Home BPSC मुख्य परीक्षा GS पेपर 1 - भारत का आधुनिक इतिहास गांधी जी के राजनीतिक, सामाजिक, नैतिक और अर्थव्यवस्था संबंधी चिंतन का वर्णन...

गांधी जी के राजनीतिक, सामाजिक, नैतिक और अर्थव्यवस्था संबंधी चिंतन का वर्णन करें?

गांधीजी का विश्व राजनीतिक इतिहास में उदय दक्षिण अफ्रीका की भूमि पर हुआ परंतु वास्तविक ऊंचाई भारत के राष्ट्रीय आंदोलन से मिली और वे मानवता के सबसे बड़े पुजारी के रूप में उभरे ना केवल भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के सर्वमान्य नेतृत्व करते थे बल्कि उनका महत्व इस बात में भी है कि उन्होंने भारतीय राजनीति को अध्यात्म से जोड़ा।

गांधीवाद का अर्थ

गांधी के उच्च विचारों का संकलन ही गांधीवाद के रूप में जाना जाता है। गांधी जी ने लेखन एवं कथन में समाज और व्यक्ति को संयुक्त रूप से देखा है। गांधी कर्म में विश्वास रखते थे । उन्होंने न केवल उपदेश दिया बल्कि करके भी दिखाया उन्होंने अपनी कथनी के अनुकूल ही आचरण किया । इन्हीं कारणों से गांधीवाद अद्वितीय है।

गांधी जी के चिंतन का प्रभाव

यद्यपि गांधीजी के विचार स्वतंत्र हैं फिर भी उनके चिंतन पर कई स्रोतों का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। गांधी भगवत गीता से अत्यधिक प्रभावित है तथा इसे आध्यात्मिक संदर्भ ग्रंथ के रूप में स्वीकार करते थे ।गीता से उन्होंने नैतिकता का पाठ ग्रहण किया था तथा उन्होंने जीवन में जब जब परेशानी का अनुभव किया था तब तक इसका पाठ किया था। उन्होंने अपने जीवन में अहिंसात्मक तत्वों का समावेश बौद्ध एवं जैन धर्म के सिद्धांतों से प्रेरित होकर किया था। राष्ट्रीय आंदोलन में सत्याग्रह की तकनीक उन्होंने एचडी थारो के दर्शन से प्रभावित होकर अपनाई गांधीजी ने जान रस्किन की पुस्तक ऑन टू द लास्ट से संदेश प्राप्त किया कि व्यक्ति का कल्याण समाज के कल्याण में निहित है। उन्होंने इससे श्रम की महत्ता साधारण जीवन व्यतीत करना इत्यादि का संदेश भी प्राप्त किया टॉलस्टॉय की पुस्तक द किंगडम ऑफ गॉड विभिन्न ने गांधी को विशेष रूप से प्रभावित किया था । गांधी थी तथा टॉलस्टॉय दोनों ने शक्ति एवं शोषण पर आधारित आधुनिक सभ्यता एवं हिंसात्मक उपायों की निंदा की तथा साधनों की शुद्धता पर बल दिया।

मानव यह प्रकृति गांधीजी का विश्वास था कि प्रत्येक व्यक्ति के पास विकास के चरम सीमा तक जाने की क्षमता है। उनका मानना था कि मानवीय मूल्य ना तो पूरी तरह अच्छे होते हैं और ना ही पूरी तरह दोषपूर्ण होते हैं। तथापि इनमें ईश्वर की स्पष्ट रूप से अनुभूति के लिए मूल्य निर्धारित किए जाते हैं जो सभी व्यक्तियों के भीतर विद्यमान है। कोई भी व्यक्ति आदर्श को प्राप्त नहीं कर सकता पर उसे इसके लिए प्रयासरत हमेशा रहना चाहिए। गरीब और असहाय व्यक्ति की सहायता करना ही उनका परम धर्म था जो उनकी मानव्य प्रकृति की अवधारणा को वास्तविक रूप में प्रस्तुत करता है।

सत्य और ईश्वर

गांधीजी सत्य को ईश्वर के बराबर मानते थे। उनका मानना था कि सत्य ही ईश्वर हैं। गांधी ने साफ शब्दों में कहा था कि ईश्वर सत्य है और मैं अपने धर्म को और अच्छे ढंग से स्पष्ट करने के लिए कहूंगा कि सत्य ही ईश्वर है । वे मानते थे कि अच्छाई को प्राप्त करने के लिए करने के लिए विश्व की बुराइयों के विरुद्ध संघर्ष सत्य के लिए संघर्ष करना है। उनके लिए यह सत्य ईश्वर का प्रेम प्रकाश नैतिकता जीवन और निडरता के अतिरिक्त समस्त सृष्टि का सार है । सत्य के माध्यम से ही एक भयमुक्त समाज की स्थापना की जा सकती है।  गांधी जी के विचारों से सत्य ही सर्वोत्तम है।

अहिंसा

गांधीजी के अनुसार अहिंसा से तात्पर्य यह है कि मानव जाति का व्यापक कानून जिसके द्वारा प्राणी मात्र के प्रति हिंसा से रक्षा होती है , चाहे वह विचार हो, वाणी हो अथवा कार्य हो । अहिंसा सर्वोच्च आदर्श है जिसका सीधा सा अर्थ है क्षमा शीलता । अहिंसक संघर्ष की यही कसौटी है कि उसमें घृणा का कोई स्थान ना हो और अंततः शत्रु भी मित्र बन जाए । यह कमजोर व्यक्तियों के लिए नहीं है । अहिंसा का तात्पर्य किसी की हत्या करने या किसी भी प्रकार का नुकसान पहुंचाने की इच्छा का समूल नाश कर देना है।  अहिंसा का अर्थ है अगाध प्रेम अर्थात क्रोध एवं घृणा से पूर्ण मुक्ति और प्रेम का अर्थ है कष्ट सहने की अपार क्षमता । अहिंसा तथा सत्य एक दूसरे से इस प्रकार गूथे हुए हैं कि उन्हें अलग कर पाना संभव नहीं है । अहिंसा की सर्वोत्तम अभिव्यक्तियां- उदाहरण के लिए अस्पृश्यता का अंत, सर्वमित्रता की भावना का विकास, जनता की निस्वार्थ सेवा तथा समस्त सृष्टि के प्रति आदर रखना इत्यादि।

सत्याग्रह सिद्धांत

गांधीजी के अनुसार सत्य के लिए किए जाने वाला प्रत्येक संघर्ष सत्याग्रह है । सत्याग्रह का अर्थ ना सिर्फ असत्य का विरोध करना है बल्कि प्रेम और नैतिकता के द्वारा सत्य की प्राप्ति करना है। सत्याग्रह के 2 मूल आधार हैं अहिंसा और सत्य । सत्याग्रह का लक्ष्य है कि आत्मा की शक्ति एवं सत्य की शक्ति का विकास करना। स्वयं को कष्ट देकर विरोधी तथा बुरे व्यक्ति को कष्ट पहुंचाए बिना उसका दिल जीतना तथा क्रोध को प्रेम से और हिंसा को अहिंसा से और असत्य को सत्य से पराजित करना। सच्चा सत्याग्रही संघर्षों से कभी पीछे नहीं हटता तथा सत्याग्रह के सबल पक्ष के रूप में सविनय अवज्ञा तथा असहयोग आंदोलन का सहारा लेता है । वास्तव में यह गांधीजी का मूल अवधारणा नहीं है क्योंकि उपनिषदों में भी विश्व को सत्य पर आधारित माना गया है। सत्याग्रह का संदेश बुद्ध , महावीर,  सुकरात, ईसा मसीह आदि ने भी दिया है । परंतु इस दार्शनिक हथियार का उपयोग करके गांधीजी ने वृहद पैमाने पर बुराई और अन्याय के विरुद्ध लड़ने की एक पद्धति का विकास किया जो विश्व के कमजोर एवं पिछड़ी जातियों के लिए एक अमूल्य अस्त्र के रूप में प्रकट हुआ। 

आर्थिक संगठनों पर गांधीजी के विचार

गांधी जी ने आर्थिक प्रगति को सकारात्मक भूमिका के बारे में विचार दिया। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि अर्थव्यवस्था को न सिर्फ लाभ और प्रतिस्पर्धा पर आधारित होना चाहिए बल्कि नीतिपरक मूल्यों को भी उसमें समावेश किया जाना चाहिए। गांधीजी ने मानव श्रम की खुलकर प्रशंसा की उन्होंने श्रम को वास्तविक संपत्ति माना । जो कि धन वृद्धि करता है उन्होंने कहा कि किसी को भी बिना श्रम किए एक समय भी भोजन नहीं करना चाहिए । आजीविका कमाने वाले श्रमिकों के प्रति इस तरह की मनोवृति आर्थिक आत्मनिर्भरता का पोषण करेगी । इससे हम निर्भय होंगे तथा राष्ट्रीय चरित्र में वृद्धि होगी। गांधी जी ने संपत्ति को अस्वीकार कर दिया इसे उन्होंने ईश्वर की अनुभूति के मार्ग में बाधक समझा था।गांधीजी ने पूंजी पतियों तथा जमींदारों से न्याय सी बन जाने यानी ट्रस्टी बन जाने तथा काश्तकारों एवं श्रमिकों को उन संपत्ति में स्वामित्व के लिए अपील की थी ।स्वदेशी गांधीजी का आदर्श वाक्य था। उन्होंने इसे अपने अंदर ने एक ऐसी भावना माना जिसमें अपने इर्द-गिर्द की सेवा का भाव नहीं था एवं दूरस्थ का परित्याग किया जाना था ।गांधी ज ने जीविका कमाने वाले श्रमिकों चरखा और खादी पर जोर दिया था।

गांधीजी का सर्वोदय सिद्धांत

गांधीजी ने रस्किन की “अन टू दी लास्ट” पुस्तक के अंतोदय सिद्धांत से प्रभावित होकर समूची मानव जाति के कल्याण की भावना के लिए सर्वोदय सिद्धांत को प्रतिपादित किया। सर्वोदय एक ऐसे समाज की अवधारणा प्रस्तुत करता है जिसमें सभी मनुष्य समान हैं। यद्यपि सब मनुष्यों की क्षमताएं अलग-अलग होती हैं परंतु सभी को अवसर सामान मिलने चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति का जीवन की आवश्यकताओं में बराबर का अधिकार है यहां तक कि पशु और पक्षियों का भी। सर्वोदय से तात्पर्य है कि एक सत्ता विहीन समाज संपत्ति का स्वामी समाज सभी तनाव एवं बंधनों से मुक्ति जाति विहीन वर्ग विहीन तथा भेदभाव रहित समाज जिसमें अधिक समानता हो । सर्वोदय सिद्धांत प्रजातंत्र की व्यवहारिकता प्रणाली से हटकर समाज के नैतिक धार्मिक आध्यात्मिक राजनीतिक तथा आर्थिक पुनरुत्थान पर आधारित है।

गांधीजी का ट्रस्टीशिप सिद्धांत

गांधी जी ने संपत्ति के व्यक्तिगत संग्रह को अस्वीकार कर दिया था । उसे उन्होंने ईश्वर की अनुभूति के मार्ग में बाधक समझा था । गांधी जी ने पूंजी पतियों तथा जमींदारों से ट्रस्टी बन जाने तथा काश्तकारों एवं श्रमिकों को उन संपत्तियों में स्वामित्व देने की अपील की थी । गांधी जी का यही आध्यात्मिक स्तर पर जो सुझाव दिया गया था उसे ही ट्रस्टीशिप सिद्धांत के रूप में आज जाना जाता है । ट्रस्टीशिप का मूल आधार है संपत्ति का सामाजिकरण।‌ जिसमें पूंजीपति अपने धन के केवल उस हिस्से का ही अधिकारी बनता है जितने में उसे सम्मान पूर्वक जीवन यापन करने की जरूरत हो और इस तरह वह स्वयं को ट्रस्टी घोषित कर देता है और शेष धन व समाज के हित में उपयोग करता है ।परंतु गांधी जी ने बलपूर्वक ट्रस्टीशिप की योजना द्वारा पूंजीवाद को दबाने के विरोध में थे । उनका मानना था कि पूंजीपतियों में स्वयं ही जागृति पैदा होनी चाहिए  कि वे स्वयं ही संचित धन के मालिक नहीं है वरन उस संपत्ति के सिर्फ ट्रस्टी मात्र हैं ।

उत्पादन की तकनीक मशीनीकरण

गांधीजी उत्पादन की ऐसी प्रणालियों के पक्षधर थे जहां व्यक्ति के श्रम का पूर्ण ध्यान रखा गया हो तथा साथ ही उनका उद्देश्य देश किस समय अनुकूल परिस्थितियों के अनुरूप हो। गांधीजी मशीनीकरण के विरोधी नहीं थे बल्कि उनकी शिकायत मशीनों के प्रति सनक से था। उनका मत था कि मशीनों का प्रयोग सभी न्याय संगत तरीके से किया जाए । वे चरखा को भी एक मशीन मानते थे । उनका मानना था कि जहां बड़े पैमाने के उद्योग एवं यंत्रों के उपयोग से बेरोजगारी की समस्या बढ़ेगी और हिंसा का विस्तार होगा वही स्वदेशी चरखा को टूर और लघु ग्रामीण उद्योगों से रोजगार के अवसर सुलभ हो सकते हैं । इस प्रकार में अनावश्यक मशीनीकरण को बेरोजगारी निर्धनता तथा हिंसा का कारण मानते थे।

उद्योगों का विकेंद्रीकरण

गांधीजी एक ऐसी औद्योगिक व्यवस्था के हिमायती थे जिनमें श्रमिक स्वयं ही मालिक हो। इस प्रकार एक शोषण हीन समाज विकसित होगा जिसमें हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं होगा । उनके विचारों में औद्योगिक केंद्रीयकरण से शहरों में जनसंख्या वृद्धि होगी वातावरण प्रदूषित होगा सामाजिक तनाव बढ़ेगा और सबसे अधिक निर्धनता बढ़ेगी । इन्हीं कारणों से भी बड़े उद्योगों के स्थान पर ग्रामीण एवं कुटीर उद्योग का विकास करना चाहते थे । वे कहते थे खादी श्रम को सम्मान देती है परंतु मिलो में श्रम का शोषण होता है। 

गांधीजी और वर्ण व्यवस्था

गांधीजी ने प्राचीन वर्ण व्यवस्था को स्वीकार किया जिसमें प्रत्येक व्यक्ति अपना परंपरागत और वंशानुगत उद्यम चुने , बशर्ते व आधारभूत नैतिक सिद्धांतों के विरुद्ध ना हो,  परंतु उन्होंने वर्ण व्यवस्था पर आधारित शक्ति व उच्च स्थिति के एकाधिकार की प्रवृत्ति को पूर्णता नकार दिया था क्योंकि इससे समाज में असमानता की स्थिति उत्पन्न होती है । अतः उन्होंने ऊंच-नीच के भेदभाव को पूर्णता अस्वीकार कर दिया था। वह किसी व्यक्ति पर उसकी इच्छा के विरुद्ध उसकी आजीविका का साधन ठोकने के खिलाफ थे। वे वर्ण व्यवस्था को सभी मानवतावादी आदर्शों के साथ स्वीकार करना चाहते थे।

गांधीजी और स्वदेशी

गांधीजी के आदर्श वाक्य स्वदेशी का सीधा अर्थ है आत्मनिर्भरता । उन्होंने इसे स्वयं के अंदर निहित एक ऐसी भावना माना है जिसमें अपने आसपास की सेवा का भाव नहीं था तथा दूरस्थ का परित्याग किया जाना था।  स्वदेशी के माध्यम से गांधी जी ने लोगों में स्वराज की भावना जागृत करने का प्रयास किया जिसके अंतर्गत सभी को सच्ची स्वतंत्रता मिल सके । गांधी जी के विचारों में स्वतंत्रता का अर्थ होता है सारे बंधनों से मुक्ति जबकि स्वराज इससे पूर्णता भिन्न अर्थ रखता है । “स्वराज” वैदिक शब्द है जिसका अर्थ है आत्म संयम और स्वशासन । वास्तविक स्वराज कुछ लोगों द्वारा सत्ता प्राप्त कर लेने से नहीं बल्कि तब आएगा जब लोगों द्वारा सत्ता का दुरुपयोग होने पर लोग इसका प्रतिरोध करने की क्षमता प्राप्त कर लेंगे। गांधीजी ने आर्थिक स्तर पर स्वदेशी की व्याख्या करते हुए कहा था कि स्वदेशी वस्तुओं के प्रयोग से ही हम अपनी आत्मा निर्भरता को कायम कर सकते हैं । गांधीजी के अनुसार हमारे संसाधन सभी आवश्यकताओं के लिए काफी है किंतु किसी का लालच पूरा करने के लिए नहीं।

गांधीजी की विचारधारा का एक मूल्यांकन

गांधीजी ने संपत्ति औद्योगिकीकरण तथा राज्य की कटु आलोचना की थी । उन्होंने समाज में असमानता, राज्य द्वारा बल प्रयोग तथा पूंजी वादियों के संपूर्ण अधिकार पर विचार किया था । और मूल्य और संस्थाओं के रूप में एक विकल्प दिया था। गांधी जी ने कई ऐसे प्रश्न उठाए जो आधुनिक समाज में आज भी व्याप्त हैं । यह प्रश्न थे कि राज्य की शक्ति में वृद्धि, नौकरशाही , दमन,  हिंसा का बढ़ता प्रयोग तथा बड़ी तकनीकों के दुष्प्रभाव । गांधीजी का सबसे बड़ा योगदान था कि उन्होंने आर्थिक और राजनीतिक शक्तियों के विकेंद्रीकरण पर जोर दिया । हमारे संविधान के नीति निदेशक सिद्धांतों में गांधीजी के इन्हीं विचारों को परिपथ दिया गया गया है।

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