हिंदू धर्म

हिंदू धर्म की गणना विश्व के प्राचीन धर्मों में की जाती है | कोई एक विशेष संस्थापक अथवा विशेष ग्रंथ ना होने के कारण इस धर्म की व्याख्या कठिन है | 2011 के जनगणना के अनुसार भारत की 79.8 % आबादी इस धर्म को मानती है | इस तरह से सर्वाधिक भारतीय जनसंख्या द्वारा माने जाने वाली धर्म के रूप में हिन्दू धर्म स्थापित है |

मूल रूप से हिंदू शब्द न तो धर्म का प्रतीक था और न ही किसी विचारधारा का | इसके पीछे भौगोलिक परिस्थितियां जिम्मेदार थी | प्राचीन ईरानियों ने सिंधु नदी के पूर्व के क्षेत्र को हिंद कहा और इस क्षेत्र में रहने वाले लोगों को हिंदू कहा | कालांतर में हिंदू शब्द धर्म और संस्कृति से जुड़ गया और उस समय प्रचलित धर्म को हिंदू धर्म की संज्ञा दी गई |

वास्तव में हड़प्पा संस्कृति के धार्मिक विश्वासों और आर्यों से पहले भारत में रहने वाले लोगों के धार्मिक विश्वासों का समन्वय होने पर विविध प्रकार के धार्मिक विश्वासों और प्रथाओं का विकास हुआ, जो सब मिलाकर हिंदू धर्म का अंग माने जाते हैं | इस तरह हिंदू धर्म कभी एक रूप स्थिर और अपरिवर्तनशील धर्म नहीं रहा है | वह अपने को बदलती हुई परिस्थितियों और दशाओं के अनुरूप बनाने में समर्थ रहा है |

विविध सिद्धांतों मतों और कर्मकांड के कारण हिंदू धर्म में अनेक संप्रदायों का जन्म हुआ | कालक्रम में इन संप्रदायों ने पूजा की अपनी पद्धतियां विकसित की | परंतु प्रत्येक संप्रदाय अपनी व्यवस्था का अनुसरण करते हुए भी दूसरे के विचारों के प्रति सम्मान पूर्वक दृष्टिकोण रखते हैं |

अन्य धर्मों की भांति इस धर्म के एक नहीं बल्कि अनेक ग्रंथ हैं जिनमें सबसे महत्वपूर्ण वेद माने गए हैं | वेद चार हैं: ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद | ऋग्वेद में देवताओं के लिए की जाने वाली स्तुतियां हैं जिनका उपयोग यज्ञों के समय किया जाता है | यजुर्वेद उन तमाम कर्मकांड का विवरण है जिन्हें पुरोहित करवाते थे | सामवेद में ऋचाओं की संगीतमय प्रस्तुति है | अथर्ववेद मुख्यतया जादू टोना और तंत्र मंत्र का संग्रह है |

वेद के अलावा ब्राह्मण, पुराण, उपनिषद और भगवत गीता भी हिंदू धर्म से संबंधित प्रमुख ग्रंथ माने जाते हैं | हिंदू धर्म में दो महाकाव्य महाभारत और रामायण भी श्रेष्ठ माने जाते हैं |

आरंभिक वैदिक धर्म में मूर्तियों या मंदिरों का कोई स्थान नहीं था | कालक्रम में अनेक कर्मकांड एवं अदृश्य शक्ति की पूजा प्रतिको एवं मूर्तियों के रूप में होने लगी | आज भी हिंदू धर्म में अनेक अनेक देवताओं का स्थान है उनकी पूजा की जाती है लेकिन इसका बुनियादी रुप कर्म और सांसारिक सिद्धांतों से जुड़ा है | 

उपनिषदों के अनुसार जीवन में चार अवस्थाएं होती है जिन्हें आश्रम के नाम से जाना जाता हैं | चार आश्रम हैं:  ब्रह्मचर्य आश्रम, गृहस्थ आश्रम, वानप्रस्थ आश्रम और सन्यास आश्रम | यह सभी अवस्थाएं अंतरिम अवस्थाएं होती हैं जिन से होकर गुजरते हुए भी ध्यान तो अंतिम लक्ष्य पर ही केंद्रित होना चाहिए | यही गंतव्य एकात्मकता की प्राप्ति है यानी मोक्ष है | कर्म और सांसारिक सिद्धांतों का भी उपनिषद की शिक्षा में महत्वपूर्ण स्थान है | कर्म नैतिकता के संसार का एक आधारभूत नियम है | चेतन अवस्था में किए गए कार्य अचेतन रूप से आदते बन जाती है और मनुष्य के चरित्र का हिस्सा हो जाती है | प्रतिक्रिया स्वरूप चरित्र कार्य और उसके परिणामों को निर्धारित करता है |

चिंतकों ने अलौकिक समस्याओं पर नए सिरे से विवेचना की और हिंदुओं के षड दर्शन की व्यवस्था सामने आई | इन छह दर्शनों में से चार सांख्य, न्याय, योग एवं वैशेषिक अपनी रचना में किसी अन्य से प्रभावरहित थे जबकि पूर्व मीमांसा और उत्तर मीमांसा पर वेदों का प्रभाव था | इस काल की एक अन्य बड़ी उपलब्धि थी भगवत गीता | भगवत गीता दुनिया को शिक्षा देती है कि जो कोई भी मेरे पास किसी रास्ते से चलकर आता है मैं उसके पास उसी रास्ते से पहुंचता हूं बहुत से लोग भिन्न-भिन्न रास्तों से मेरे पास पहुंचने के प्रयास में लगे हैं और वह सब रास्ते मेरे हैं |

भारतीय इतिहास का मध्यकाल देश के एक नए सांस्कृतिक जीवन का साक्षी रहा | इस समय एक नई समन्वित परंपरा का क्रमिक विकास हुआ जिसे हिंदी इस्लामी संस्कृति की संज्ञा दी गई | धार्मिक जीवन में यह भक्ति आंदोलन और सूफी मत के रूप में सामने आया | भक्ति आंदोलन का संबंध मुख्यतः हिंदू धर्म से था और इसमें हिंदू धर्म एवं समाज सुधार के साथ-साथ हिंदू-मुस्लिम सहिष्णुता को बढ़ाने का प्रयास किया गया |

भक्ति आंदोलन में सर्व शक्तिमान ईश्वर की आराधना और ऊंच-नीच के बीच भेदभाव की समाप्ति की बात कही गई | भक्ति के विचार उपनिषदों एवं वेदों में मिल जाते हैं | मध्यकाल में इस सिद्धांत को आंदोलन का रूप देने का श्रेय दक्षिण भारत की अलवार और नयनार संतो को दिया जा सकता है | बाद में इन संतों के दो संप्रदाय सामने आए रूढ़ीवादी अर्थात शगुन संप्रदाय व उदारवादी अर्थात निर्गुण संप्रदाय |

रूढ़िवादी समुदाय के प्रमुख संत तुलसीदास थे | निर्गुण संप्रदाय के प्रमुख संतों में कबीरदास और गुरु नानक आते हैं | कबीर इस्लाम और हिंदू दोनों धर्मों के गुणों के प्रशंसक थे पर निरर्थक कर्मकांड के सख्त विरोधी थे | वह तीर्थ व्रत एवं पूजा के वैसे ही विरोधी थे जैसे रोजा और नमाज के विरोधी थे |

कृष्ण भक्ति संप्रदाय का विकास पश्चिम भारत राजस्थान और पूर्वी भारत में विशेष रूप से हुआ इसमें वल्लभाचार्य, मीराबाई और चेतन का विशेष योगदान रहा |

इस प्रकार हिन्दू धर्म के अनुयायियों के दृष्टिकोण एवं विश्वास में भी अंतर है | कोई एकेश्वरवाद में विश्वास करता है तो कोई अपनी आस्था अनेक ईश्वर में प्रकट करता है | किसी की आराध्य राम है तो किसी के विष्णु, कृष्ण, शिव आदि | यद्यपि हिंदू धर्म में दर्शन परंपरा व इष्ट को लेकर मत भिन्नता है किंतु सभी अपने को हिंदू धर्म का अनुयाई मानते हैं |

हिंदू धर्म की विशेषताएं इस प्रकार हैं

  • ईश्वर की सत्ता में असीम आस्था 
  • विभिन्न देवी देवताओं की उपासना 
  • प्रकृति की उपासना में विश्वास 
  • अवतारवाद की अवधारणा में विश्वास 
  • आत्मा की अमरता में विश्वास 
  • वेदों में असीम आस्था 
  • कर्म में विश्वास 
  • पुनर्जन्म में विश्वास 
  • मूर्ति पूजा में विश्वास 
  • जीवन का प्रमुख लक्ष्य मोक्ष प्राप्ति

हिंदू धर्म में ईस्ट इंडिया कंपनी के राज्य में कई आयाम जुड़े | इस समय तक मूल धर्म को दरकिनार करते हुए इसमें काफी अधिक कुरीतियाँ आ चुकी थी | पश्चिमी धर्म, पाश्चात्य सभ्यता और आधुनिक समाज के संपर्क में आने से वे कुरीतियां और उग्र हो उठी | विशेष तौर पर इस उग्रता को उन्होंने अधिक महसूस किया जिन्हें आधुनिक शिक्षा और पाश्चात्य ज्ञान-विज्ञान और दर्शन को समझने का अवसर मिला था | इन लोगों ने हिंदू सामाजिक रचना, रीति रिवाज तथा परंपराओं को तर्क के तराजू पर तौलना शुरू किया | परिणाम स्वरूप सामाजिक एवं धार्मिक आंदोलनों का जन्म हुआ जिनमें ब्रह्म समाज प्रार्थना समाज और थियोसॉफिकल सोसायटी प्रमुख थे |

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