रविवार, फ़रवरी 25, 2024
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Politics: मुख्यमंत्री नीतीश पर सुशासन का दबाव, तो 2024 बढ़ा रही है भाजपा की चिंता

90 के दशक में मंडल कमीशन और अन्य पिछड़ा वर्ग के राजनीति में उभार ने पूरे देश के राजनीतिक नक्शे में बड़ा बदलाव किया था। समाजशास्त्री और राजनीतिक विश्लेषक योगेन्द्र यादव से लेकर तमाम धुरंधरों को 2024 में एक बार फिर बड़ी संभावना जोर पकड़ती दिखाई दे रही है। इसे जद(यू) महासचिव केसी त्यागी का आत्मविश्वास और तेजी से स्थापित करता नजर आता है। केसी त्यागी के मुताबिक महागठबंधन सरकार जातिगत जनगणना के अपने फैसले से पीछे नहीं हटेगी।

वे बताते हैं कि पटना से जब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जातिगत जनगणना की हुंकार भरी थी, तो दिल्ली में भाजपा के राष्ट्रीय नेता इसके झटके का आकलन करने में जुट गए थे। नीतीश कुमार के कदम से साफ है कि वह बिहार में अगड़ा बनाम पिछड़ा की राजनीति को हवा देने जा रहे हैं। ऐसा हुआ तो 2024 तक बिहार, झारखंड के बाहर कई राज्यों में इसका कुछ न कुछ असर देखने को मिल सकता है। बिहार में नीतीश कुमार और लालू प्रसाद से बड़ा कोई दूसरा पिछड़ा और अतिपिछड़ा वर्ग का नेता नहीं है। हिन्दुस्तान आवाम मोर्चा के जीतन राम मांझी और कांग्रेस के साथ मिलकर महागठबंधन इस तरह के राज्य के 55 फीसदी से अधिक मतदाताओं पर मजबूत पकड़ की उम्मीद कर रहा है। इसी आधार पर जद(यू) के मुख्य रणनीतिकार ललन सिंह (राजीव रंजन सिंह) 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को 40 लोकसभा सीट पर हराने की चुनौती दे रहे हैं।

जद(यू) के एक अन्य बड़े नेता ने बताया कि यह चुनौती तो नीतीश कुमार ने भी भाजपा को दे ही दी है। उन्होंने मीडिया के सामने साफ कर दिया है कि 2014 में जो आए थे, पता नहीं वह 2024 में रह पाएंगे या नहीं? केसी त्यागी भी इसी लाइन पर चलते हुए कहते हैं कि बिहार में भाजपा अलग-थलग पड़ गई है। 2015 में अलग चुनाव लड़कर भाजपा ने खुद को आजमा लिया था। आगे भी वही होने वाला है।

‘कानून का राज और बिहार का विकास’ नीतीश की बड़ी चुनौती
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एक बार फिर मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली है, लेकिन सिर मुड़ाते ही ओले पड़ रहे हैं। भाजपा कानून-व्यवस्था पर घेरकर बिहार में जंगलराज लौटने का ढोल पीट रही है, तो उनकी (जदयू) पार्टी की विधायक बीमा भारती ने लेसी सिंह को मंत्रिमंडल में शामिल किए जाने पर बगावती सुर दिखाए हैं। राजद के एमएलसी और नीतीश कुमार सरकार में कानून मंत्री कार्तिकेय सिंह को लेकर मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा ने दबाव बनाना शुरू किया है। नीतीश कुमार की मौजूदा सरकार 7 दलों के सहयोग और 160 विधायकों के समर्थन से चल रही है। इसमें जद (यू), राजद, कांग्रेस, भाकपा, माकपा, भाकपा (माले) और हम शामिल हैं। भाकपा माले के राज्य सचिव कुणाल ने भी सरकार से कार्तिकेय सिंह को मंत्रिमंडल में रखने पर पुनर्विचार करने की अपील की है।

कुणाल के अनुसार इस तरह की स्थितियों से सरकार की छवि खराब होगी। इस बीच बाहुबली नेता आनंद मोहन के बिना जमानत जेल से बाहर आने की खबरों ने भी राजनीतिक भूचाल ला दिया है। इस मामले में जेलर समेत तीन अधिकारियों पर गाज गिरी है। चुनाव प्रचार अभियान के रणनीतिकार से अब नेता बनने की मशक्कत कर रहे प्रशांत किशोर ने भी बिहार के विकास पर घेरा है। 10 लाख लोगों को रोजगार देने पर भी सवाल उठाया है।

जद (यू) के नेता भी मानते हैं कि कानून-व्यवस्था को काबू में रखना एक चुनौती होगी। 2015 तक नीतीश कुमार की छवि बिहार में सुशासन बाबू की थी। राजद के संस्थापक नेता शिवानंद तिवारी कहते हैं कि हल्ला केवल भाजपा मचा रही है। कुछ समय बीतने दीजिए, सब ठीक रहेगा। राजद के ही एक और नेता का कहना है कि अभी तो सरकार बनी है, तीन दिन में कौन सा कानून के राज का हिसाब दे दें। जो हमसे जवाब मांग रहे हैं, उनसे कहिए कि पहले अपने कई साल के राज का जवाब दे दें।

भाजपा को पता है कि उसकी संजीवनी कहां है?
बिहार के पूर्व उप मुख्यमंत्री और सांसद सुशील मोदी अचानक काफी सक्रिय हो गए हैं। सुशील मोदी मंझे हुए नेता हैं। उनके साथ-साथ केन्द्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने भी नीतीश कुमार पर कानून के राज को लेकर सवाल खड़ा कर दिया है। इस मामले में भाजपा के नेता सुधीर अग्रवाल कहते हैं कि हमें बिहार में संजीवनी विद्या का पता है। राष्ट्रीय जनता दल के तमाम नेता या तो जेल में हैं या पैरोल पर हैं। सुधीर कहते हैं कि नीतीश की सरकार में लालू की पार्टी है। जब बिहार में लालू और राबड़ी देवी का राज था तो वहां जंगलराज था। जब से नीतीश कुमार की सरकार बनी है, तब से पटना और बिहार में अपराधियों के हौसले बढ़ रहे हैं। बस देखते जाइए, सब कुछ दिन की बात है।

‘राजनीति की बेस लाइन बड़ा संकेत दे रही है’
विशेष कुमार सक्सेना चुनाव प्रचार अभियान पर काम कर रहे हैं। सर्वे और विश्लेषण करते हैं। वह कहते हैं कि बिहार में जो हो रहा है और जो संकेत मिल रहे हैं, यदि ठीक तरीके से आगे बढ़ पाया, तो राजनीति की मौजूदा बेसलाइन हिल सकती है। सक्सेना के मुताबिक, भाजपा के रणनीतिकारों के माथे पर इसको लेकर जरूर शिकन होगी। वह कहते हैं कि बिहार में जिस करवट अभी राजनीति का ऊंट बैठ रहा है, यदि आज चुनाव हों तो एनडीए और महागठबंधन में 12-17 प्रतिशत तक वोटों का अंतर आ सकता है।

विशेष के मुताबिक, इतने बड़े अंतर का मतलब सहज समझा जा सकता है। इसका असर बगल के राज्य झारखंड में भी पड़ेगा। प. बंगाल में वैसे भी भाजपा की हालत ठीक नहीं है। उड़ीसा से जरूर कुछ उसे उम्मीद रहेगी, लेकिन अगड़ा बनाम पिछड़ा की यह लड़ाई कई राज्यों में उसे झटका दे सकती है। इसलिए महागठबंधन के सामने अपनी साख की चुनौती है तो भाजपा के सामने भी उससे बड़ी चुनौती खड़ी है।

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