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[सिलेबस] प्रबन्ध (वैकल्पिक विषय) – बिहार लोक सेवा आयोग मुख्य परीक्षा पाठ्यक्रम BPSC Mains Syllabus

खण्ड- I (Section – I)

उम्मीदवारों को प्रबन्ध क्षेत्र में विकास के ज्ञान को व्यवस्थित निकाय के रूप में अध्ययन करना चाहिए तथा उक्त विषय पर प्रमुख पदाधिकारियों के योगदान से पर्याप्त रूप में परिचित रहना चाहिए। उन्हें प्रबन्ध की भूमिका कार्य तथा व्यवहार और भारतीय सन्दर्भ में विभिन्न संकल्पनाओं तथा सिद्धांतों को सुसंगति का अध्ययन करना चाहिए। इन सामान्य संकल्पनाओं के अतिरिक्त उम्मीदवार को व्यवसाय की जानकारी का अध्ययन करना चाहिए और साथ ही निर्णय करने के साधनों तथा तकनीकी को जानने की कोशिश भी करनी चाहिए।

संगठनात्मक व्यवहार तथा प्रबन्ध अवधारणायें

संगठनात्मक व्यवहार को समझने में सामाजिक, मनोवैज्ञानिक कारणों की महत्ता। अभिप्रेरणा सिद्धांतों को सुसंगति मेसलों, हर्जवर्ग, मेकग्रेगर, मेकग्रेड और अन्य मुख्य प्राधिकारियों का योगदान। नेतृत्व में अनुसंधान अध्ययन। वस्तुपरक प्रबन्ध, लघु समुदाय तथा अन्तर समुदाय व्यवहार। प्रबंधकीय भूमिका, संघर्ष तथा सहयोग, कार्यमानक तथा संगठनात्मक व्यवहार की गतिशीलता को समझने के लिए इन संकल्पनाओं का प्रयोग। संगठनात्मक परिवर्तन।

संगठनात्मक अभिकल्पनाः संगठन की शास्त्रीय, नवशास्त्रीय तथा विकृत-प्रणाली सिद्धांत। केन्द्रीयकरण, विकेन्द्रीयकरण, प्रत्यायोजन, प्राधिकार तथा नियंत्रण। संगठनात्मक ढांचा प्रणालियाँ तथा प्रक्रियाएँ, युक्तियाँ, नीतियाँ तथा उद्देश्य, निर्णय करना, संचार तथा नियंत्रण। प्रबन्ध सूचना प्रणाली तथा प्रबन्ध में कम्प्यूटर की भूमिका।

आर्थिक वातावरणः-

राष्ट्रीय आय, विश्लेषण तथा व्यवसायिक पूर्वानुमान में इसका योग भारतीय अर्थ व्यवस्था, सरकारी कार्यक्रम तथा नीतियों की प्रवृत्ति तथा ढांचा। नियामक नीतियाँ मुद्रा, वित्तीय तथा योजना और इस प्रकार की वृहत् नीतियाँ का उद्यन निर्णयों और योजनाओं पर प्रभाव माँग विश्लेषण तथा पूर्वानुमान, लागत विश्लेषण, विभिन्न बाजार संरचनाओं के अंतर्गत मूल्य निर्धारण निर्णय संयुक्त उत्पादों की मूल्य निर्धारण और मूल्य विभेद, पूंजीगत बजट बनाना भारतीय परिस्थितियों के अन्तर्गत लागू करना। परियोजनाओं का चयन तथा लागत लाभ विश्लेषण उत्पादन तकनीकों का चयन।

परिणात्मक पद्धतियाँ-

क्लासिको इष्टतम सकल तथा बहुल पतिवर्तनशील का महत्तम तथा लघुत्तम अवरोधों के अन्तर्गत इष्टतम अनुप्रयोग रैखिक प्रोग्रामन समस्या निरूपण रेखा चित्रीय समाधान, सिम्पलेक्स पद्धति। भ्यनिष्ठता इष्टतमोपरान्त विश्लेषण पूर्णांक प्रारूप तथा गतिशील प्रोग्रामन के अनुप्रयोग रैखिक प्रोग्रामन के परिवहन तथा सहनुदेशन प्रतिरूपों का निरूप तथा समाधान की पद्धतियाँ।

सांख्यिकीय पद्धतियाँ, केन्द्रीय प्रवृत्तियों तथा विविधाताओं के मापद्विपद, प्राल्प तथा सामान्य विवरण के अनुप्रयोग। केलमाला- प्रतिपरायन तथा ससम्बन्ध उपकल्पना के परीक्षण जोखिम में निर्णय करना। निर्णयाकुलत प्रत्याशित मुद्रा मूल्य सूचना का महत्व- कोई प्रमेह का पश्व, विश्लेषण के लिए अनुप्रयोग। अनिश्चितता में निर्णय करना। इष्ठतम युक्ति चयन हेतु विभिन्न मानदण्ड।

खण्ड- II (Section – II)

भाग-1 : विपणन प्रबन्ध (Part – 1 : Marketing Management)

विपणन तथा आर्थिक विकास- विपणन संकल्पना तथा भारतीय अर्थव्यवस्था में प्रायोज्यता, विकासशील अर्थव्यवस्था के सन्दर्भ में प्रबन्ध के मुख्य कार्य- ग्रामीण तथा शहरी विपणन, उनकी सम्भावनाएँ तथा समस्याएँ।

आन्तरिक निर्यात विपणन के प्रसंग में आयोजना एवं युक्ति विपणन की संकल्पना- मिश्रित विपणन अवधारणा- बाजार खण्डीकरण तथा उत्पादन युक्तियाँ- उपभोक्ता अभिप्रेरणा और व्यवहार- उपभोक्ता व्यवहार, प्रतिरूप उत्पादन दण्ड, वितरण, लोक वितरण प्रणाली, भाव तथा संवर्धन।

निर्णय- विपणन कार्यक्रमों का आयोजन तथा नियंत्रण- विपणन अनुसंधान तथा निदर्श-बिक्री संगठनात्मक गतिशीलता- विपणन सूचना प्रणाली, विपणन लेखा परीक्षा तथा नियंत्रण।

निर्यात प्रोत्साहन और संवर्धनात्मक युक्तियाँ- सरकार व्यापारिक संघों एवं एकल संगठनों की भूमिका- निर्यात विपणन की समस्याएँ तथा सम्भावनाएँ।

भाग- 2 : उत्पादन तथा सामग्री प्रबन्ध (Part – 2 : Production and Materials Management)

प्रबन्ध की दृष्टि से उत्पादन के मूलभूत सिद्धांत। विनिर्माण प्रणाली के प्रकार- सतत आवृत्तिमूलक। आन्तरायिक उत्पादन के लिए संगठन, दीर्घकालीन, पूर्वानुमान और समग्र उत्पादन योजना। संयंत्र अभिकल्पना, संसाधन, आयोजन, संयत्रं आकार आरै परिचालन की मापक्रम, संयंत्र अवविस्थति, भौतिक सुविधाओं का अभियांस उपस्कर प्रतिस्थापन तथा अनुरक्षण।

उत्पादन आयोजन तथा नियंत्रण के कार्य और विभिन्न प्रकार की उत्पादन प्रणालियों के मार्ग निर्धारण लदान और नियोजन। असेम्बली लाईन संतुलन, मशीन लाईन संतुलन।

सामग्री प्रबन्ध, सामग्री व्यवस्था, मूल्य विश्लेषण, गुण नियंत्रण, रद्दी और कुड़ा-कर्कट का निपटान, निर्माण या क्रय निर्णय, संहिताकरण, मानकीकरण और अतिरिक्त पूर्जों की सूची की भूमिका और महत्व।

सूची नियंत्रण- ए॰बी॰सी॰ विश्लेषण मात्रा पुनरावृत्ति बिन्दु निरापद स्टॉक। द्वि-बिन प्रणाली। रद्दी प्रबन्ध। पूत्र्ति तथा निपटान महानिदेशालय में क्रय प्रक्रिया तथा क्रियाविधि।

भाग- 3 : वित्तीय प्रबन्ध (Part – 3 : Financial Management)

वित्तीय विश्लेषण के सामान्य उपकरणः अनुपात विश्लेषण, निधि प्रवाह विश्लेषण, लागत परिमाण लाभ विश्लेषण, नकदी आय-व्यय, वित्तीय और परिचालन शक्ति निदेशः निर्णय भारत के विशेष सन्दर्भ में पूंजीगत व्यय प्रबन्ध की कार्यवाही के चरण निवेश, मूल्यांकन का मानदण्ड, पूंजी लागत तथा सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्र में इसका अनुप्रयोग निवेश निर्णयों में जोखिम विश्लेषण, पंूजीगत व्यय के प्रबन्ध का संगठनात्मक मूल्यांकन।

वित्त प्रबन्ध निर्माणः फर्मों की वित्तीय अपेक्षाआंे का आकलन, वित्तीय संरचना का निर्धारण पूंजी बाजार, भारत के विशेष सन्दर्भ में निधि हेतु संस्थागत संघ, प्रतिभूति विश्लेषण, पट्टे पर तथा उप संविदा पर देना।

कार्यगत पूंजी प्रबन्धः कार्यगत पूंजी के आकार का निर्धारण, कार्यगत पूंजी में जोखिम, नकदी प्रबन्ध, माल सूची तथा प्राप्ति के लेखा सम्बद्ध प्रबंधकीय दृष्टिकोण का प्रबन्ध करना, कार्यगत पूंजी प्रबन्ध पर मुद्रास्फीति के प्रभाव।

आय निर्धारण तथा विवरणः आन्तरिक वित्त व्यवस्था, लाभांश नीति का निर्धारण, मूल्यांकन तथा लाभांश नीति के निर्धारण में मुद्रास्फीति प्रवृत्तियाँ का आशय।

भारत के विशेष सन्दर्भ में सार्वजनिक क्षेत्र का वित्तीय प्रबन्ध।

बजट निष्पादन और वित्तीय लेखा-जोखा के सिद्धांत। प्रबन्ध नियंत्रण की प्रणालियाँ।

भाग- 4 : मानव संचालन प्रबंध (Part – 4 : Human Operations Management)

मानव संसाधनों की विशेषताएँ और महत्व, कार्मिक नीतियाँ, जन शक्ति, नीति ओर आयोजना – भत्र्ती तथा चयन तकनीक- प्रशिक्षण और विकास- पदोन्नतियाँ और स्थानान्तरण, निष्पादन मूल्यांकन- कार्य मूल्यांकन मजदूरी और वेतन प्रशासन, कर्मचारियों का मनोबल और अभिप्रेरणा, संघर्ष प्रबन्ध, प्रबन्ध में पतिवर्तन और विकास।

औद्योगिक संबंध, भारत की अर्थव्यवस्था और समाज, भारत में ट्रेड यूनियनवाद, औद्योगिक विवाद अधिनियम अदायगी, अधिनियम, बोनस, ट्रेड यूनियन अधिनियम के विशेष सन्दर्भ में श्रम विधायन, प्रबन्ध में औद्योगिक प्रजातंत्र और श्रमिकों की साझेदारी, सामूहिक सौदेबाजी, समझौता और निर्णय, उद्योग में अनुशासन तथा शिकायतों की देखरेख।

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