रविवार, फ़रवरी 25, 2024
होमबिहार के अखबारों में'शर्ट के ऊपर गंजी पहनने से कोई जमीनी नेता नहीं हो जाता', बिहार को लेकर कास्ट एनालाइसिस पर भी भड़के Prashant Kishor

‘शर्ट के ऊपर गंजी पहनने से कोई जमीनी नेता नहीं हो जाता’, बिहार को लेकर कास्ट एनालाइसिस पर भी भड़के Prashant Kishor

‘हमने-आपने ऐसा मान लिया है कि बिहार का जो जमीनी नेता है, वो वही व्यक्ति होना चाहिए जो शर्ट के ऊपर गंजी पहने। जिसको भाषा का ज्ञान न हो। जिसको विषयों का ज्ञान न हो। उसी को हमलोग कहते हैं कि जमीनी नेता है। बिहार ज्ञान की भूमि रही है। दो हजार साल तक जो देश का इतिहास रहा है, इसमें ज्यादातर समय इसी जमीन से देश को चलाया गया है। उस राज्य में आज स्थिति ये है कि हमलोग सिर्फ एक ही चीज प्रोड्यूस कर रहे हैं, वो है मजदूर।’ जन सुराज यात्रा पर निकले प्रशांत किशोर ने मीडिया के सामने अपनी बातों को रखा। ‘2015 में इनकी मदद न की होती तो…’जन सुराज यात्रा के 69वें दिन राजनीतिक रणनीतिकार रहे प्रशांत किशोर के निशाने पर पॉलिटिकल स्टाइल, बैंक और पत्रकार रहे। वैसे उन्होंने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव को भी नहीं बख्शा। उन्होंने कहा कि लालू यादव के बिना तेजस्वी यादव कुछ भी नहीं हैं। जिस चाचा-भतीजा के बारे में आप बात कर रहे हैं, वे जनता के साथ सिर्फ धोखा कर रहे हैं।

प्रशांत किशोर ने कहा कि जब से ये चाचा-भतीजा सत्ता में आए हैं, तब से तीन उपचुनाव हुए हैं, जिसमे दो में हार का सामना करना पड़ा है। एक चुनाव जीते क्योंकि वो बाहुबली की सीट थी। उपचुनाव तो इनसे जीता नहीं जाता, ये मुझे चुनाव लड़ना क्या सिखाएंगे? प्रशांत किशोर ने नीतीश और लालू को ‘उस दिन’ की भी याद दिलाई। उन्होंने कहा कि 2015 में मैंने इनकी मदद नहीं की होती तो क्या महागठबंधन को जीत हासिल होती? पहली कैबिनेट की बैठक में तेजस्वी यादव ने 10 लाख नौकरी का जो वादा किया था, उसका क्या हुआ? बिहार के पैसे से दूसरे राज्य आबाद- प्रशांतराज्य की अर्थव्यवस्था की चर्चा करते हुए प्रशांत किशोर ने कहा कि सरकार की नाकामी के वजह से बिहार बर्बाद हो रहा है। बिहार के पैसों से गुजरात, महाराष्ट्र जैसे राज्यों में उद्योग लगाया जा रहा है। बिहार के लोग उन राज्यों में जाकर मजदूरी कर रहे हैं, मतलब बिहार को दुगनी मार झेलनी पड़ रही है। राज्यों में पूंजी उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी बैंकों की है। हम और आप बैंकों में पैसे जमा करते हैं और बैंक लोगों को लोन देती है, ताकि रोजगार के अवसर पैदा हो सके।

अपनी बातों के समर्थन में पीके ने आंकड़ा भी दिया। उन्होंने कहा कि देश के स्तर पर क्रेडिट डिपोजिट का आंकड़ा 70 प्रतिशत है, और बिहार में ये आंकड़ा पिछले 10 सालों से 25-40 प्रतिशत रहा है। लालू जी के जमाने में 20 प्रतिशत से भी नीचे था। नीतीश जी के 17 साल के कार्यकाल में ये औसत 35 प्रतिशत है, जो पिछले साल 40 प्रतिशत था। इसका मतलब है कि बिहार में जो भी पैसा बैंकों में लोग जमा करा रहे हैं, उसका केवल 40% ही ऋण के तौर पर लोगों के लिए उपलब्ध है। जबकि विकसित राज्यों में 80-90 प्रतिशत तक बैंकों में जमा राशि ऋण के लिए उपलब्ध है।

बिहार ही नहीं, पूरे देश में जातिवाद है- प्रशांतबिहार की राजनीति को जातिगत कहने पर प्रशांत किशोर ने कहा कि पिछले पांच साल के आंकड़े बताते हैं कि यहां की जनता ने जातिवाद से ऊपर उठकर वोट किया है। 1984 में इंदिरा गांधी की मृत्यु से उपजी हुई सहानुभूति के लहर में लोगों ने जातियों से ऊपर उठ कर वोट किया था। 1989 में बोफोर्स के मुद्दे पर देश में वीपी सिंह की सरकार बनी थी। 2014 में नरेंद्र मोदी के चेहरे पर पूरे देश के लोगों ने भाजपा को वोट किया।

पीके ने कहा क 2019 में राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों के नाम पर लोगों ने वोट किया। इतना ही नहीं पूरे बिहार के लोगों ने बीजेपी को फिर से सरकार बनाने का मौका दिया। इसलिए ये कहना गलत होगा कि बिहार के लोग केवल जातिगत आधार पर वोट करते हैं। चुनावों में जाति एक फैक्टर हो सकता है। लेकिन बिहार में भी ये उतना ही बड़ा फैक्टर है, जितना दूसरे राज्यों में है। सिर्फ बिहार में जातिवाद है, ये कहना सही नहीं है।

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