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यूरोपियन व्यापारियों का बिहार में आगमन

भारतीय इतिहास की प्रसिद्ध बक्सर की लड़ाई 1764 में लड़ी गयी, बक्सर वर्तमान बिहार में ही पटना से 115 किमी की दूरी पर स्थित है
ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के शासनकाल में बिहार का पटना एक प्रमुख व्यापार केंद्र था

बिहार में डचों कंपनियों का आगमन

बिहार में यूरोपीय व्यापारी कंपनियों का आगमन 17वीं सदी में प्रारंभ हुआ। उस समय बिहार अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का एक महत्त्वपूर्ण केंद्र था। बिहार के क्षेत्र में सर्वप्रथम पुर्तगाली आए, जिन्होंने अपना व्यापारिक केंद्र हुगली में स्थापित किया था। वे हुगली से ही नाव के माध्यम से पटना आया करते थे। वे अपने साथ मसाले, चीनीमिट्टी के बरतन आदि लाते थे और वापसी में सूती वस्त्र एवं अन्य प्रकार के वस्त्र ले जाते थे।

17वीं शताब्दी के मध्य तक डचों ने बिहार के कई स्थानों पर शोरे का गोदाम स्थापित किया था। सर्वप्रथम डचों ने पटना कॉलेज की उत्तरी इमारत में 1632 ई. में डच फैक्टरी (Dutch Factory) की स्थापना की। इनकी अभिरुचि सूती वस्त्र, चीनी, शोरा, अफीम आदि से संबंधित व्यापार में थी। 1662 ई. में बंगाल में डच मामलों के प्रधान नथियास वैगडेंन बरूक ने मुगल सम्राट् औरंगजेब से व्यापार से संबंधित एक फरमान बंगाल, बिहार और उड़ीसा के लिए प्राप्त किया था। डच यात्री ट्रैवरनि 21 दिसंबर, 1665 को पटना पहुँचा। उसके बाद उसने छपरा से यात्रा की। छपरा में उस समय शोरे का शुद्धीकरण किया जाता था। शोरे पर अधिकार के लिए फ्रांसीसी, ईस्ट इंडिया कंपनी एवं डच कंपनियों के बीच हमेशा तनाव उत्पन्न होते रहते थे। 1848 ई. में विद्रोही अफगान सरदार शमशेर खान ने पटना पर आक्रमण किया तथा फतुहा स्थित डच फैक्टरी को लूटा। प्लासी के युद्ध में अंग्रेजों की सफलता ने डचों की स्थिति को और दयनीय बना दिया। 1758 ई. में अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी ने बिहार में शोरे के व्यापार पर एकाधिकार प्राप्त कर लिया। नवंबर, 1759 में वेदरा के निर्णायक युद्ध में डच अंग्रेजों के हाथों पराजित हुए और उनका अस्तित्व लगभग समाप्त हो गया। वे किसी तरह से अपने चिनकूसा कासिम बाजार एवं पटना के माल गोदाम को सुरक्षित रखने में सफल हो पाए।

1780-81 ई. के बीच यूरोप में ब्रिटेन एवं हॉलैंड के बीच युद्ध छिड़ जाने के कारण बिहार में भी दोनों कंपनियों के बीच संबंध तनावपूर्ण हो गए। 10 जुलाई, 1781 को पटना मिलिशिया के कमांडिंग ऑफिसर मेजर हार्डी ने पटना डच मालगोदाम को जब्त कर लिया। छपरा एवं सिंधिया की डच फैक्टरियों को भी अपने कब्जे में ले लिया गया। 5 अगस्त, 1781 को पैट्रिक हिट्ले ने डच फैक्टरी की कमान मैक्सवेल से ग्रहण की। 8 अक्तूबर, 1784 को डच कंपनी को गोदाम फिर से वापस दे दिया गया। पुनः 1795 ई. में फ्रैंको-डच युद्ध के कारण भारत में डच ठिकानों को अंग्रेजी सरकार के अधीन कर दिया गया, लेकिन 1817 ई. में डच माल गोदामों को पुनः वापस कर दिया गया। अंततः 1824-25 ई. में डच व्यापारिक केंद्रों को अंतिम रूप से अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी में सम्मिलित कर लिया गया।

बिहार में फ्रांसीसी कंपनियों का आगमन

भारत में फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कंपनी (French East India Company) की स्थापना फ्रेंकोइस मार्टिन के नेतृत्व में 1664 ई. में की गई। मार्टिन ने 1674 ई. में पांडिचेरी की स्थापना की तथा शीघ्र ही उसने माही, कराइकल एवं दूसरी जगहों पर फ्रांसीसी व्यापारिक केंद्रों की स्थापना की। कुछ वर्षों के उपरांत फ्रांसीसियों ने बंगाल में प्रवेश किया एवं चंद्रनगर की स्थापना की। इसके तत्काल बाद 1734 ई. में उन्होंने पटना में माल गोदाम की स्थापना की। फ्रांसीसी कंपनी की मुख्य दिलचस्पी बिहार में शोरा प्राप्त करना था। अपने प्रभुत्व एवं व्यापार के उद्देश्य से अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी एवं फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच तनाव की स्थिति बनी रहती थी। अंग्रेजों ने मार्च, 1757 में चंद्रनगर पर कब्जा कर लिया। कासिम बाजार में फ्रांसीसी कंपनी के प्रमुख एम. जीयालों को बंगाल छोड़ने पर विवश होना पड़ा। जींयालॉ 2 मई, 1757 को भागलपुर पहुँचा और 3 जून को पटना आया। पटना में बिहार के डिप्टी गवर्नर राजा राम नारायण ने उसका स्वागत किया तथा बैरक के निर्माण के लिए जगह प्रदान की। प्लासी के युद्ध में विजयी होने के बाद अंग्रेज ईस्ट इंडिया कंपनी के तत्कालीन बिहार के जनरल आयरकुट ने जींयालॉ को पटना से निष्कासित कर फ्रांसीसी माल गोदामों पर कब्जा कर लिया। 1761 ई. में पांडिचेरी भी फ्रांसीसियों के हाथ से निकल गया। 1763 ई. में डैरिफ की संधि के तहत फ्रांसीसी कंपनी को अपने खोए हुए क्षेत्र वापस मिले। 1793 ई. में लॉर्ड कार्नवालिस के समय भारत में फ्रांसीसियों की व्यापारिक गतिविधि सिमटकर पांडिचेरी तक रह गई। धीरे-धीरे 1814 ई. तक बिहार एवं भारत से फ्रांसीसी गतिविधियाँ लुप्तप्राय हो गई।

बिहार में डेनिस कंपनी का आगमन

भारत में आनेवाली यूरोपीय कंपनियों (European Companies) में डेनमार्क का नाम सबसे अंत में लिया जाता है। प्रायः 1774-75 ई. में पटना में डेनमार्क के कंपनी की फैक्टरी की स्थापना हुई। मई, 1775 में पटना की डेनिस फैक्टरी के प्रमुख जॉर्ज वर्नर ने बिहार में व्यापार के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी के गवर्नर जनरल एवं उनकी परिषद् से फरमान की माँग की। डेनिस कंपनी भी मुख्य रूप से शोरे का व्यापार करती थी।

1801 ई. में ग्रेट ब्रिटेन एवं डेनमार्क के बीच युद्ध आरंभ हुआ, जिसके परिणामस्वरूप भारत में भी दोनों कंपनियों के बीच तनाव उत्पन्न हुए। पटना की डेनिस फैक्टरी एवं सेरामपुर की कोठी को अंग्रेजों ने जब्त कर लिया। 1802 ई. में आमियाँ की संधि हुई और भारत में डेनमार्क के स्वामित्व वाले क्षेत्रों को वापस कर दिया गया। 1845 ई. तक बिहार के सारे डेनिस माल गोदाम एवं ठिकाने अंग्रेजों के अधीन हो गए। अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी का आगमन बिहार में अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी के स्थायी माल गोदामों की स्थापना को लेकर विद्वानों में मतभेद हैं। अधिकतर इतिहासकारों का मानना है कि ईस्ट इंडिया कंपनी के स्थायी माल गोदाम की स्थापना 1691 ई. में पटना के गुलजार बाग में की गई थी। कंपनी की रुचि अमवर्ती कैलिको वस्त्र एवं कच्चे रेशम से संबंधित व्यापार में थी। इसके अतिरिक्त वे शोरा तथा अफीम को भी व्यापार का अभिन्न अंग मानते थे। पटना के समीप लखबार में कैलिको वस्त्र बड़े पैमाने पर तैयार किए जाते थे।

1664 ई. में जॉब चारनाक को पटना की अंग्रेजी फैक्टरी का प्रमुख नियुक्त किया गया, जो 1680-81 तक इस पद पर बना रहा। बिहार के सूबेदार साइस्ता खान द्वारा 1680 ई. में अंग्रेजों की कंपनी के व्यापार पर 3.5 प्रतिशत कर लगा दिए जाने के कारण जॉब चारनाक ने 1686 ई. में हुगली शहर को लूट लिया। परिणामस्वरूप साइस्ता खान ने बंगाल एवं बिहार में अंग्रेजों की समस्त संपत्ति को जब्त करने का आदेश दिया, लेकिन 1690 ई. में एक समझौते के तहत अंग्रेजों को पुनः व्यापार करने की स्वतंत्रता प्रदान की। मुगल बादशाह औरंगजेब की मृत्यु के साथ ही अंग्रेजों की व्यापारिक गतिविधियों में रुकावट आई। फर्रुखसियर के शासन काल में 1713 ई. में पटना फैक्टरी को बंद कर दिया गया, लेकिन उसने पुनः 1717 ई. में अंग्रेजों को बिहार एवं बंगाल में व्यापार करने की स्वतंत्रता प्रदान कर दी। अतः पटना फैक्टरी को अंग्रेजों ने 1718 ई. में पुनः खोल दिया। नवाब अलीवर्दी खान के दबाव के कारण पटना फैक्टरी 1750 ई. में पुनः बंद कर दी गई, लेकिन हॉलवेल ने प्रयास करके 1755 ई. में पटना फैक्टरी को पुनः शुरू कर दिया। 1757 ई. में प्लासी युद्ध एवं 1764 ई. के बक्सर युद्ध के फलस्वरूप बिहार ब्रिटिश आधिपत्य में पूर्णरूप से आ गया। बक्सर युद्ध के पश्चात् लॉर्ड क्लाइव तथा मुगल सम्राट् शाह आलम द्वितीय के बीच 12 अगस्त, 1765 को इलाहाबाद में एक संधि हुई, जिसके द्वारा कंपनी को बिहार, बंगाल एवं उड़ीसा की दीवानी प्राप्त हुई।

बिहार में अंग्रेजी शासन की स्थापना

प्रारंभ से ही बिहार व्यापारिक गतिविधियों का केंद्र रहा है। मध्यकाल में भी बिहार व्यापार का प्रमुख केंद्र था। यहाँ एडवर्ड टेरी, राल्फ फिट्ज, पीटर मुंडी, ट्रैवर आदि व्यापारियों ने बिहार का दौरा कर व्यापारिक गतिविधियों का विस्तृत वर्णन किया। बंगाल के नवाब मुर्शिद कुली खान एवं अलीवर्दी खान के शासन काल में विदेशी व्यापारिक कंपनियों ने मुख्य रूप से बिहार में व्यापारिक गतिविधियों में अपने आपको लगाए रखा और उनकी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाएँ दबी रहीं। 16 अक्तूबर, 1756 को मनिहारी के युद्ध में सिराजुद्दौला द्वारा शौकतजंग पराजित हुआ। सिराजुद्दौला को अंग्रेजों की ओर से युद्ध का खतरा था। अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारियों ने कलकत्ता में फोर्ट विलियम की किलेबंदी प्रारंभ की। इससे सिराजुद्दौला और अंग्रेजों के बीच तनाव उत्पन्न हो गया, जिसके परिणामस्वरूप 23 जून, 1757 को प्लासी का युद्ध हुआजिसमें अंग्रेज विजयी हुए। उन्होंने मीर जाफर को बंगाल का नवाब बनाया तथा उसके पुत्र मीरन को बंगाल का उप-नवाब बनाया गया, लेकिन बिहार की वास्तविक सत्ता राजा रामनारायण के हाथों में आ गई।

1760 ई. में मीर कासिम अंग्रेजों की सहायता से बंगाल का नवाब बना, लेकिन अंग्रेजों से उसका संबंध अधिक दिनों तक मधुर नहीं रह सका। मीर कासिम ने 1761 ई. में अपनी राजधानी मुर्शिदाबाद से हटाकर मुंगेर स्थानांतरित कर ली। मुंगेर की रक्षा के लिए उसने दुर्ग का निर्माण किया। बिहार के नवाब दीवान रामनारायण से भी उसके संबंध अच्छे नहीं थे। उसे अनुशासनहीनता के आरोप में मीर कासिम ने बंदी बनाना चाहा, लेकिन रामनारायण अंग्रेजों से जा मिला। मीर कासिम ने कंपनी के गवर्नर बैंसिटार्ट को पत्र लिखकर, उसे लौटाने की माँग की। बैंसिटार्ट ने रामनारायण को उसके हवाले कर दिया और उसने रामनारायण की हत्या करवा दी।

मीर कासिम ने कंपनी के कर्मचारियों द्वारा ‘दत्तक’ के दुरुपयोग पर रोक लगा दी, जिससे अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी मीर कासिम से क्रुद्ध हो गई। मीर कासिम ने अंग्रेजों के समर्थक सेठ हीराचंद एवं उसके भाई स्वरूपचंद को मुंगेर में नजरबंद कर दिया। पटना के अंग्रेज एजेंट एलिस को नगर पर आक्रमण करने का आदेश दिया गया। एलिस ने 24 जून, 1763 को पटना पर अधिकार कर लूटपाट की एवं अनेक निर्दोष लोगों की हत्या करवा दी। विवश होकर मीर कासिम ने अंग्रेज एजेंट एलिस के विरुद्ध सैनिक कार्रवाई प्रारंभ की। एलिस को बंदी बनाकर मुंगेर ले आया। पटना में मीर कासिम ने अंग्रेज अधिकारियों का कत्लेआम किया और यह घटना ‘पटना हत्याकांड’ के नाम से प्रसिद्ध हुई। इस हत्याकांड के उपरांत मीर कासिम और अंग्रेजों के बीच युद्ध अवश्यंभावी हो गया। 2 सितंबर, 1763 को बिहार के राजमहल के उदवानाला के युद्ध में मीर कासिम अंग्रेजों के हाथों पराजित हुआ। मीर कासिम अंग्रेजों के हाथ नहीं आया और 4 दिसंबर, 1763 को कर्मनाशा नदी पार कर अवध राज्य की सीमा में प्रवेश कर गया।

अंग्रेजों ने मीरजाफर को पुनः बंगाल का नवाब घोषित किया। अंग्रेजों ने पटना के कर्नलगंज और मारूफगंज की मंडियों पर अधिकार कर लिया। पूर्णिया के लकड़मंडी पर भी अंग्रेजों ने अधिकार कर लिया और नवाब को वहाँ से होनेवाली 50 हजार रुपए वार्षिक आय से वंचित कर दिया। पटना की पराजय के बाद मीर कासिम अवध के नवाब बख्शुजाउद्दौला एवं मुगल सम्राट् शाह आलम द्वितीय के साथ मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध की तैयारी करने लगा। मीर कासिम ने अवध के नवाब बख्शुजाउद्दौला एवं मुगल सम्राट् शाह आलम द्वितीय की संयुक्त सेना के साथ पटना की ओर प्रस्थान किया। अंग्रेजी सेना का प्रधान कार्नक घबरा गया। कलकत्ता काउंसिल ने हेक्टर मुनरो को सेनापति नियुक्त किया। मुनरो जुलाई, 1764 में पटना पहुँचा तथा रोहतास के किलेदार साहूमल को प्रलोभन देकर अपने पक्ष में कर लिया। मुनरो सोन नदी पार कर बक्सर पहुँचा, जहाँ 22 अक्तूबर, 1764 को भारत की तीन प्रमुख ताकतों के साथ उसका युद्ध हुआ, जिसका परिणाम अंग्रेजों के पक्ष में रहा। बक्सर की पराजय ने जहाँ मीर कासिम के भाग्य का सूर्यास्त कर दिया, वहीं बिहार पर अंग्रेजों का पूर्णरूप से अधिकार हो गया। मुगल सम्राट् ने तत्काल परिस्थिति को ध्यान में रखकर 1765 में बिहार, बंगाल और उड़ीसा की दीवानी अंग्रेजों को प्रदान कर दी।

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