राज्यपाल

जिस तरह राष्ट्रपति देश का कार्यकारी प्रमुख होते हैं उसी तरह राज्यपाल राज्य का कार्यकारी प्रमुख होते है. वह अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए दोहरी भूमिका को निभाता है. प्रथम भूमिका में जहां वह राज्य का प्रमुख होता है वहीं दूसरी भूमिका के रूप में वह राज्य में केंद्र सरकार का प्रतिनिधि होता है.

संविधान के छठे भाग में राज्य की कार्यपालिका का वर्णन मिलता है, इनमें राज्यपाल भी आते हैं. सामान्य रूप में एक राज्य के लिए एक राज्यपाल की व्यवस्था मिलती है लेकिन 7 वा संविधान संशोधन अधिनियम 1956 में एक व्यक्ति को दो या दो से अधिक राज्यों के लिए राज्यपाल के रूप में नियुक्त किए जाने की व्यवस्था को अपनाया गया.

नियुक्ति

राज्यपाल को केंद्र सरकार द्वारा मनोनीत किया जाता है अर्थात किसी योग्य व्यक्ति, जो राज्यपाल बनने की शर्तों को पूरा करता है, को केंद्र सरकार द्वारा किसी राज्य का राज्यपाल बनाया जाता है. उसे राष्ट्रपति का मुहर लगा हुआ एक आज्ञा पत्र दिया जाता है. हम चर्चा कर चुके हैं कि 7 वा संविधान संशोधन अधिनियम के द्वारा किसी एक व्यक्ति को एक से अधिक राज्य का राज्यपाल नियुक्त किया जा सकता है.

नोट: किसी राज्य का राज्यपाल उस राज्य का केवल संवैधानिक प्रमुख होता है, उसे वास्तविक रूप में उतनी शक्तियां नहीं प्राप्त होती है. इसीलिए उसे चुनाव द्वारा निर्वाचित किए जाने के बदले नियुक्त किए जाने की प्रक्रिया अपनाया गया. अमेरिका में राज्यपाल को चुनाव के दौरान निर्वाचित किया जाता है जबकि कनाडा में उसे नियुक्त किया जाता है. ऐसे में राज्यपाल के संदर्भ में भारत में अमेरिकी मॉडल के बदले कनाडाई मॉडल को अपनाया गया.

योग्यता एवं पद की शर्तें

हम जान चुके हैं कि केंद्र सरकार किसी व्यक्ति को राष्ट्रपति के मुहर लगा आज्ञा पत्र के माध्यम से राज्यपाल के रूप में नियुक्त करता है लेकिन उस व्यक्ति को कुछ न्यूनतम अहर्ता का धारण एवं शर्तों को पूरा करना आवश्यक होता है, जो इस प्रकार है:

वह भारत का नागरिक होना चाहिए तथा कम से कम 35 वर्ष का होना चाहिए. वह नियुक्त किए जाने वाले राज्य का नहीं होना चाहिए ताकि स्थानीय राजनीति से मुक्त रह सके. उसे किसी लाभ के पद पर नहीं होना चाहिए.

उसे संसद अथवा विधान मंडल का सदस्य नहीं होना चाहिए ऐसे व्यक्ति को राज्यपाल नियुक्त किया जाने से पूर्व संसद अथवा विधानमंडल की सदस्यता त्यागनी होती है.

शपथ एवं पद की अवधि

राज्यपाल के रूप में नियुक्त किए जाने वाले व्यक्ति को उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और उनकी अनुपस्थिति में उपलब्ध वरिष्ठतम न्यायाधीश पद की शपथ दिलाते हैं. शपथ में निम्नलिखित बातों को दोहराया जाता है.

  • वह निष्ठा पूर्वक दायित्व का निर्वहन करेगा,
  • संविधान और विधि की रक्षा संरक्षण और प्रतिरक्षा करेगा,
  • स्वयं को राज्य की जनता की हित व सेवा में समर्पित करेगा,

उपरोक्त शपथ पर गौर करें तो उसे दायित्वों के निर्वहन के साथ ही संविधान की रक्षा संरक्षण और प्रतिरक्षा का दायित्व सौंपा गया है. ऐसे में भले ही उसकी नियुक्ति केंद्र सरकार द्वारा होती है लेकिन उसे केवल केंद्र सरकार की ओर ही नहीं झुके रहना चाहिए. माननीय उच्चतम न्यायालय ने भी 1979 में कहा कि राज्य में राज्यपाल का कार्यालय केंद्र सरकार के अधीन रोजगार नहीं है. यह एक स्वतंत्र संवैधानिक कार्यालय है और यह केंद्र सरकार के अधिनस्थ नहीं है.

उपरोक्त व्यवस्था के बावजूद वास्तविक रूप से राज्यपाल का पद राष्ट्रपति के प्रसाद पर्यंत ही होता है. हालांकि उसकी पदावधि पद ग्रहण से 5 वर्ष तक की होती है लेकिन संविधान में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है जिसके तहत उसे पद की गारंटी प्राप्त है.

सूर्यनारायण बनाम भारत संघ मामले में माननीय उच्चतम न्यायालय ने व्यवस्था दी कि राज्यपाल के पास ना तो कार्यकाल की सुरक्षा है और ना ही कार्यालय की निश्चितता. उसे राष्ट्रपति द्वारा किसी भी समय वापस बुलाया जा सकता है.

राष्ट्रपति उसे उसके बचे हुए कार्यकाल के लिए किसी दूसरे राज्य में स्थानांतरित कर सकते हैं. एक व्यक्ति को उसी राज्य अन्य राज्य में दोबारा और कितनी भी बार राज्यपाल के रूप में नियुक्त किया जा सकता है

शक्ति कार्य एवं दायित्व

हम चर्चा कर चुके हैं कि राज्यपाल कार्यालय दोहरी भूमिका को निभाता है एक ओर जहां व राज्य का कार्यकारी प्रमुख होता है वहीं दूसरी ओर राज्य में केंद्र का प्रतिनिधित्व करता है. राज्यपाल के शक्ति कार्य एवं दायित्व को कार्यकारी, विधायी, वित्तीय और न्यायिक शक्ति के रूप में देखा जा सकता है.

कार्यकारी शक्ति

कार्यकारी शक्ति से तात्पर्य शासन-प्रशासन के दायित्वों से है. वह राज्य सरकार का संवैधानिक प्रमुख होता है ऐसे में वह काफी कार्यकारी शक्तियों को धारण करता है. उसके प्रमुख कार्यकारी शक्तियां निम्नलिखित है:

  • राज्य सरकार के सभी कार्यकारी कार्य औपचारिक रूप से उसी के नाम पर होते हैं.
  • वह अपने आदेश एवं प्रपत्र के व्यवहार से संबंधित नियम बना सकता है,
  • वह राज्य सरकार के लेनदेन को अधिक सुविधाजनक और उक्त कार्य के मंत्रियों में आवंटन हेतु नियम बना सकता है.
  • वह मुख्यमंत्री अथवा अन्य मंत्रियों को नियुक्त करता है.
  • वह छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, झारखंड तथा उड़ीसा में जनजाति कल्याण मंत्री नियुक्त करता है.
  • वह राज्य के महाधिवक्ता को नियुक्त करता है और उसकी परिश्रमिक तय करता है. हालाँकि महाधिवक्ता राष्ट्रपति के प्रसाद पर्यंत कार्य करता है.
  • वह राज्य निर्वाचन आयुक्त को नियुक्त करता है और उसकी सेवा शर्तें और कार्यविधि तय करता है. हालांकि उसे उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया के तहत ही हटाया जा सकता है.
  • वह लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और सदस्य की नियुक्ति करता है. हालांकि उन्हें हटाने का अधिकार राष्ट्रपति के पास है.
  • वह मुख्यमंत्री से प्रशासनिक मामले या किसी विधाई प्रस्ताव की जानकारी प्राप्त कर सकता है.
  • वह किसी मंत्री के निर्णय जिस पर मंत्री परिषद ने संज्ञान नहीं लिया हो पर मुख्यमंत्री को विचार करने के लिए कह सकता है.
  • वह राज्य में संवैधानिक आपातकाल के लिए राष्ट्रपति से सिफारिश कर सकता है. राष्ट्रपति शासन के दौरान उसकी कार्यकारी शक्ति विस्तारित हो जाती है.
  • वह विश्वविद्यालय के कुलाधिपति होता है तथा कुलपति की नियुक्ति करता है.

विधायी शक्तियां, कार्य एवं दायित्व

भारत के राज्यों का राज्यपाल विभिन्न विधायी शक्तियों को भी धारित करता है. उसकी प्रमुख विधायी शक्तियां एवं दायित्व कार्य आदि निम्नलिखित है.

  1. वह राज्य विधानसभा के सत्र को आहूत, सत्रावसान और विघटित कर सकता है.
  2. वह विधानमंडल के प्रत्येक चुनाव के बाद पहले और प्रतिवर्ष के पहले सत्र को संबोधित कर सकता है.
  3. वह सदन को विचाराधीन विधेयकों के संबंध में संदेश भेज सकता है.
  4. विधानसभा अध्यक्ष, उपाध्यक्ष का पद रिक्त होने पर वह किसी विधानसभा सदस्य को इसके लिए नियुक्त कर सकता है.
  5. वह राज्य विधान परिषद के कुल सदस्यों के 1/6वें भाग को नामित कर सकता है.
  6. वह राज्य विधान सभा के लिए आंग्ल भारतीय समुदाय से एक सदस्य की नियुक्ति कर सकता है.
  7. वह विधानसभा सदस्य की अयोग्यता के मुद्दे पर निर्वाचन आयोग से विमर्श के बाद निर्णय करता है.
  8. वह राज्य विधान मंडल द्वारा पारित विधेयक के संदर्भ में यथोचित निर्णय लेता है. जब कोई विधेयक राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है तो वह निम्न व्यवहार कर सकता है:
    • वह विधेयक को स्वीकार कर सकता है. या,
    • स्वीकृति के लिए रोक सकता है. या,
    • विधेयक, यदि धन विधेयक नहीं है तो, को विधानमंडल के पास पुनर्विचार के लिए भेज सकता है. हालाँकि राज्य विधान मंडल द्वारा पुनः पारित होने पर राज्यपाल को उस पर अपनी स्वीकृति देनी होती है. या,
    • संविधान के प्रावधानों के विरुद्ध होने पर वह विधेयक को राष्ट्रपति के विचार हेतु सुरक्षित रख सकता है.
  9. राज्य विधानसभा के सत्र चालू न होने की स्थिति में (सत्रावसान अवधि में) अध्यादेश जारी कर सकता है. हालाँकि इसे 6 हफ्तों के भीतर विधानमंडल से स्वीकृति होना अनिवार्य होता है. वह किसी भी समय अध्यादेश समाप्त कर सकता है.
  10. वह राज्य के लेखों से संबंधित राज्य वित्त आयोग, राज्य लोक सेवा आयोग और नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट को विधानसभा में प्रस्तुत करता है.

वित्तीय शक्तियां, कार्य एवं दायित्व

राज्यपाल विभिन्न वित्तीय शक्तियों को भी धारण करता है. उसकी प्रमुख वित्तीय शक्तियां निम्नलिखित है.

  • वह सुनिश्चित करता है कि वार्षिक राज्य बजट को विधानमंडल में रखा जाए.
  • धन विधेयक उसकी पूर्व सहमति के बाद ही प्रस्तुत किया जा सकता है.
  • बिना उसकी सहमति के किसी अनुदान की मांग नहीं की जा सकती.
  • वह किसी अप्रत्याशित व्यय के वहन के लिए राज्य की आकस्मिक निधि से अग्रिम ले सकता है.
  • पंचायत एवं नगर पालिका की वित्तीय स्थिति की हर 5 वर्ष बाद समीक्षा के लिए वित्त आयोग का गठन करता है.

न्यायिक शक्ति

राष्ट्रपति कि तरह उसे भी विभिन्न न्यायिक शक्तियां प्राप्त होती है. राज्यपाल कि प्रमुख न्यायिक शक्तियां निम्नलिखित है:

  • वह उच्च न्यायालय के साथ विचार कर जिला जज की नियुक्ति, स्थानांतरण और प्रोन्नति कर सकता है.
  • वह जिला न्यायाधीश के अतिरिक्त राज्य न्यायिक आयोग से जुड़े लोगों की नियुक्ति करता है .इन नियुक्तियों में वह उच्च न्यायालय और लोक सेवा आयोग से विचार करता है.
  • वह राष्ट्रपति के विचार के बाद संबंधित राज्य के उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की नियुक्ति करता है.
  • उसके पास संबंधित राज्य की कार्यपालिका शक्ति से संबंधित विषय एवं या राज्य विधि के विरुद्ध अपराधी साबित किसी व्यक्ति को क्षमा, प्रतिलंबन, विराम, परिहार, लघुकरण की शक्ति होती है.

परिलब्धियां, वेतन, भत्ते और सुविधाएं

उसे अपने शासकीय कृत्य के लिए विधिक दायित्व से निजी उन्मुक्ति प्राप्त होती है. अपने कार्यकाल के दौरान उसे अपराधिक कार्यवाही की सुनवाई से उन्मुक्ति प्राप्त होती है. उसे गिरफ्तार कर कारावास में नहीं डाला जा सकता. हालांकि 2 महीने की नोटिस पर व्यक्तिगत क्रियाकलापों पर उनके विरुद्ध नागरिक कानून संबंधी कार्यवाही प्रारंभ की जा सकती है.

उसे बिना किराए का राज भवन, दैनिक भत्ता, निशुल्क पूर्ण सुसज्जित आवास, फोन, कार, चिकित्सा, यात्रा एवं अन्य संसद द्वारा निर्धारित सुविधा उपलब्ध कराए जाते है. 2008 में संसद ने राज्यपाल का वेतन 36000 से बढ़ाकर 1.10 लाख रुपया प्रति महीना कर दिया.

स्पष्ट है कि राज्यपाल राज्य कार्यपालिका के अंतर्गत एक महत्वपूर्ण संवैधानिक पद है जो राज्य के कार्यकारी प्रमुख और केंद्र का प्रतिनिधित्व के रूप में दोहरी भूमिका का निर्वहन करता है. 

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