रविवार, फ़रवरी 25, 2024
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Bihar Politics : बिहार की सत्ता बदली तो लाइमलाइट में आए लालू, विधानसभा में हुआ आडवाणी के रथ रोकने का जिक्र

आज विधानसभा का विशेष सत्र नीतीश और तेजस्वी सरकार के शक्ति परीक्षण के लिए बुलाया गया था लेकिन पक्ष-विपक्ष बैठा तो गिले शिकवे भी खूब हुए। जंगलराज का जिक्र हुआ, पुराने सहयोगी नीतीश को कोसते रहे। रन आउट करने की बात हुई। बशीर बद्र का शेर पढ़ा गया- अपना दिल टटोल कर देखिए, यूं ही फासला नहीं होता। इसी दौरान लालू यादव के आडवाणी की रथयात्रा रोकने की चर्चा भी चल निकली। नीतीश की नई सरकार में शामिल कांग्रेस के नेता अजीत शर्मा लालू की तारीफ करने लगे। उन्होंने उस घटना का जिक्र किया जब लालकृष्ण आडवाणी रथ यात्रा लेकर निकले थे और लालू प्रसाद यादव ने उसे रोक दिया था। कांग्रेस के विधायक दल के नेता ने कहा कि बीजेपी को नीतीश कुमार का साथ छोड़ने की कसक हो रही है।

1990 की बात है

आखिर लालू के राज में आडवाणी की रथयात्रा को कैसे रोका गया? वो साल था 1990, राम मंदिर आंदोलन जोर पकड़ रहा था। आडवाणी देशभर में माहौल बनाने के लिए 25 सितंबर 1990 को सोमनाथ मंदिर से रथयात्रा पर निकले। तय किया गया कि 30 अक्टूबर तक रथयात्रा अयोध्या पहुंचेगी। लोगों का अपार समर्थन मिला। लोग रथ की पूजा करते। सोमनाथ से दिल्ली होते हुए रथयात्रा बिहार में प्रवेश कर गई। धनबाद, रांची, हजारीबाग होते हुए पटना पहुंची। बताते हैं कि पटना का गांधी मैदान आडवाणी को सुनने के लिए आए करीब 3 लाख लोगों का गवाह बना। सौगंध राम की खाते हैं, मंदिर वहीं बनाएंगे… के नारे खूब लगे। पटना के आगे क्या हुआ, वह इतिहास में दर्ज हो गया है।

लालू की एक न माने आडवाणी
लालू ने एक इंटरव्यू में बताया था कि जब उनका (भाजपा) चरित्र सामने दिखाई देने लगा, रथ निकालकर बाबरी मस्जिद को शहादत देने और शिलापूजन की बात हुई तब मैं सरकार में था और मैंने कोई परवाह न करते हुए फैसला किया। उस समय केंद्र की वीपी सरकार को भाजपा से बाहरी समर्थन था। शायद इस कारण तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह रथयात्रा रोकने के पक्ष में नहीं थे। लेकिन लालू अपने राज्य में आडवाणी का रथ देखना नहीं चाहते थे। बताते हैं कि लालू ने पहले ही आडवाणी से मुलाकात की थी और बिहार में रथयात्रा नहीं निकालने का आग्रह किया लेकिन आडवाणी नहीं माने।

लालू का रैली में ऐलान, 24 घंटे नजर है मेरी
बिहार में रथयात्रा पहुंचने से पहले लालू ने एक खुली सभा में अपील की थी कि आडवाणी जी रथयात्रा को स्थगित कर दें। उन्होंने कहा था, ‘यात्रा स्थगित करके वह दिल्ली वापस चले जाएं। देशहित में होगा। जब इंसान ही नहीं रहेगा, मंदिर में घंटी कौन बजाएगा। इंसान नहीं रहेगा तो मस्जिद में इबादत कौन करेगा। मेरी निगाह 24 घंटे है। मैंने खुद और प्रशासन की तरफ से उनकी सुरक्षा की भी व्यवस्था की है लेकिन हमारे सामने बड़ा सवाल है कि जितना एक नेता या पीएम के जान की कीमत है उतना ही आम आदमी के जान की कीमत है। हम अपने राज्य में दंगा-फसाद फैलने नहीं देंगे। जहां दंगा का नाम लिया, बवाल पैदा करने की कोशिश हुई तो चाहे राज रहे या राज चला जाए, हम समझौता करने वाले नहीं हैं।’

रात 3 बजे आडवाणी गिरफ्तार
लालू का मानना था कि इस रथयात्रा के जरिए सांप्रदायिक सौहार्द्र बिगाड़ने की कोशिश हो रही है। लालू ने आडवाणी के रथ पर ब्रेक लगाने की तैयारी शुरू कर दी। रथ पटना से समस्तीपुर की ओर बढ़ रहा था और वहां प्रशासन ने गिरफ्तारी की पूरी तैयारी कर रखी थी। तब लालकृष्ण आडवाणी भाजपा के अध्यक्ष थे। उन्होंने एक इंटरव्यू में बताया था कि हमें इस बात का अंदेशा हो गया था। उन्होंने हमें रात 3 बजे गिरफ्तार कर लिया और हेलिकॉप्टर से कहीं दूर ले गए।

लालू का आडवाणी को गिरफ्तार करने का फैसला कोई छोटा डिसीजन नहीं था। उस समय आडवाणी के सपोर्ट जिस तरह भीड़ जुट रही थी, उससे कोई भी सीएम अपने कदम पीछे खींचने के लिए मजबूर हो सकता था लेकिन लालू नहीं रुके। सीएम लालू के आदेश पर 23 अक्टूबर को आडवाणी को गिरफ्तार कर लिया गया और रथयात्रा पर ब्रेक लग गया। इसका असर दिल्ली तक हुआ। गिरफ्तारी से ठीक पहले आडवाणी ने एक कागज पर राष्ट्रपति के नाम पत्र लिखा कि उनकी पार्टी विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार से समर्थन वापस ले रही है। जो अधिकारी आडवाणी को गिरफ्तार करने आए थे उनसे वह पत्र आगे पहुंचाया गया और वीपी सिंह सरकार गिर गई। दूसरे दिन अखबार की हेडलाइन बनी- आडवाणी गिरफ्तार, समर्थन वापस।

लालू को क्या फायदा
लालू के इस फैसले से उन्हें फायदा यह हुआ कि अब तक वह पिछड़ों खासकर यादवों के मसीहा हुआ करते थे लेकिन अब मुसलमानों का भी सपोर्ट मिला और एम+वाई समीकरण तैयार हो गया। भाजपा की ओर से कहा गया कि आडवाणी की रथयात्रा को जिस तरह से बिहार-यूपी और पूरे देश में समर्थन मिल रहा था, उससे मुलायम सिंह यादव और लालू यादव घबरा गए थे। उन्हें लगा कि अल्पसंख्यक समाज के वोटों का मसीहा कौन बने? भाजपा आडवाणी की रथयात्रा रोकने को लालू की सियासत का हिस्सा माना।

एक चेहरा यह भी
हालांकि आडवाणी की गिरफ्तारी के समय लालू ने मानवता भी दिखाई थी। आत्मकथा में वह लिखते हैं कि नजरबंद रहने के दौरान आडवाणी ने अनुरोध किया था कि वह पत्नी से बात करना चाहते हैं। वैसे तो यह मानवीय अनुरोध था लेकिन मेरे लिए एक दुविधा थी क्योंकि अगर वह बात करते समय पत्नी से कुछ राजनीतिक बातें कर देते तो इसके नतीजे भयावह हो सकते थे। मेरे सहयोगियों ने उनकी बात न मानने की सलाह दी लेकिन मैंने फैसला लिया कि पत्नी से उनकी बात कराऊंगा। लालू ने हॉटलाइन की व्यवस्था करवाई और दिन में दो बार आडवाणी अपनी पत्नी से बात कर पाते थे।

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