Homeबिहार पुलिस ट्रेनिंग भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (Prevention of Corruption Act, 1988)

[मिर्ची नोट्स] भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (Prevention of Corruption Act, 1988)

भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (Prevention of Corruption Act, 1988) भारतीय संसद द्वारा पारित केंद्रीय कानून है जो सरकारी तंत्र एवं सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में भ्रष्टाचार को कम करने के उद्देश्य से बनाया गया है। इसके महत्वपूर्ण धाराएं निम्नलिखित हैं:

धारा 1: इसका विस्तार संपूर्ण भारत पर है और यह भारत के बाहर भारत के समस्त नागरिकों पर भी लागू है ।

धारा 2: इस धारा में “लोक कर्तव्य” और “लोक सेवक” को परिभाषित किया गया है.

इस धारा के अंतर्गत, “लोक कर्तव्य” से अभिप्रेत है वह कर्तव्य जिसके निर्वहन में राज्य, जनता या समस्त समुदाय का हित है।

इस धारा के अंतर्गत, सरकार से वेतन प्राप्त करने वाला और सरकारी सेवा में कार्यरत या सरकारी विभाग, कंपनियों या सरकार के स्वामित्व या नियन्त्रण के अधीन किसी भी उपक्रम में कार्यरत किसी व्यक्ति को “लोक सेवक” के रूप में परिभाषित किया गया है.

धारा 3: विशेष न्यायालय का गठन इसमें सत्र न्यायाधीश अपर सत्र न्यायाधीश एवं सहायक सत्र न्यायाधीश स्तर के जज नियुक्त होते हैं. इनकी नियुक्ति उच्च न्यायालय की सलाह से केंद्र सरकार एवं राज्य सरकार करती है.

धारा 7: लोक सेवक अपने कर्तव्यों के वैद्य पारिश्रमिक के अलावे भिन्न पारिश्रमिक लेना दंडनीय है. लोक सेवक द्वारा अवैध साधनों के माध्यम से किसी व्यक्ति से परितोषण प्राप्त करता है. यदि कोई व्यक्ति किसी काम को करने के लिए भ्रष्ट साधनों के माध्यम से परितोषण प्राप्त करता है और कहता है कि वह लोकसेवक से काम करवा देगा, दंडनीय है.

सजा – 6 माह से 5 वर्ष तक की सजा / जुर्माना

धारा 8: लोक सेवक पर भ्रष्ट या विधि विरुद्ध साधनों द्वारा असर डालने के लिए परितोषण लेना दंडनीय है. अगर कोई व्यक्ति अपने लिए या किसी अन्य व्यक्ति के लिए जो लोकसेवक है, किसी व्यक्ति से अवैध परितोषण लेता है या प्रयास करता है, तब वह 3 वर्ष से 7 वर्ष का कारावास के साथ जुर्माना से  दंडनीय होगा.

सजा – 3 वर्ष से 7 वर्ष का कारावास/जुर्माना

धारा 9: लोक सेवक पर वैयक्तिक असर डालने के लिए परितोषण का लेना दंडनीय है.

सजा – 3 वर्ष से 7 वर्ष का कारावास/जुर्माना

धारा 10: धारा 8 या 9 में परिभाषित अपराधों को लोक सेवक द्वारा उत्प्रेरण के लिए दंड.

सजा – 6 माह से 5 वर्ष कारावास/जुर्माना

धारा 11: लोक सेवक जो ऐसे सेवक द्वारा की गई प्रक्रिया कारबार से संपृक्त व्यक्ति से प्रतिफल के बिना मूल्यवान चीज अभिप्राप्त करता है. सजा – 6 माह से 5 वर्ष कारावास/जुर्माना

धारा 12: धारा 7 या धारा 11 में परिभाषित अपराधों के दुष्प्रेरण के लिए दंड.

सजा – 3 वर्ष से 7 वर्ष का कारावास/जुर्माना

धारा 13: लोक सेवक द्वारा अपराधिक अवचार (आय से अधिक संपत्ति) दंडनीय है. आय से अधिक संपत्ति के मामले में 13(1)E के तहत FIR होगा जिसमें दंड का प्रावधान 4 वर्ष से 10 वर्ष है

धारा 17: भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम में अपराध अन्वेषण डीएसपी स्तर के नीचे के अधिकारी नहीं करेंगे. विशेष परिस्थिति में आरक्षी निरीक्षक करेंगे.

धारा 19: भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के अपराध में अभियोजन स्वीकृति लेना अनिवार्य है.

धारा 27: भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम से संबंधित मामले का अपील उच्च न्यायालय में होगा.

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