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सिन्धु घाटी सभ्यता

सिन्धु घाटी सभ्यता के प्रमुख स्थल

हड़प्पा

  • यह आधुनिक पाकिस्तान के पंजाब राज्य में मांटगोयरी जिले में स्थित है. यह पुरास्थल रावी नदी के बायें तट पर स्थित है.
  • इसके बारे में सर्वप्रथम जानकारी 1826 ई में चार्ल्स मैसेन ने दी.
  • दयाराम शाहनी ने इसका व्यापक सर्वेक्षण किया और 1923 से यहाँ उत्खनन प्रारम्भ हो सका. 1926 में माधोस्वरूप वत्स ने तथा 1946 में मार्टिमर ने इसका व्यापक स्तर पर उत्खनन करवाया.
  • यहाँ से प्राप्त दो टीलों में पूर्वी टीले को नगर टीला तथा पश्चिमी टीले को दुर्ग टीला के नाम से पहचाना गया है.
  • यहाँ छः छः की पंक्ति में बनाये गए 12 कमरों वालें अन्नागार का अवशेष प्राप्त हुआ है. जिसका क्षेत्रफल लगभग 2745 वर्ग मीटर है.
  • इसके सामान्य आवास क्षेत्र के दक्षिण में एक कब्रिस्तान मिला है.
  • हड़प्पा किले के बाहर कर्मचारियों के आवास, दस्तकारी के मंच और अन्नागार, मजदूरों के लिए आवास प्राप्त हुए है.
  • यहाँ से प्राप्त अन्य महत्वपूर्ण अवशेष में बर्तन पर बना मछुआरे का चित्र, शंख का बना बैल, स्त्री के गर्भ से निकलता पौधा, पीतल की बनी इमका, ईंटों के वृत्ताकार चबूतरे, गेहूं तथा जौ के दाने प्रमुख है.

मोहनजोदड़ो

  • मोहनजोदड़ो का शाब्दिक अर्थ है ‘मृतकों का टीला’.
  • यह आधुनिक पाकिस्तान के सिन्ध प्रान्त में लरकाना जिले में सिंधु नदी के तट पर स्थित है.
  • इस स्थल को राखलादास बनर्जी ने 1922 में पता लगाया. यहाँ एक सुनियोजित नगर के सभी तत्व दिखाई देते है.
  • यहाँ भी दो टीले प्राप्त होते है. इसमें पश्चिमी भाग में स्थित दुर्ग टीले को स्तूप टीला भी कहा जाता है.
  • यहाँ एक महत्वपूर्ण और तत्कालीक समय के लिए अद्भुत सार्वजानिक स्थल मिलता है: विशाल स्नानागार. यह 11.88 मी लम्बा, 7.01 मी चौड़ा और 2.43 मी. गहरा है. इतिहासकारों का मानना है की इसका उपयोग धार्मिक अनुष्ठान आदि अवसरों पर स्नान आदि के लिए होता रहा होगा.
  • यहाँ की सबसे बड़ी इमारत विशाल अन्नागार है. यह 45.71 मी. लम्बा और 15.23 मी. चौड़ा है.
  • यहाँ उत्तर दक्षिण एवं पूर्व पश्चिम की ओर जाने वाली समानांतर सड़को का जाल बिछा था. इसने नगर को लगभग समान आकार वाले खंडो में विभाजित कर दिया था.
  • यहाँ से प्राप्त अन्य महत्वपूर्ण अवशेषों में महाविद्यालय भवन, नृत्य करती हुई स्त्री की प्रतिमा, योगी की मूर्ति, मुद्रा पर अंकित पशुपतिनाथ की मूर्ति, सूती कपडा, हाथी का कपाल खंड, नरकंकाल, घोड़े का दां, सीप की बनी पटरी आदि प्रमुख है.

चन्हुदड़ो

  • हड़प्पा सभ्यता का यह पुरास्थल मोहनजोदड़ो से 80 मील दक्षिण में स्थित है. इसकी खोज 1931 में एम जी मजमुदार ने की थी. इसका उत्खनन 1935 में मैके ने किया.
  • यहाँ प्राक हड़प्पा सभ्यता (हड़प्पा से पहले की संस्कृति) के भी अवशेष मिले है. (झुकर संस्कृति).
  • यह मनके सीप तथा मुद्रा बनाने का प्रमुख केंद्र था. स्पष्ट है की यहाँ के निवासी कुशल कारीगर थे.
  • यहाँ से प्राप्त प्रमुख अवशेष अलंकृत हाथी खिलौना, कुत्ते का बिल्ली का पीछा करते हुए पद चिह्न, सौन्दर्य प्रसाधन आदि है. यहाँ से वक्राकार ईंटे मिली है. यहाँ किसी दुर्ग का अस्तित्व नहीं मिलता.

लोथल

  • यह भारत के गुजरात राज्य के अहमदाबाद जिले में भोगवा नदी के तट पर स्थित है. इस स्थल की खोज डा. एस आर राव ने 1957 में की थी.
  • यह स्थल पश्चिम एशिया के साथ समुद्री व्यापार का प्रमुख बंदरगाह रहा होगा. फारस की मुद्रा और पक्के रंग में रंगे हुए पात्रो से स्पष्ट होता है की लोथल सामुद्रिक व्यापारिक गतिविधियों का केंद्र था. इस पूरा स्थल की सबसे प्रमुख उपलब्धि जहाजो की गोदी (डांक यार्ड) है.
  • यहाँ गढ़ी और नगर दोनों रक्षा प्राचीर से ढंके है. उत्खनन में प्राप्त वस्तु के आधार पर इसे लघु हड़प्पा या मोहनजोदड़ो नगर कहा जा सकता है.
  • यहाँ से प्राप्त प्रमुख अवशेष बंदरगाह, धान (चावल) और बाजरे का साक्ष्य, फारस की मुहरें, घोड़े की लघु मृदमूर्ति आदि है.
  • यहां की सर्वाधिक प्रसिद्ध उपलब्धि हड़प्पा काल की बंदरगाह के आलावा मृदभांड, उपकरण, मनके, मुहरे, बाँट एवं माप, दस्तकारों एवं ताम्र कर्मियों के कारखाने है.

कालीबंगा

  • कालीबंगा का अर्थ है ‘काले रंग की चूड़िया’. यह पुरास्थल राजस्थान के गंगानगर जिले में स्थित है. इसकी खोज ए. घोष ने 1953 में की थी.
  • इस स्थल की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि एक जूते खेत का साक्ष्य है यहां पर प्राक हरप्पा एवं हड़प्पा कालीन संस्कृतियों के अवशेष मिले हैं.
  • यहां के घर कच्ची ईंटों के बने थे यहां शवों की अंत्येष्टि संस्कार हेतु तीन विधियों पूर्ण समाधिकरण, आंशिक समाधिकरण एवं दाह संस्कार के प्रमाण मिले हैं.
  • यहां से प्राप्त प्रमुख अवशेष जूते हुए हल के साक्ष्य, ईटों से निर्मित चबूतरे, हवन कुंड या अग्निकुंड, अलंकृत ईटों का प्रयोग, युगल प्रतीकात्मक समाधिया, बेलनाकार मुहरे इत्यादि है.

अन्य प्रमुख नगर

बनवाली हरियाणा के हिसार जिले में स्थित पूरा स्थल है. इसकी खोज 1973 में आर एस विष्ट द्वारा की गई थी. यहां हड़प्पा पूर्व तथा हड़प्पा कालीन विशेषताएं प्राप्त होते हैं.

सुरकोटदा गुजरात के कच्छ जिले में स्थित पूरा स्थल है, जिसकी खोज 1964 में जगपति जोशी ने की थी. यहां से घोड़े की अस्थियां मिली है जो किसी भी अन्य हड़प्पा कालीन स्थल से प्राप्त नहीं हुई है.

रंगपुर गुजरात के अहमदाबाद जिले में स्थित एक हड़प्पा पूरा स्थल है. इसकी खोज 1931 में एमएस वत्स ने की थी. यहां से धान की भूसी के ढेर, कच्ची ईंटों के दुर्ग, नालियां, मृदभांड इत्यादि प्राप्त हुए हैं.

कोटदीजी सिंध प्रांत के खैरपुर में स्थित पुरास्थल है, जिसकी खोज 1935 में धुर्रो ने की थी. 1955 से फजल अहमद खान ने इसके नियमित खुदाई कराई. इतिहासकारों का मानना है कि संभवत इसी स्थल से पाषाण युगीन सभ्यता का अंत तथा हड़प्पा सभ्यता का विकास हुआ.

धोलावीरा गुजरात के कच्छ जिले में स्थित एक महत्वपूर्ण पुरास्थल है, जिसकी खोज 1990-1991 में आर एस विष्ट ने की. धौलावीरा वर्तमान भारत में खोजे गए हड़प्पा कालीन दो विशालतम नगरों में से एक है. इस श्रेणी का दूसरा विशालतम नगर हरियाणा में स्थित राखीगढ़ी है.

धोलावीरा तीन प्रमुख भागों में विभाजित था जिसमें से 2 भाग आयताकार दुर्ग या प्राचीर द्वारा पूरी तरह सुरक्षित थे. ऐसी नगर योजना हड़प्पा कालीन अन्य नगरों में देखने को नहीं मिलती है.

इसके आलावा मुंडीगाक, मांडा, रोपड़, आलमगीरपुर आदि भी अन्य प्रमुख नगर है.

सिंधु घाटी सभ्यता एक महान सभ्यता थी इसकी योजना विशेषज्ञताएं समकालीन सभ्यता के मुकाबले अधिक उन्नत थी. इसकी जानकारी हमें संबंधित पुरास्थल के उत्खनन से मिलती है. हड़प्पा का विस्तार आज के अफगानिस्तान, पाकिस्तान एवं भारत के वृहद क्षेत्र पर था. 

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