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राजनैतिक मुद्दों तथा भारतीय समाज की पुनर्रचना के संबंध में गांधी और नेहरू के विचारों संबंधी अंतर्विरोध की व्याख्या करें।

राजनीतिक मुद्दों तथा भारतीय समाज की पुनर्रचना के संबंध में गांधी और नेहरू के विचारों में मूल अंतर विचारधारा पर आधारित है । जैसे –

धर्म को लेकर गांधी और नेहरू के विचारों में मूल अंतर- 

गांधीजी धर्म पारायण व्यक्ति थे जबकि नेहरू जी आगे वादी नेहरू के लिए कट्टरवादी धर्म आडंबर था जिसकी परिणिति प्रायः लोगों की मासूमियत के शोषण के रूप में होती है । परंतु उन्होंने इस बात को स्वीकार किया कि धर्म हमें वह मूल्य देते हैं जिसके द्वारा व्यक्ति की गहराई से महसूस की गई आवश्यकताओं को संतोष प्रदान किया जाता है। अतः वे एक नास्तिक और भौतिकवादी नहीं थे।

गांधीजी के लिए धर्म सिर्फ कर्मकांडओं का अनुपालन ही नहीं था। गांधी के लिए व्यक्ति का अंतिम लक्ष्य मोक्ष है। जिसे सेवा और मानवता के द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है ना कि संसार से भागकर। इसीलिए जो नास्तिक मानवता की सेवा में है वे धार्मिक लोग हैं। यही कारण था कि गांधी जी ने अपने सूक्ति-  ईश्वर सत्य है को सत्य ही ईश्वर है में बदल दिया था। ईश्वर का अर्थ यह है कि सिर्फ सत्य का उच्चतम नीतिपरक महत्व है अतः धर्म नीति के समान बन जाता है।

अहिंसा को लेकर गांधी और नेहरू के विचार 

गांधी के लिए अहिंसा सत्य की खोज या सामाजिक मतभेदों को सुलझाने की एक विधि थी । नेहरू ने अहिंसा को हर समय हर परिस्थिति में अपनाना स्वीकार नहीं किया था । उनका मत था कि यह एक ऐसी नीति है जिसके बारे में सिर्फ इसके परिणामों के आधार पर ही निर्णय लिया जा सकता है। निश्चित रूप से यह साम्राज्यवाद के खिलाफ लड़ाई के लिए सही थी क्योंकि तत्कालीन परिस्थितियां भी उसी के लायक थी। नेहरू का यह विश्वास नहीं था कि बाहरी आक्रमण के खिलाफ अहिंसा को एक हथियार के रूप में प्रयुक्त किया जा सकता है।

लेकिन गांधीजी की अहिंसा की परिकल्पना का अर्थ आक्रमणकारियों के आगे समर्पण करना नहीं था इसे तभी अपनाया जा सकता था जब लोगों का इसमें अपना पूरा विश्वास हो तथा आक्रमणकारियों के खिलाफ अहिंसक प्रतिरोध करने में अपने आप को पीड़ा पहुंचाने को तैयार रहें ।उन्होंने यह कभी नहीं सोचा कि आक्रमणकारियों के खिलाफ अहिंसक विधि अपनाने के लिए लोगों को जबरदस्ती तैयार किया जा सकता है। उन्होंने उन नागरिकों की सैन्य क्षमता को भी देखा जो अहिंसक विरोधी विरोध को तैयार नहीं थे इसीलिए युद्ध के दौरान नेहरू ने ऐसा कोई कदम नहीं उठाया जो गांधी जी के विचारों के प्रतिकूल था। नेहरू के दबाव के कारण ही गांधीजी मित्र राष्ट्रों सेनाओं को भारत की भूमि पर रहने देने को तैयार हो गए।

गांधी और नेहरू का आर्थिक विकास के ऊपर विचारधारा-

एक समाजवादी होने के नाते नेहरू जी का गांधी के न्यास के सिद्धांत में विश्वास नहीं था (न्यास अर्थात् ट्रस्टी)। नेहरू को जमीनदारी और पूंजीवाद के खात्मे के लिए राज्य की शक्ति का प्रयोग करने में कोई आपत्ति नहीं थी। उनका यह विश्वास नहीं था कि सभी जमींदार और पूंजीपति खुद ब खुद अपनी अधिशेष संपत्ति को देकर ट्रस्टी बन जाएंगे। यद्यपि गांधीजी ने संघर्ष समाप्ति के लिए बल प्रयोग के प्रति भी विश्वास व्यक्त किया है।

उन्होंने जयप्रकाश नारायण तथा नेहरू के प्रभाव में आकर शोषण रहित समाज के निर्माण में राज्य की भूमिका पर विचार भी किया है। गांधी जी और नेहरू जी दोनों ने गरीबी समाप्त करने को ध्यान में रखकर कार्य किए। गांधीजी ने गरीबी की समाप्ति कृषि तथा गांव में कुटीर उद्योग के विकास द्वारा करनी चाहिए जबकि नेहरू जी ने देश को औद्योगिक करण के माध्यम से विकास के मार्ग पर लाना चाहा।

भारी उद्योग तथा आधारभूत उद्योगों के ऊपर गांधीजी और नेहरू के विचार-

प्रधानमंत्री बनने के बाद नेहरु जी ने देश में रक्षा और औद्योगिकीकरण के लिए कृषि के महत्व को स्वीकार किया । नेहरू चाहते थे कि योजनाबद्ध तरीके से भारी उद्योगों और ग्रामीण उद्योग तथा कुटीर उद्योगों मैं संतुलित विकास का प्रयास किया जाए। उनका मानना था कि भारत में देश की संपूर्ण संगठित उद्योगों की अपेक्षा ग्रामीण एवं कुटीर उद्योगों में अधिक लोग काम करते हैं । कोई भी लोकतांत्रिक प्रणाली वाला देश इन लोगों की उपेक्षा नहीं कर सकता। अतः औद्योगिकीकरण के प्रश्न पर दोनों के बीच मतभेद कम हो गए क्योंकि दोनों ही प्रकार के उद्योगों की आवश्यकता भारत में महसूस की गई थी।

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