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भारत की जलवायु

भारत की जलवायु को उष्णकटिबंधीय मानसूनी जलवायु कहा जाता है। इसका मुख्य कारण उष्ण कटिबंध में भारत की स्थित होना और संपूर्ण वर्षा का 80% से अधिक मानसूनी पवन द्वारा प्राप्त होना है| हालाँकि यहां के विभिन्न क्षेत्रों में उष्णकटिबंधीय दशाओं तथा वर्षा की मात्रा में पर्याप्त विविधता पाई जाती है जो भारत में जलवायु संबंधी विविधता को बताता है।

भारत की जलवायु को उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों को प्रभावित करने वाले कई कारक प्रभावित करते हैं लेकिन उष्णकटिबंधीय अन्य महाद्वीप एवं स्थलीय भागों की तुलना में भारत की जलवायु विशिष्ट है इसके लिए भारत की विशिष्ट भौगोलिक दशा उत्तरदाई है| इनमें प्रमुख इस प्रकार है:

  • भारत के मध्यवर्ती भाग में कर्क रेखा की स्थिति
  • भारत के दक्षिण में विषुवत रेखा का नजदीक होना
  • उत्तर में हिमालय पर्वतीय प्रदेश की स्थिति और हिमालय में बर्फ का गिरना
  • प्राय द्वीपीय पठारी भारत पर विभिन्न पर्वतीय पठारी स्थलाकृति की स्थिति
  • हिमालय के उत्तर में तिब्बत का पठार की स्थिति
  • भारत के वृहद क्षेत्र का प्रत्यक्ष समुद्री प्रभाव से दूर स्थित होना और इसके कारण महाद्वीपीयता की विशेषता को धारण करना
  • दक्षिण में तीन ओर से सागरों से गिरा होना
  • हिंद महासागर से मानसूनी पवनों की उत्पत्ति और भारत की ओर प्रवाह
  • तटवर्ती प्रदेश में गर्म जल धाराओं का प्रवाहित होना

उपरोक्त कारको की अंतर किया के कारण ही भारत की जलवायु का न केवल निर्धारण होता है बल्कि इसे उष्णकटिबंधीय अन्य प्रदेशों की जलवायु की तुलना में विशिष्ट बनाता है|

भौगोलिक स्थिति के अनुसार भारत उष्णकटिबंधीय अक्षांशीय भौगोलिक विस्तार वाले क्षेत्र में आता है जिसके मध्य से कर्क रेखा गुजरती है। ऐसे में सूर्य की उत्तरायण के साथ सूर्य की किरणों के लंबवत प्रभाव के कारण यहां तापमान में वृद्धि होती है जिससे निम्न वायुदाब क्षेत्र का विकास होता है।

भारत का वृहद क्षेत्र समुद्र के प्रत्यक्ष प्रभाव से दूर होने के कारण महाद्वीपीयता की विशेषता रखता है जिसमें ग्रीष्म काल अपेक्षाकृत गर्म और शीतकाल अपेक्षाकृत ठंडी होती है| भारत में ग्रीष्मकालीन तापमान में वृद्धि के बावजूद यह विश्व के अधिक गर्म क्षेत्र में नहीं आता। इसके लिए हिमालय पर वर्फ का गिरना और ग्रीष्मकालीन दक्षिण पश्चिमी मानसूनी हवाएं उत्तरदाई है।

हिमालय का अधिकांश भाग ग्रीष्म काल में भी बर्फ से ढका रहता है जिसके प्रभाव से उत्तर भारत के तापमान में कुछ नियंत्रण स्थापित हो जाता है। हिमालय वर्फ से ढंके होने से एक प्रकार से शीतोष्ण प्रभाव उत्पन्न होता है ग्रीष्म काल में ही सागरीय क्षेत्र से दक्षिण पश्चिमी मानसूनी पवने आद्रता लेकर आती है जिससे लगभग संपूर्ण भारत में वर्षा होती है| इसके कारण ग्रीष्मकालीन तापमान में नियंत्रण स्थापित हो जाता है।

हिमालय मानसूनी पवनों के लिए एक अवरोध का कार्य करता है। हिमालय से टकराकर मानसूनी पवने मध्यवर्ती मैदानों में वर्षा करती है। इन्हीं कारणों से उष्णकटिबंधीय अन्य क्षेत्रों की तुलना में भारत की जलवायु विशिष्ट है।

उष्णकटिबंधीय महाद्वीपों में व्यापारिक पवने ही वर्षा का मुख्य स्रोत है। इन पवनों की दिशा पूर्व से पश्चिम होती है| अतः महाद्वीपों के पश्चिम तटीय भाग तक पहुंचने तक व्यापारिक पवने अपनी आर्द्रता खो देती है और वर्षा नहीं हो पाती| इसी कारण महाद्वीपों के पश्चिम तटीय भाग में शुष्क अर्ध शुष्क मरुस्थलीय दशाएं पाई जाती है। भारत में ऐसा नहीं होता क्योंकि दक्षिण पश्चिमी मानसूनी पवने अरब सागर और बंगाल की खाड़ी दोनों ओर से प्रवेश करती है और इसमें आद्रता बनी रहती है।

इसके अतिरिक्त भारत का तटीय प्रदेश गर्म समुद्री जल धाराओं के प्रभाव में होता है जिससे भी आद्रता बनी रहती है जबकि उष्णकटिबंधीय महाद्वीपों के पश्चिम तटीय भाग में समुद्री ठंडी जलधाराओं के प्रभाव के कारण वायुमंडल की क्षमता में वृद्धि हो जाती है जो मरुस्थलीय दशाओं को विकसित करती है।

स्पष्ट है कि भारत की अक्षांशीय स्थिति उष्णकटिबंधीय होते हुए भी अन्य क्षेत्रों से विशिष्ट है। यहां शीतकाल में उत्तर पूर्वी मानसून तथा पछुआ विक्षोभ भी सक्रिय रहता है| उत्तर के मैदानी भाग में पछुआ विक्षोभ से वर्षा प्राप्त हो जाता है जबकि कोरोमंडल तट पर उत्तर पूर्वी मानसून से वर्षा प्राप्त हो जाती है। ऐसे में शीतकालीन मौसमी दशाएं भी पूर्णत शुष्क नहीं होती।

शीतकाल के प्रारम्भ में और ग्रीष्म काल के प्रारंभ में उष्णकटिबंधीय चक्रवात से भी वर्षा प्राप्त हो जाती है| इस प्रकार भारत का कोई भी क्षेत्र पूर्णतया शुष्क नहीं होता| विषुवतीय जलवायु का प्रभाव मालाबार तट, लक्ष्यदीप समूह और अंडमान निकोबार में उत्पन्न होता है। समुद्री प्रत्यक्ष प्रभाव तटवर्ती जलवायु को निर्धारित करती है जहां समकारी दशाएं पाई जाती है।

स्पष्ट है कि भारत की जलवायु को कई कारक प्रभावित करते हैं इनमें से कुछ कारक भारतीय उपमहाद्वीप की ही विशेषता है।

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