक निर्णय जिनसे कानून के शासन की पुष्टि होती है को भी इस हेतु उपयोग किया जा सकता है।

यदि संबंधित पक्ष सहमत हो तो न्यायालय समानता के आधार पर किसी भी मामले का निपटारा कर सकता है।

आमतौर पर अंतरराष्ट्रीय न्यायालय का पूर्ण सेशन आयोजित किया जाता है लेकिन संबंधित पक्ष के अनुरोध पर वह छोटी ईकाईयों वाले चैम्बर के रूप में अपनी बैठकें आयोजित कर सकता है| इन इकाइयों द्वारा दिया गया निर्णय समान रूप से मान्य होता है| पर्यावरण से संबंधित मामले के निपटारे हेतु भी एक अलग चेंबर का गठन किया जाता है।

कुछ बड़े शक्तिशाली देश जैसे चीन, अमेरिका, रूस, जर्मनी, इटली ने स्वयं को अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के निर्णय को बाध्यकारी रूप न मानने के संबंध में अपने यहां कानून पारित किया है| ये ऐसे देश हैं जिन पर कोई भी निर्णय जबरदस्ती लागू नहीं करवाया जा सकता| इन शक्तिशाली देशों के इस व्यवहार से अंतरराष्ट्रीय न्यायालय की मौलिक संकल्पना को ठेस पहुंची है और इसके प्रभावशीलता में कमी आई है|

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