Home BPSC प्रारंभिक परीक्षा भारतीय अर्थव्यवस्था चेक ट्रंकेशन सिस्टम CTS-2010 (Cheque Truncation System)

चेक ट्रंकेशन सिस्टम CTS-2010 (Cheque Truncation System)

पूर्व में यदि एक बैंक खाते से संबंधित चेक किसी अन्य शहर के खाता धारक को प्राप्त होता था तब ऐसी स्थिति में पहले चेक भौतिक रूप में उस शाखा को भेजा जाता था जहां से वह संबंधित है. इसके बाद ही निधि अंतरण हो पाती थी. परंतु CTS-2010 चेक का प्रारूप कुछ इस प्रकार तैयार किया गया है कि उसका स्कैन किया गया प्रतिरूप भी जांचा जा सकता है और इसकी वैधता प्रमाणित की जा सकती है. इससे अब भौतिक रूप से बैंक संबंधित शाखा में भेजना अनिवार्य नहीं रह गया.

CTS यानी चेक ट्रंकेशन सिस्टम. इस सिस्टम के तहत चेक की एक इलेक्ट्रॉनिक इमेज कैप्चर हो जाती है और ​फिजिकल चेक को एक बैंक से दूसरे बैंक में क्लियरेंस के लिए भेजने की जरूरत नहीं होती. सब कुछ आॅनलाइन हो जाता है. इससे फिजिकल चेक्स को मैनेज करने, उन्हें एक जगह से दूसरी जगह भेजने का झंझट खत्म हो जाता है. साथ ही इस पर आने वाले खर्च और चेक क्लियरेंस में लगने वाले टाइम की भी बचत होती है.

वहीं नॉन-CTS चेक कंप्यूटर द्वारा रीड नहीं किए जा सकते. इसलिए उन्हे फिजिकली ही एक जगह से दूसरी जगह क्लियरेंस के लिए भेजना होता है. लिहाजा क्लियरेंस में वक्त भी ज्यादा लगता है. RBI बैंकों को पहले ही यह निर्देश भी दे चुका है कि वे केवल CTS-2010 स्टैंडर्ड चेक वाली चेकबुक्स ही इश्यू करेंगे.

क्या है CTS के फायदे?

सीटीएस के तहत एक बैंक से चेक संबंधित दूसरे बैंक को चेक वास्तविक रूप से भेजने के बजाय इलेक्ट्रॉनिक रूप से उसकी तस्वीर भेजी जाती है. चेक के एक जगह से दूसरी जगह फिजिकल फॉर्म में न जाने के चलते लागत घटती है और चेक कलेक्शन में लगने वाला वक्त भी कम हो जाता है. इस सबके चलते चेक की प्रॉसेसिंग में लगने वाला वक्त घटता है और चेक जल्दी क्लियर होता है.

चेक की इलेक्ट्रॉनिक इमेज भेजे जाने से इसके अलावा चेक एक जगह से दूसरी जगह फिजिकली भेजे जाने पर उसके गुम होने या डैमेज होने का खतरा रहता है. लेकिन सीटीएस में ऐसा कोई झंझट नहीं है.

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