वायुमंडल

हमारा वायुमंडल पृथ्वी के चारो ओर स्थित गैस, धूलकण एवं जलवाष्प के मिश्रण से विकसित गैसीय आवरण है| इसका निर्माण पृथ्वी की उत्पत्ति के साथ ही भौतिक एवं जैविक दशाओं में परिवर्तन और अंतर्क्रिया के परिणाम स्वरूप हुई है|

वायुमंडल क्या है ( What is atmosphere)

हमारा वायुमंडल एक भौतिक संरचना है| यह गैस, धूलकण और जलवाष्प से मिलकर बना है| स्ट्रालर के अनुसार वायुमंडल की ऊँचाई लगभग 80,000 किलोमीटर तक मानी जाती है| हालाँकि विभिन्न विद्वानों में इसकी ऊँचाई को लेकर काफी मतभेद रहा है| इस संबंध में शोध अनुसंधान का कार्य जारी है|

वायुमंडल पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण बल के कारण पृथ्वी से सलंग्न है| गैस, धूलकण और जलवाष्प जैसे संघटक तत्वों की आनुपातिक स्थिति में संतुलन ही वायुमंडल की जैवीय दशा को बनाये रखती है| संरचनात्मक दृष्टिकोण से वायुमंडल को 6 मुख्य परतों में विभाजित किया जाता है|

  1. क्षोभमंडल [troposphere]
  2. समताप मंडल [stratosphere]
  3. मध्य मंडल [mesosphere]
  4. ताप मंडल [thermosphere] ( आयन मंडल – ionosphere )
  5. बाह्य मंडल [exosphere]
  6. चुम्बकीय मंडल [magnetosphere].

हमारा वायुमंडल किन चीजों से मिलकर बना है: गैस, धूलकण और जलवाष्प

हमारा वायुमंडल गैस, धूलकण और जलवाष्प से मिलकर बना है, इसे वायुमंडल का मुख्य संघटक तत्व (Constituent element of the atmosphere) भी कहते है| वायुमंडल यकायक प्रकट नहीं हुआ है, इसका निर्माण पृथ्वी की उत्पत्ति के साथ धीरे-धीरे प्रारंभ हुआ|

पृथ्वी कि उत्पत्ति के साथ हाइड्रोजन एवं हीलियम जैसे गैस का बनना शुरू हुआ| यह एत्मोसफेयर की सबसे पहली अवस्था मानी जाती है और इसीलिए इसे पृथ्वी का प्राथमिक वायुमंडल कहा गया| प्राथमिक वायुमंडल में पृथ्वी की भूगर्भिक क्रियाओं जैसे ज्वालामुखी, भूकम्प, महाद्वीपीय विस्थापन, प्लेट विवर्तनिकी आदि से विभिन्न गैसों और धुलकणों का प्रवेश हुआ| इसके बाद हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के संयोग से जल की उत्पत्ति हुई| हम जानते है कि जल के गर्म होकर गैस बनने से जलवाष्प का निर्माण होता है तो इस तरह जलवाष्प बना और जलवाष्प के कारण वायुमंडल में आर्द्रता (humidity) का प्रवेश हुआ|

एक के बाद जीवन के लिए आवश्यक कड़िया जुडती गयी और जीवन का उद्भव हुआ| जीवन के उद्भव ने वायुमंडल के संघटक तत्वों के विकास में और अधिक योगदान दिया| विभिन्न जीव-जन्तु और वनस्पतियों के विकास के साथ ही श्वसन क्रिया, प्रकासशंश्लेषण क्रिया एवं अन्य जैविक क्रियाओं के कारण भी वायुमंडल के संघटक तत्वों का विकास हुआ. इस प्रक्रिया से ही वर्तमान वायुमंडल की उत्पत्ति हुई जो जैविक वातावरण के लिए अनुकूल है.

गैसों की आनुपातिक स्थिति के आधार पर वायुमंडल को दो भागों में विभाजित किया जाता है| सममंडल और विषममंडल| सममंडल की उंचाई लगभग 80 किलोमीटर तक है| इसमें गैसों का अनुपात लगभग एक समान बना रहता है.

80 किलोमीटर से ऊपर विषममंडल स्थित है| यानी की कहा जा सकता है की सममंडल के ऊपर विषममंडल स्थित है| इस मंडल में गैसों के अनुपात में परिवर्तन हो जाता है| यहाँ गैसों में सर्वाधिक nitrogen 78 % के अलावे oxygen 20.9 % और argon 0.9 % मिलता है| इसके अतिरिक्त अल्प मात्रा में Carbon dioxide, Nitrogen, oxygen जैसी भारी गैसे निचली वायुमंडल में और hydrogen, helium जैसी हल्की गैसें ऊपरी वायुमंडल में पाई जाती है| वायुमंडलीय भार का लगभग 97 % भार निचली वायुमंडल में पाई जाती है| यहाँ गैस आणविक एवं परमाण्विक अवस्था में पाई जाती है|

धूलकण का स्त्रोत पृथ्वी और ब्रह्माण्ड के पिंड है| इन्हें क्रमशः पार्थिव धूलकण ब्रह्माण्डीय धूलकण कहते है. पार्थिव धूलकण औसत 12 किलोमीटर तक अधिक पाया जाता है | ऊपरी वायुमंडल में ब्रह्माण्डय धूलकण की उपलब्धता है | धूलकण संघनन के लिए आर्द्रता ग्राही नाभिक का कार्य करता है | यानी की धूलकण के ऊपर ही जलवाष्प के संघनित होने से बादलों का निर्माण होता है | यह क्रिया सर्वाधिक 5 किलोमीटर की ऊँचाई तक होती है | अतः इन्हीं क्षेत्रों में वर्षा वाले बादल विकसित होते है जो पृथ्वी पर जल चक्र का प्रमुख आधार है |

जलवाष्प का एकमात्र स्त्रोत पृथ्वी का जलीय भाग है| इसकी उपलब्धता भी औसत 12 किलोमीटर तक होती है लेकिन 5 किलोमीटर तक इसकी उपलब्धता सर्वाधिक मात्रा में होती है| जलवाष्प वायुमंडलीय आर्द्रता है|इसमें संघनन से बादलों का निर्माण होता है जिससे पृथ्वी पर जल की आपूर्ति सुनिश्चित होती है|

स्पष्ट है की वायुमंडल के संघटक तत्वों की विशिष्ट भौतिक दशा और उपलब्धता न केवल वायुमंडल की भौतिक दशा को निर्धारित करता है बल्कि पृथ्वी पर जैवीय दशाओं एवं अनुकूल पारिस्थितिकी तंत्र के विकास में आधारभूत महत्व रखता है|

वायुमंडल के संघटक तत्व – गैस, धूलकण और जलवाष्प का महत्व

वायुमंडल के संघटक तत्वों का पृथ्वी पर जीवन के लिए विशिष्ट महत्व है| Carbon dioxide, Nitrogen, oxygen आदि पारिस्थितिक तंत्र में भुजैव रासयनिक चक्र के लिए महत्वपूर्ण है| भुजैव रासयनिक चक्र का सम्पन्न होना पृथ्वी पर जीवन के लिए अति आवश्यक है|

वायुमंडल में CO2 मात्र 0.003 % है लेकिन यह प्रमुख ग्रीनहाउस गैस है| इसके कारण पृथ्वी की औसत ताप संतुलन बना रहता है| वायुमंडल सूर्य से उत्सर्जित लघु तरंग के रूप में ऊर्जा तरंग के लिए लगभग पारदर्शक माध्यम का कार्य करता है और वायुमंडल में प्रवेश करने वाली सौर ऊर्जा का अधिकांस भाग पृथ्वी को प्राप्त हो जाता है|

पृथ्वी द्वारा सौर ऊर्जा का अवशोषण और उत्सर्जन किया जाता है| उत्सर्जित सौर ऊर्जा दीर्घ तरंग के रूप में होती है जिसे पार्थिव विकिरण कहा जाता है| इस पार्थिव विकिरण के लिए ग्रीन हाउस गैस अवरोधक का काम करती है| ग्रीन हाउस गैसों द्वारा ही पार्थिव विकिरण के अवशोषण से वायुमंडल गर्म होती है और पृथ्वी पर तापमान की प्राप्ति होती है|

ओजोन अत्यंत अल्प मात्रा में 0.001% पाई जाती है लेकिन सूर्य से उत्सर्जित पराबैंगनी किरणों को अवशोषित कर पृथ्वी पर जीवन की रक्षा करती है| ओजोन द्वारा पराबैंगनी किरणों के अधिकतम भाग का अवशोषण होता है और सिमित रूप से इसे पृथ्वी पर आने देती है जो विटामिन डी के निर्माण के लिए तथा उपापचय क्रिया के लिए आवश्यक है लेकिन अधिक मात्रा में इसके पहुँचने से चर्म कैंसर, वैश्विक तापन सहित कई दुष्प्रभाव उत्पन्न होंगें|

इसी तरह ऑक्सीजन, नाइट्रोजन आदि गैसों का भी पृथ्वी पर जीवन के लिए व्यापक महत्व है| गैस के आलावा धूलकण और जलवाष्प भी विभिन्न जीव-जन्तु और वनस्पतियों के विकास के साथ ही श्वसन क्रिया, प्रकासशंश्लेषण क्रिया एवं अन्य जैविक क्रियाओं के लिए व्यापक महत्व रखते है| स्पष्ट है कि वायुमंडल के संघटक तत्व गैस, धूलकण और जलवाष्प का पृथ्वी पर जीवन के लिए व्यापक महत्व रखते है|

वायुमंडल की संरचना एवं परतें (Structure & layer of atmosphere)

वायुमंडल एक भौतिक संरचना जिसका निर्माण प्रमुखतः गैस, धूलकण और जलवाष्प द्वारा होता है| यह उल्लेखनीय है कि पूरा वायुमंडल संरचनात्मक रूप से एक समान नहीं होता और ऊंचाई बढ़ने के साथ इसमें काफी संरचनात्मक विविधता मिलती है| इसी आधार पर वायुमंडल को विभिन्न परतों में बांटा जा सकता है| संरचनात्मक दृष्टिकोण से वायुमंडल को 6 मुख्य परतों: क्षोभमंडल, समताप मंडल, मध्य मंडल, ताप मंडल (आयन मंडल ionosphere), बाह्य मंडल और चुम्बकीय मंडल विभाजित किया जाता है|

क्षोभमंडल (Troposphere)

पृथ्वी से लगी निचली वायुमंडलीय परत को क्षोभमंडल (Troposphere) कहते है| विषुवतीय प्रदेश में अधिक तापमान के कारण वायु की तीव्र संवहन धारा विकसित होने से क्षोभमंडल की ऊँचाई लगभग 18 किलोमीटर तक मिलती है जबकि ध्रुवों पर कम तापमान के कारण क्षोभमंडल मात्र 8 किलोमीटर तक विस्तृत है|

यहाँ विभिन्न वायुमण्डलीय परिघटनाए घटित होती है| इसी कारण इसे विक्षोभमंडल या परिवर्तन मंडल भी कहते है| यहाँ बादलों का निर्माण चक्रवात, प्रति चक्रवात , पवन प्रवाह जैसी दशाएं विकसित होती है| इसके ऊपरी भाग में तीव्र वेग वाली जेट वायुधारा प्रवाहित होती है| क्षोभमंडल में ऊंचाई के साथ पार्थिव विकिरण के प्रभाव में कमी के कारण तापमान में कमी आती है. इसी कारण क्षोभसीमा के आसपास तापमान -60 से -65 डिग्री सेन्टीग्रेड हो जाता है.

क्षोभसीमा: यह एक संक्रमण परत है जो समताप मंडल और क्षोभमंडल के बीच स्थित है| यहाँ पर वायुमण्डलीय परिघटनाए लगभग समाप्त हो जाती है, इसीलिए क्षोभसीमा को मौसमी परिवर्तन का छत (roof) भी कहा जाता है| विभीन्न मौसम एवं ऋतू में क्षोभमंडल की ऊँचाई के साथ क्षोभसीमा के ऊँचाई में भी परिवर्तन होता है|

समताप मंडल (Stratosphere)

यह औसत 50 किलोमीटर तक विस्तृत परत है| यहाँ ओजोन की सांद्रता या अनुपात सर्वधिक पाई जाती है|समताप मंडल में 20-35 किलोमीटर के मध्य की परत को ओजोन परत कहा जाता है| ओजोन द्वारा पराबैंगनी किरणों के अवशोषण के कारण समताप मंडल में ऊँचाई के साथ तापमान में वृद्धि होती है और समताप सीमा पर तापमान ऋणात्मक से बढ़ कर शुन्य (0) तक पहुँच जाता है| समताप मंडल में पृथ्वी से धूलकण और जलवाष्प के पहुँचने से मुक्ताभी मेघ (mother of pearl cloud) का निर्माण होता है|

मध्यमंडल (Mesosphere)

इसका विस्तार समताप सीमा के ऊपर लगभग 80 किलोमीटर तक है| यहाँ ओजोन की अनुपस्थिति तथा पार्थिव विकिरण का प्रभाव नहीं होने के कारण ऊँचाई के साथ तापमान में कमी आती है| यहाँ मध्यसीमा के पास वायुमंडल का न्यूनतम तापमान -85 से -100 डिग्री सेल्सियस तक हो जाता है| मध्यमण्डल में कभी-कभी ब्रह्माण्ड के धूलकण के साथ जलवाष्प के मिलने से बादलों का निर्माण हो जाता है. इसे निशादीप्त बादल कहते है|

तापमंडल (Thermosphere)

मध्यसीमा के ऊपर औसत 500 किलोमीटर की ऊँचाई तक आयनीकृत पदार्थों की स्थितिवाली तापमंडल स्थित है| यहाँ आयनमंडल की स्थिति है, जहाँ से पृथ्वी की रेडियों तरंगें प्रभावित होती है| इसका उपयोग सुचना और संचार के लिए किया जाता है|

आयनमंडल का विस्तार 60 से 640 किलोमीटर तक है. इसमें 100 से 300 किलोमीटर के मध्य आयन की संख्या सर्वाधिक पाई जाती है. इसे ऊँचाई की ओर क्रमशः D परत, E परत तथा F परत में विभाजित किया जाता है.

D परत: यह लगभग 60 से 100 किलोमीटर तक होती है और केवल दिन में कार्य करता है| इससे रेडियों की दीर्घ तरंगों का परावर्तन होता है|

E परत: यह लगभग 90 से 130 किलोमीटर तक होती है और यह भी केवल दिन में ही कार्य करता है| यह भी रेडियों के दीर्घ तरंगों का परावर्तन करती है|

F परत: यह लगभग 130 से 300 किलोमीटर तक होती है और यह दिन और रात दोनों में ही कार्य करता है| यह रेडियों के लघु तरंगों का परावर्तन करती है. यह सुचना एवं संचार के लिए सर्वाधिक उपयोगी है|

बहिर्मंडल (Exosphere)

आयन मंडल के ऊपर के परतों में आयनीकृत पदार्थो की मात्रा में वृद्धि होती है| इसके कारण तापमान में भी क्रमिक वृद्धि होती है|

चुम्बकीय मंडल (magnetosphere)

इसे पृथ्वी की वायुमंडल की सबसे बाहरी परत माना जाता है| इसमें कॉस्मिक किरणों का सर्वाधिक प्रभाव होता है| यहाँ सौर विद्युत आंधियां चलती रहती है और सौर ज्वाला तथा लपट का प्रभाव होता है| इस क्षेत्र में घटित घटनाओं का प्रभाव क्षोभमंडल की वायुमंडलीय दशाओं पर भी होता है|

चुम्बकीय मंडल के बाद सौर विद्युत का प्रभाव अधिक हो जाता है और पृथ्वी का वायुमंडल समाप्त मान लिया जाता है| इस तरह पृथ्वी की सतह से लेकर चुम्बकीय मंडल तक संरचनात्मक दृष्टिकोण से वायुमंडल को 6 परतों में विभाजित किया जाता है|

स्पष्ट है कि वायुमंडल पृथ्वी पर जीवन के लिए आधारभूत कारक है| यही वह कारक है जिसके नहीं होने से सौरमंडल के किसी अन्य ग्रह पर जीवन नहीं मिलते है| वायुमंडल की संरचना में पर्याप्त जटिलता पाई जाती है| वर्तमान में निचली वायुमंडल और मुख्यतः क्षोभमंडल का ही अध्ययन किया जा सका है, अतः वायुमंडल की संरचना एवं वायुमंडलीय दशाओं को समझने के लिए विशेष वैज्ञानिक अनुसन्धान अपेक्षित है|

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