उपभोक्ता संस्कृति

उपभोग का वास्तविक जड़ जरूरत या आवश्यकता से मिलती है लेकिन यह आवश्यकता बहुत अधिक अथवा काम चलाऊ भी हो सकती है और यह भी हो सकता है कि यह बिल्कुल दिखावा प्रदत्त हो| ऐसी वस्तुएं जो मानव के लिए ख़ास आवश्यक न होते हुए भी व्यवसायिक प्रचार प्रसार आदि के द्वारा जब महत्वपूर्ण दिखाया जाता है तो इसे उपभोक्ता संस्कृति कहा जाता है।

उपभोक्ता संस्कृति के विकास का कारण

ब्रांडीकरण: मशीनी और पूंजी प्रवाह के दौर में व्यक्तियों को ब्रांड के रूप में रूपांतरण किया गया। उनकी पहचान उनके नागरिक होने के गुण के आधार पर न करते हुए कौन व्यक्ति किस प्रकार के ब्रांडेड वस्तुओं का उपयोग करता है इस आधार पर किया जाने लगा। इससे उपभोक्ता संस्कृति को बल मिला|

सूचना प्रचार की भूमिका: मीडिया विज्ञापन आदी के माध्यम से उपभोग की वस्तुओं के प्रति आकर्षण पैदा किया गया। यदि सुंदर दिखना है तो क्रीम का प्रयोग करना चाहिए| लड़कों के लिए अलग क्रीम, लड़कियों के लिए अलग क्रीम| इस तरह की विज्ञापन ने लोगों को उपभोक्ता वस्तुएं खरीदने हेतु प्रेरित किया| इस तरह उपभोक्ता संस्कृति फली फुली।

कॉरोपोरेटवाद की भूमिका: बड़े-बड़े कॉरोपोरेट घरानों द्वारा बड़ी बड़ी मात्रा में पूंजी निवेश किया गया। इससे उपभोक्ता वस्तुओं की सहज उपलब्धि सुनिश्चित हो पाई। इससे उपभोक्ता संस्कृति को बल मिला।

सामंती मानसिकता का पुनर्विकास: हालिया आधुनिक युग सामंती प्रवृति की पुनर्विकास की ओर बढ़ा है। व्यक्ति ज्यादा से ज्यादा विलासिता पूर्ण जीवन व्यतीत करना चाहते है। बड़ी-बड़ी गाडियां, महंगी वस्तुएं, होटल आदी में जाना एक सांस्कृतिक पहचान माना जाने लगा। इससे उपभोक्ता संस्कृति को बल मिला।

उपभोक्ता संस्कृति का प्रभाव

उपभोक्ता संस्कृति के नकारात्मक एवं सकारात्मक दोनों प्रभाव देखने को मिलते हैं| इनकी अलग-अलग चर्चा किया जाना प्रासंगिक होगा|

नकारात्मक प्रभाव

  • असंतुष्ट एवं अनौपचारिक व्यवहार का संयोजन तथा अपराधों को बढ़ावा
  • भ्रष्टाचार को बढ़ावा
  • गैर बराबरी समाज का सृजन
  • पर्यावरणीय संकट

सकारात्मक प्रभाव

  • औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि एवं समृद्धि को बल
  • रोजगार सृजन
  • तकनीकी एवं उद्यमिता का विकास
  • आधारभूत संरचना का विकास
  • वैश्विक समृद्धि को बढ़ावा

मूल्यांकन

उपभोक्ता संस्कृति के जहां कुछ सकारात्मक पहलु है वहीं कुछ नकारात्मक पहुलुएँ भी हैं, ऐसे में कुछ बातों पर गौर किया जाना काफी आवश्यक हो जाता है| उपयोग मूल्य पर ध्यान दिए जाने के साथ ही उपभोग के दौरान आवश्यक और अनावश्यक उपभोग की पहचान होनी चाहिए| आधुनिक तड़क-भड़क जीवन शैली के बजाय सरल जीवन को बढ़ावा दिया जाना चाहिए| विकास तथा पर्यावरण संतुलन के बीच उचित तालमेल होना चाहिए और इनके लिए सतत विकास को ध्यान में रखकर उपयोग करना चाहिए| इस संदर्भ में गांधी जी का कथन प्रासंगिक है कि पृथ्वी के सारे संसाधन सभी मनुष्यों का पेट भर सकते हैं लेकिन किसी एक लालची व्यक्ति के लिए कम पड़ जाएंगे।

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