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सरकारी विधेयक बनाम गैर सरकारी विधेयक

विधेयक संसद का मुख्य उपकरण है जिसे संसद के दोनों सदनों में लाया जाता है. इसके द्वारा संसद में विभिन्न विधायी कार्यों को किया जाता है. कोई भी विधेयक संसद से पारित होने के बाद कानून बन जाता है.

संसद में पेश किये विधेयक दो तरह के हो सकते है. सरकारी विधेयक और गैर सरकारी विधेयक. दोनों अपनी प्रकृति के अनुसार कुछ विशेषताओं को धारण करती है लेकिन इनमें कुछ समानता भी हो सकती है.

सरकारी विधेयक

ये कार्यपालिका द्वारा संसद में पेश किये जाते है. अर्थात इस विधेयक को संसद में मंत्री द्वारा पेश किया जाता है. जरा इस बात पर ध्यान दें यहाँ कार्यपालिका द्वारा पेश किये जाने की बात है न की सत्तारूढ़ पार्टी के सदस्यों द्वारा. आइये इस बात को एक उदाहरण से समझते है.

2019 के लोकसभा चुनाव में गोरखपुर निर्वाचन क्षेत्र से एक हिंदी और भोजपुरी सिनेमा स्टार रवि किशन ने भारी बहुमत से जीत हासिल की. जाहिर सी बात है की अब वे वर्तमान में संसद सदस्य के तौर पर संसद में स्थापित हो गए. एक दिन एक रियलिटी टीवी शो (कपिल शर्मा शो) में उन्होंने इस बात को कहा की वे जल्द ही संसद में एक विधेयक पेश करेंगें जिसके द्वारा यह कानून लाया जाएगा की कोई व्यक्ति किसी जानवर पर अत्याचार नहीं कर सकेगा.

अब एक चीज को और गौर करें की रवि किशन वर्तमान सरकार में किसी मंत्री पद पर नहीं है अगर वे इस विधेयक को स्वयं तैयार करवा कर सदन में पेश करते है तो यह सरकारी विधेयक नहीं माना जाएगा. यह सही है की वे सत्ताधारी दल से है लेकिन फिर भी उनके द्वारा पेश किया गया विधेयक सरकारी विधेयक नहीं बल्कि गैर सरकारी विधेयक माना जाएगा.

अगर वे चाहे तो इस संबंध में संबंधित मंत्रालय से बात कर विधेयक पेश करवा सकते है. संबंधित मंत्रालय अथवा विभाग इसे विधि विभाग के परामर्श से तैयार करवाएगा. इससे इसमें कम से कम त्रुटियाँ होगी और यह सरकार के नीतियों को प्रदर्शित करेगी. और जैसा की हम जानते है की संसद में सत्तारूढ़ सरकार बहुमत में होती है. ऐसे में इन विधेयकों के संसद से पारित हो जाने की पूरी संभावना होती है.

इस उदाहरण में वर्णित विशेषताएँ ही किसी विधेयक को सरकारी विधेयक बनाते है. सरकार द्वारा पेश कुछ विशेष तरह के विधेयक, प्रस्ताव जैसे धन विधेयक, धन्यवाद प्रस्ताव आदि के सदन में पास न होने पर सरकार गिर भी सकती है.

गैर सरकारी विधेयक

संसद के किसी सदन में किसी गैर मंत्री द्वारा पेश किया गया कोई विधेयक गैर सरकारी विधेयक कहलाता है. हमनें उपर के उदाहरण में गोरखपुर निर्वाचन क्षेत्र के माननीय सांसद रवि किशन जी के द्वारा जानवरों पर की जाने वाली हिंसा से संबंधित कानून के संदर्भ में समझा की अगर वे खुद से संसद में विधेयक पेश करते है और चूँकि वे मंत्री नहीं है ऐसे में यह विधेयक गैर सरकारी विधयक कहा जाएगा.

हालाँकि आमतौर पर सत्ताधारी दल के कोई सदस्य ऐसा नहीं करते. वे संबंधित विभाग से परामर्श कर उनके द्वारा विधेयक पेश करवाते है.

गैर सरकारी विधेयक मुख्य रूप से विपक्षी दलों द्वारा पेश किया जाता है. और चूँकि उनकी बहुमत नहीं होती है ऐसे में इसके पारित होने की उम्मीद कम होती है. इस तरह यह सार्वजानिक मामलें पर विपक्षी दल के विचार को व्यक्त करता है.

क्योंकि गैर सरकारी विधेयक के पास होने की संभावना न के बराबर होती है और उसके निर्माण से संबंधित सारी जिम्मेदारी संबंधित सदस्य का होता है जिससे इसमें त्रुटियाँ हो सकती है. ऐसे विधेयक के पारित होने अथवा न होने से सरकार के उपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है.

सरकारी विधेयक और गैर सरकारी विधेयक में अंतर

सरकारी विधेयक (स. वि.) और गैर सरकारी विधेयक (गै. स. वि.) के प्रकृति में विशिष्ट अंतरो की चर्चा हम उपर अस्पष्टता के साथ कर चुके है. आइये इन्हें स्पष्ट रूप में पुनः समझें.

1. स. वि को मंत्री द्वारा पेश किया जाता है जबकि गै. स. वि. को मंत्री के अलावे किसी भी सदस्य द्वारा.

2. स. वि सरकार की नीतियों को प्रदर्शित करता है जबकि गै. स. वि प्रमुखतः विपक्षी दल के विचारों को.

3. स. वि के अस्वीकृत होने पर सरकार को इस्तीफ़ा देना पड़ सकता है जबकि गै. स. वि से सरकार के उपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता.

4. स. वि को सदन में पेश करने से पहले 7 दिनों की नोटिश देना जरुरी होता है जबकि गै. स. वि के लिए 30 दिनों की पूर्व नोटिश देना आवश्यक होता है.

5. इसे संबंधित विभाग द्वारा विधि विभाग के परामर्श से तैयार करवाया जाता है जबकि गै. स. वि के तैयार करने की जिम्मेदारी संबंधित सदस्य की होती है.

स्पष्ट है की सरकारी विधेयक (स. वि.) और गैर सरकारी विधेयक (गै. स. वि.) में प्रमुख अंतर होता है लेकिन हम यह नहीं कह सकते की दोनों में सिर्फ अंतर ही अंतर है. दोनों की एक सबसे सामान्य विशेषता है की दोनों समान प्रक्रिया के तहत संसद में पारित होते है.

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