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मराठा और अंग्रेजो के बीच संघर्ष

मराठो की पृष्ठभूमि

औरंगजेब के काल में शिवाजी (1627-1680) ने 1674 में मराठा राज्य की स्थापना की. इसके बाद शम्भा जी 1680-1689), राजाराम (1689-1700) और ताराबाई (1700-1707) मराठा छत्रपति रहे. शाहू शम्भा जी का उत्तराधिकारी था लेकिन वो औरंगजेब के काल से ही मुगलों की कैद में था. औरंगजेब की मृत्यु के बाद उत्तर मुग़ल शासक बहादुर शाह 1 ने शाहू को कैद मुक्त कर दिया.

पेशवा पद का उद्भव – मुगलों के कैद से मुक्त होने पर शाहू मराठा क्षेत्र में पहुंचा जहां छत्रपति पद के लिए ताराबाई से उसका संघर्ष हुआ. शाहू अपने पेशवा बालाजी विश्वनाथ की सहायता से ताराबाई के खिलाफ सफल रहा तथा मराठा छत्रपति बना. लेकिन शाहू के काल में मराठा राजनीति में बड़ा परिवर्तन हुआ. अब मराठों में छत्रपति के बजाय पेशवाओं का उद्भव हुआ तथा राजनीति एवं प्रशासन में उन्हीं का बोलबाला रहा. मराठो में तीन मुख्य पेशवा हुए जिन्होंने पेशवा पद के मर्यादा को स्थापित किया – बालाजी विश्वनाथ (1713-1720), बाजीराव 1 (1720-1740), बालाजी बाजीराव (1740-1761).

1761 के बाद मराठे – औरंगजेब की मृत्यु के बाद उत्तर मुग़ल शासक कमजोर होते गये. इधर अहमद शाह अब्दाली एक बार फिर भारत और दिल्ली को लुटने बढ़ चला. उत्तर मुग़ल शासक ने अहमद शाह अब्दाली को रोकने के लिए मराठो की सहायता मांगी. दरअसल उस समय मराठा ही थे जो सर्वाधिक शक्तिशाली थे. मराठों और अहमद शाह अब्दाली के बीच पानीपत में युद्ध हुआ, जिसे पानीपत तृतीय का युद्ध कहा जाता है. लेकिन विभिन्न कारणों, जिनकी चर्चा हम आगे करेंगें, के चलते इस युद्ध में मराठो की हार हुई.

पानीपत तृतीय में हार के बाद मराठे कमजोर हुए तथा उसके बाद की राजनीति में क्षेत्रीय मराठा सरदारों का उद्भव हुआ. 1. ग्वालियर का सिंधिया 2. इंदौर का होलकर 3. बड़ौदा का गायकवाड 4. नागपुर का भोसले 5. धारा का पवार

पानीपत का तृतीय युद्ध 1761

हम यहाँ पानीपत के तृतीय युद्ध के बारे में जानेंगें की युद्ध पानीपत में ही क्यों हुआ. अर्थात क्या कारण है की बड़े बड़े युद्ध पानीपत में ही लड़े गये? इस युद्ध में मराठो के हार के कारण क्या थे और पानीपत के तृतीय युद्ध का परिणाम क्या रहा.

युद्ध पानीपत में ही क्यों?

पानीपत भारतीय इतिहास में तीन महत्वपूर्ण एवं निर्णायक युद्ध (1526, 1556, 1761) के लिए जाना जाता है. यह सभी महत्वपूर्ण युद्ध अपने प्रकृति में भारतीय साम्राज्य को झकझोर देने वाले थे. इसमें बड़ी सेनाओं ने भाग लिया. युद्ध के मैदान के रूप में पानीपत के चुनाव के पीछे भौगोलिक, सामाजिक तथा आर्थिक कारक महत्वपूर्ण थे.

भौगोलिक कारक – पानीपत का भूगोल उसे एक विशेष स्थान प्रदान करता है. यह एक मैदानी इलाका है जहां बड़ी संख्या में सेना आपस में युद्ध कर सकते हैं. मध्यकाल में राज्यों की शक्ति के लिए जोर आजमाइश आमने-सामने की युद्ध में किया जाता था. फलस्वरूप पानीपत का चुनाव किया जाता था. अतः उसकी भौगोलिक स्थिति एक महत्वपूर्ण कारक थी.

सामरिक कारक – सामरिक दृष्टि से पानीपत महत्वपूर्ण स्थान है. बाहरी हमलावरों के लिए पानीपत का विजय दिल्ली के लिए मार्ग प्रशस्त करती थी वहीं दिल्ली के शासकों के लिए अपने साम्राज्य की सुरक्षा के लिए पानीपत में ही शत्रु को रोकने की चिंता होती थी.

आर्थिक कारक – पानीपत आर्थिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण स्थान है यह कृषि से संपन्न इलाका है. दिल्ली से पंजाब पाकिस्तान, अफगानिस्तान की तरफ महत्वपूर्ण व्यापारिक मार्ग पर पड़ता है. अतः यहां से अधिक से अधिक आय की संभावना होती थी.

पानीपत 3 में मराठों की पराजय के कारण

  • मराठा नेतृत्व में मतभेद एवं संकट – विश्वास राव वर्सेज सदाशिव राव भाऊ
  • अन्य क्षेत्रीय शक्तियों से मराठो के अच्छे संबंध का ना होना. (चौथ की वसूली के कारण)
  • मराठा सेनापति द्वारा जाट सूरजमल के सुझाव का नजरअंदाज किया जाना. (सेना का भार कम करने, स्त्रियों और बच्चों को छोड़ने आदि को लेकर)
  • पानीपत में युद्ध मोर्चे पर युद्ध के अनुकूल मोर्चे नहीं मनाना तथा अनुपयुक्त समय में युद्ध लड़ना
  • अहमद शाह अब्दाली द्वारा रसद आपूर्ति एवं संचार मार्ग को बाधा पहुंचाना ( पानीपत-दिल्ली मार्ग को अवरुद्ध करना)

पानीपत 3 के युद्ध का परिणाम

पानीपत के तृतीय युद्ध की मुग़ल, मराठा और अंग्रेजों पर विशेष प्रभाव पड़ा. अब यह तय हो गया कि हिंदुस्तान की गद्दी पर कौन राज करेगा. पानीपत 3 के परिणाम निम्नलिखित है.

  • मुगल साम्राज्य पर प्रभाव – मुगल के पतन की गति और तेज हुई, क्योंकि इस हार ने मुगल सैन्य क्षमता की कमजोरी को उजागर कर दिया. इन्ही स्थितियों में मुगल राजनीति में गड़बड़ी को और बढ़ावा मिला.
  • मराठों पर प्रभाव – मराठों की शक्ति कमजोर हुई. इस बात की उम्मीद की जा रही थी कि हिंदुस्तान की राजनीति में वे मुगलों के उत्तराधिकारी होंगे तथा बड़ा राज्य कायम कर सकते हैं. लेकिन ऐसा ना हो सका.
  • अंग्रेजों पर प्रभाव – अंग्रेजी इसी समय बंगाल में अपनी स्थिति मजबूत कर रहे थे. बक्सर के युद्ध के बाद मराठे ही थे जो अंग्रेजों को राज्य विस्तार में रोक लगा सकते थे लेकिन इस हार ने मराठो से यह अवसर छीन लिया. अंग्रेजी राज्य के विस्तार के लिए अब मैदान साफ था. पानीपत 3 में मराठों की हार ने अंग्रेजों को लाभ पहुंचाया अब यह तय हो गया कि हिंदुस्तान की गद्दी पर कौन राज करेगा

मराठा और अंग्रेजो के बीच संघर्ष

मराठा पानीपत तृतीय के बाद भी अभी कमजोर नहीं हुए थे. पश्चिमी तथा मध्य भारत में वे अभी भी शक्तिशाली थे तथा उनके समाप्ति के बिना एक छत्र अंग्रेजी राज्य की स्थापना नहीं हो सकती थी. इसी बीच मराठो में आंतरिक संघर्ष शुरू हो गया जिसका फायदा अंग्रेजों को मिला. और एक के बाद एक तीन आंग्ल मराठा युद्ध के फलस्वरूप अंग्रेजो ने मराठो को सिमित कर दिया.

प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध First Anglo-Maratha War (1775–1782)

कारण – प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध का कारण अंग्रेजों की महत्वाकांक्षाएं तथा मराठों में आंतरिक संघर्ष था.

घटनाएं एवं युद्ध की शुरुआत – मराठो में पेशवा पद को लेकर दो व्यक्तियों रघुनाथ राव तथा सवाई माधवराव के बीच संघर्ष छिड़ गया. रघुनाथ राव ने खुद को पेशवा बनाए जाने की शर्त पर 1775 में कंपनी से सूरत की संधि कर ली. इस घटना से बाकी मराठा सरदार क्रुद्ध हो गए तथा अंग्रेजों से युद्ध प्रारंभ हो गया.

नेतृत्व – प्रथम आंग्ल मराठा युद्ध में अंग्रेजो का नेतृत्व वारेन हेस्टिंग्स कर रहा था जबकि दूसरी ओर विभिन्न मराठा सरदार थे.

परिणाम – इस युद्ध में मराठो का पलड़ा भारी रहा. कई मराठा सरदारों ने जगह-जगह अंग्रेजों को मात दिया. प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध की समाप्ति सल्बई की संधि (1782) के साथ हुआ. संधि के अनुसार दोनों पक्षों ने एक दूसरे की विजित प्रदेश को लौटा दिया. अंग्रेजों को सवाई माधव राव को पेशवा मानना पड़ा.
इस संधि को अंग्रेजी दृष्टिकोण से संधि से ज्यादा 20 वर्षीय युद्ध विराम माना जाता है. क्योंकि 20 वर्ष बाद अंग्रेजों ने मौका मिलते ही फिर युद्ध छेड़ दिया.

द्वितीय आंग्ल मराठा युद्ध Second Anglo-Maratha War (1803–1805)

कारण – द्वितीय आंग्ल मराठा युद्ध का कारण मराठों का आंतरिक संघर्ष तथा अंग्रेजी महत्वाकांक्षाएं थी.

घटनाएं एवं युद्ध की शुरुआत – 1802 ई. में पेशवा बाजीराव द्वितीय ने अंग्रेजों से वर्साय की संधि कर ली. यह एक सहायक संधि थी. इस घटना से एक बार पुनः अन्य मराठा सरदार बिगड़ गए तथा युद्ध प्रारंभ हो गया.

नेतृत्व – द्वितीय आंग्ल मराठा युद्ध में अंग्रेजों का नेतृत्व लॉर्ड वेलेजली कर रहा था जबकि दूसरी ओर विभिन्न मराठा सरदार सिंधिया भोंसले होलकर आदि थे.

परिणाम – इस बार अंग्रेजों का पलड़ा भारी रहा. उन्होंने अलग-अलग स्थानों पर विभिन्न मराठा सरदारों को पराजित किया तथा उनसे संधि कर ली.

  • सरजी अजू संधि सिंधिया और अंग्रेजो के बीच (सितम्बर 1803)
  • देवगांव की संधि भोंसले और अंग्रेजो के बीच (सितम्बर 1803)
  • राजपुर घाट संधि होल्कर और अंग्रेजो के बीच (जनवरी 1806)

तृतीय आंग्ल मराठा युद्ध Third Anglo-Maratha War (1817–1818)

कारण – तृतीय आंग्ल मराठा युद्ध कारण मराठों तथा अंग्रेजो के बीच अंतिम प्रत्यक्ष संघर्ष था.

नेतृत्व – अंग्रेजों का नेतृत्व लॉर्ड हेस्टिंग्स तथा मराठों की तरफ से विभिन्न सरदार लड़ रहे थे.

परिणाम – अंग्रेज काफी मजबूत स्थिति में आ चुके थे. अतः विभिन्न स्थानों पर मराठा सरदारों की हार हुई तथा सरदारों से सन्धियाँ कर उन्हें अपने स्थान पर सिमटने के लिए बाध्य कर दिया. युद्ध की समाप्ति दो संधियों द्वारा हुई. 1. सिंधिया और अंग्रेजों के बीच ग्वालियर की संधि (1817 में), होलकर और अंग्रेजो के बीच मंदसौर की संधि (1818 ई. में.).

मराठों के संदर्भ में अंग्रेजों का निर्णय – तृतीय आंग्ल मराठा युद्ध के बाद मराठों के अधिकांश हिस्सों पर अंग्रेजों ने कब्जा कर लिया तथा एक छोटे से मराठा राज्य को बनाए रखा गया. सतारा में शिवाजी के एक वंशज (प्रताप सिंह) को मराठो का शासक मान लिया गया. पेशवा पद को झगड़े का जड़ मान लिया गया तथा अंग्रेजों ने पेशवा बाजीराव द्वितीय को पेंशन देकर कानपुर के बिठूर में रहने को बाध्य किया.
धीरे धीरे पेशवाओं के अस्तित्व को इनकार कर दिया गया. 1857 के आस पास अंग्रेजों ने पेशवाओं के लिए पेंशन देने से भी इंकार कर दिया. यही कारण है कि नाना साहब ने 1857 के विद्रोह में भाग लिया

मराठा-अंग्रेज संघर्ष में मराठो के पराजय का कारण

1. मराठा सेना की दुर्बलता – मराठा राजनीति एक संघ की राजनीति थी, जो विभिन्न स्थानीय मराठा सरदार, पेशवा तथा छत्रपति के मिलने से बनती थी. लेकिन यह ढीला-ढाला संघ था. इन्हें आपस में जोड़ने वाला कोई मजबूत तत्व नही था.

2. मराठों में नेतृत्व का अभाव – शुरू (शिवाजी और उनके वंशज) के बाद मराठों में कोई सर्वमान्य नेता नहीं रहा. इससे नेतृत्व का संकट उत्पन्न हुआ. विभिन्न मराठा सरदारों में आपसी प्रतिस्पर्धा और खींचतान थी.

3. मराठा सैन्य प्रणाली के दोष – मराठा सैन्य प्रणाली में काफी कमजोरियां थी. मराठा सैनिक अधिकांशत छापामार (गोरिल्ला) तथा पहाड़ी युद्ध में अभ्यस्त थे. उन्होंने खुद को मैदानी युद्ध के अनुकूल ठीक से नहीं ढाला था. समकालीन यूरोपीय जैसे अनुशासन, प्रशिक्षण, आधुनिक हथियार रणनीति एवं योजना पर ध्यान नहीं दिया गया जबकि इनकी तुलना में अंग्रेज अधिक दक्ष थे. अंग्रेजों की गुप्तचर प्रणाली अधिक सक्षम थी. मराठों की हर आंतरिक गतिविधि की खबर वे रखते थे.

4. मराठों के पास मजबूत आय के स्रोत का ना होना – मराठो ने निश्चित आय के स्त्रोत की व्यवस्था नहीं की. वे चौथ की वसूली पर निर्भर रहें. इससे आस-पास के क्षेत्रीय शक्ति उनकी दुश्मन बनी, जो उनके पराजय का कारण बना.

5. अंग्रेजों का आधुनिक होना एवं मराठों के मराठों का मध्य अंतर में रहना – अंग्रेज तुलनात्मक रूप से आधुनिक तथा प्रगतिशीलता वाले लोग थे जबकि मराठे अभी भी मध्ययुगीनता में रह रहे थे. अंग्रेज जहां राष्ट्रीय भावना से एकजुट होकर कार्य करते थे वहीं मराठों में ऐसी भावना नहीं थी.

उपरोक्त कारणों के फलस्वरूप एक के बाद एक तीन आंग्ल मराठा युद्ध के फलस्वरूप अंग्रेजो ने मराठो को सिमित कर दिया.

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