Home BPSC प्रारंभिक परीक्षा भारतीय अर्थव्यवस्था प्रतियोगिता परीक्षा में पूछे जाने वाले अति-महत्वपूर्ण शेयर बाजार की शब्दावली

प्रतियोगिता परीक्षा में पूछे जाने वाले अति-महत्वपूर्ण शेयर बाजार की शब्दावली

निफ्टी : यह नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का सूचकांक यानि इंडेक्स है | निफ्टी 50 शेयरों पर आधारित है इसलिए इसे निफ्टी फिफ्टी की नाम से भी जाना जाता है |

सेंसेक्स : यह बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज का सूचकांक है | सेंसेक्स में बीएसई के 30 अग्रणीय शेयर सम्मलित होते है |

खरीदना : इसका अर्थ है कि शेयरों को खरीदना या किसी कंपनी में स्थान प्राप्त करना।

बेचना : शेयरों से छुटकारा पाना क्योंकि आपने अपना लक्ष्य प्राप्त कर लिया है या आप हानि को कम करना चाहते हैं।(घाटे में कटौती करना चाहते हैं।)

बुल : एक बुल मार्केट, एक बाजार स्थिति है जहां निवेशक मूल्यों के बढ़ने की उम्मीद करते हैं।

बेयर : एक बेयर बाजार, एक बाजार स्थिति है जहां निवेशक मूल्यों में गिरावट की उम्मीद करते हैं।

वोलाटिलिटी : इसका अर्थ है कि एक शेयर कितनी तेजी से उठता या गिरता है।

स्टॉक: स्टॉक एक कंपनी की मूल स्वामित्व इकाई है; इसे शेयर या इक्विटी के रूप में भी जाना जाता है।

स्टॉक मार्केट: यह वह बाजार है जिसमें सार्वजनिक कंपनियों के शेयर जारी किए जाते हैं और एक्सचेंजों के माध्यम से कारोबार करते हैं।

बुल मार्केट: एक बुल मार्केट का मतलब है कि शेयर की कीमतों में वृद्धि होने की उम्मीद कर रहे हैं एक बाजार हालत है।

बीयर मार्केट: बीयर मार्केट एक स्थिति है जहां स्टॉक की कीमतें गिरने की उम्मीद है।

अस्थिरता: अस्थिरता समय के साथ एक ट्रेडिंग प्राइस सीरीज़ की भिन्नता की डिग्री है, जैसा कि रिटर्न के मानक डेविएशन द्वारा मापा जाता है। साधारणतः, सामान्य रूप से स्टॉक या मार्किट में उतार-चढ़ाव अस्थिरता के रूप में जाना जाता है।

लिक्विडिटी: लिक्विडिटी यह है कि आप कितनी आसानी से खरीद सकते हैं या एक शेयर बेच सकते हैं और इसे नकद में परिवर्तित कर सकते हैं।

आईपीओ : आईपीओ स्टॉक मार्किट का प्राथमिक चरण है | जब कोई कंपनी स्टॉक मार्किट में सूचीबद्ध होने के लिए आम जनता के लिए अपने शेयरों को पहली बार जारी करती है तो उसे आईपीओ यानि इनिसिअल पब्लिक ऑफ़रिंग कहा जाता है |

एसटीटी : सिक्योरिटीज ट्रांजेक्शन टेक्स को सारांश में एसटीटी कहते हैं। सरकार के कर नियम के अनुसार शेयर सिक्युरिटीज के प्रत्येक सौदे पर एसटीटी लागू होता है। सरकार को इस मार्ग से प्रतिदिन भारी राजस्व मिलता है। यह कर ब्रोकरों को भरना होता है हालांकि ब्रोकर इसे अपने ग्राहकों से वसूल लेते हैं। प्रत्येक कांट्रेक्ट नोट या बिल में ब्रोकरेज के साथ-साथ एसटीटी भी वसूला जाता है।

बेस्ट बाई : जो शेयर खरीदने के लिए उत्तम माने जाते हैं या जिन शेयरों का खरीदारी के लिए उत्तम भाव माना जाता है उन्हें बेस्ट बाई कहा जाता है। ये कंपनियां श्रेष्ठ हैं अथवा भविष्य में उनका भाव अपने वर्तमान भाव से बढ़ने की संभावना होती है ऐसी स्क्रिप या शेयर को बेस्ट बाई के रूप में गिना जाता है। अनेक बार एनालिस्ट विद्यमान स्थित के आधार पर किसी शेयर को बेस्ट बाई कहते हैं, उस समय उन कंपनियों का शेयर भाव बढ़ने की प्रबल संभावनाएं रहती हैं।

ब्लू चिप : शेयर बाजार की श्रेष्ठ – मजबूत कंपनियों के लिए यह शब्द उपयोग में लाया जाता है। किसी कंपनी का ब्लू चिप होने का अभिप्राय यह है कि उसके शेयर निवेशकों के लिए पसंदीदा शेयर हैं। इस प्रकार की कंपनियों में सौदे भी काफी होते हैं, उतार-चढ़ाव भी काफी होता है और उनमें निवेशकों का आकर्षण भी खूब बना रहता है।

बबल : पिछले कुछ वर्षों से यह शब्द भी संपूर्ण विश्व में चचि≤ है विशेषकर बाजार में जब कोई भी प्रकरण खुलता है तो उसे बबल बस्र्ट हुआ है ऐसा कहा जाता है। बबल अर्थात बुलबुला और बस्र्ट अर्थात फटना। जब किसी शेयर का भाव बुलबुले की तरह फूलता रहे और एक सीमा पर आने के बाद धड़ाम से गिर जाये तो इसे बुलबुला फूटना कहा जाता है।

करेक्शन : शेयर बाजार की दैनिक रिपोर्ट में इस शब्द का उपयोग होता रहता है। बाजार खूब बढ़ गया हो और एक निश्चित ऊंचाई पर पहुंचने के बाद तेजी के रूझाान के बीच जो गिरावट दर्ज की जाती है उसे बाजार में करेक्शन कहा जाता है। उदाहरण के लिए शेयर बाजार यदि निरंतर 4 दिन एकतरफा बढ़ता रहे और पांचवे दिन उसमें गिरावट आ जाये तो उसे करेक्शन के नाम से जाना जाता है। समय-समय पर इस प्रकार का करेक्शन बाजार के स्वास्थ्य के लिए अच्छा प्रतीक माना जाता है। निरंतर एकतरफा बढ़ते रहने वाला बाजार जोखिमपूर्ण हो जाता है जिसमें आगे जाकर एक साथ भारी गिरावट की संभावनाएं बढ़ जाती हैं।

कार्पोरेट एक्शन : कंपनी द्वारा जब कभी भी शेयरधारकों या बाजार से संबंधित कोई निर्णय लिया जाता है तो उसे कार्पोरेट एक्शन कहा जाता है। उदाहरण के लिए लाभांश / ब्याज का भुगतान, राइट / बोनस इश्यू, मर्जर/डिमर्जर, बाई बैक, ओपन ऑफर जैसी बातों कार्पोरेट एक्शन कही जाती हैं।

डिलिस्टिंग : आईपीओ (पब्लिक इश्यू) के बाद जिस प्रकार शेयरों की शेयर बाजार में लिस्टिंग होती है उसी प्रकार अनेक बार कंपनियां अपने शेयरों की शेयर बाजार से डिलिस्टिंग करवाती हैं। शेयर डिलिस्टि हो जाने के बाद उनके सौदे शेयर बाजार पर नहीं हो सकते। इस प्रकार डिलिस्टिंग शेयरधारकों एवं निवेशकों के हित में नहीं है। डिलिस्टिंग अलग-अलग कारणों से होती है।

केवाईसी (नो योर क्लाइंट / कस्टमर) : वर्तमान समय में केवाईसी एक जरूरत बन गया है विशेषकर बैंक एकाउंट, शेयर ब्रोकर के पास ट्रेडिंग एकाउंट या फिर डिमैट एकाउंट खुलवाते समय केवाईसी का उपयोग होता है। बेनामी तथा गैरकानूनी प्रवृत्ति का धन बाजार में प्रवेश न कर पाये इसके लिए यह नियम लागू किया गया है। नो योर क्लाइंट अर्थात आप अपने ग्राहक को जानो-पहचानो। दूसरे शब्दों में कहें तो ग्राहक वास्तव में अस्तित्व में है या नहीं, इसकी जांच करना जरूरी हो गया है। काला धन, अपराध व अंडरवल्र्ड का धन, हवाले का धन आदि बैंकिंग व शेयर बाजार के माध्यम से प्रवेश कर रहा है ऐसी शंका या भय के आधार पर सरकार ने इस पर अंकुश लगाने के लिए केवाईसी का पालन करना आवश्यक बनाया है। इससे पहले आईपीओ घोटाले के समय बोगस डिमैट और बैंक एकाउंट खुलवाने के प्रकरण प्रकाश में आये हैं, जिनमें कि वास्तव में कोई खाताधारक होता ही नहीं था और अनेक बेनामी और बोगस खाते खुल गये थे। इसके बाद सेबी ने पूंजीबाजार में केवाईसी आवश्यक करने का निर्णय लिया जो म्युच्युअल फंड के लिए भी लागू हो गया है।

स्वीट शेयर : वे शेयर जिन्हें कंपनी के कर्मचारियों या किसी अन्य को रियायती कीमत पर आवंटित किये जाते हैं ऐसे शेयरों को “स्वीट शेयर” कहा जाता है | इन शेयरों के लिए 3 वर्ष का लॉक-इन पीरियड निर्धारित होता है | यानि इन्हें तीन वर्ष से पूर्व किसी को बेचा नही जा सकता है |

तेजड़िया और मंद्डिया : यह शेयर बाजार आमतौर पर बोले जाने वाले शब्द हैं | जो व्यक्ति किसी शेयर में तेजी की संभावना को देखते हुए खरीदता है वह तेजड़िया कहलाता है | और जो व्यक्ति किसी शेयर या वस्तु की कीमत गिरने की आशंका से उस शेयर को शोर्ट या वायदा बाजार में बेचता है उसे मंद्डिया कहा जाता है |

लिस्टिंग : सार्वजनिक निर्गम में आवेदकों को शेयर आबंटित करने के बाद उन शेयरों को शेयर बाजार की ट्रेडिंग सूची पर सूचीबद्ध करवाया जाता है। इसे शेयरों की लिस्टिंग कहा जाता है।

लुढ़कना (एक ही दिन में भारी गिरावट) : शेयर बाजार का इंडेक्स सेंसेक्स या फिर निप्टी यदि एक ही दिन में काफी गिर जाये तो इसे लुढ़कना अर्थात भारी गिरावट कहा जाता है। सामान्यतः एक ही दिन में 400-500 अंकों की गिरावट बाजार के लुढ़कने या फिर इतने ही अंकों की वृद्धि बाजार के उछलने का प्रतीक माना जाता है।

प्रॉफिट बुकिंग : शेयर बाजार में यह शब्द सबसे अधिक महत्व का है, जो कि न केवल समझाने के लिए महत्वपूर्ण है बल्कि इसका अमल भी महत्वपूर्ण है। जब आप कोई शेयर 45 रू. के भाव पर लें और एक-आधे वर्ष बाद उसका भाव 85 रू. हो जाये और आप यह शेयर बेचकर नफा कर लें तो इसे प्रॉफिट बुकिंग कहा जाता है। सामान्यतः निवेशक लालच में इतना आकर्षक लाभ मिलने पर भी और अधिक बढ़ने के लालच में उन शेयरों को बेचकर प्रॉफिट बुक नहीं करते, जिससे अनेक बार फिर से भाव घट जाने पर या तो उनका नफा जाता रहता है या वे नुकसान में भी जा सकते हैं। जब तक आप 45 रू. का शेयर 85 रू. में बेचते नहीं हैं तब तक आपका वह नफा सिर्फ कागजों तक ही सीमित रहता है। वास्तव में उसे बेचकर उसकी रकम प्राप्त करने पर ही आप प्रॉफिट हासिल कर सकते हैं। निवेशकों को कौन सा शेयर किस भाव पर निकाल कर अपना प्रॉफिट बुक कर लेना चाहिए, इसकी समझा होनी जरूरी है।

पेनी स्टॉक्स : जिन शेयरों का भाव पैसों में अर्थात 10 पैसे से लेकर 90 पैसे तक या फिर 1 रूपये – 2 रूपये में बोला जाता हो उन्हें पेनी स्टॉक्स कहा जाता है। ऐसी कंपनियां बिल्कुल घटिया दर्जे की मानी जाती हैं तथा इनके शेयरों का कोई खरीदार नहीं रहता। प्रायः ऐसी कंपनियां जेड ग्रुप में रहती हैं और इन कंपनियों में अधिकांशत : सटोरियो या ऑपरेटर हिस्सा लेते हैं। अपवाद स्वरूप अनेक बार ऐसी कंपनियों में भी कोई कंपनी ऐसी होती है जो टर्नअराउंड हो सकती है।

रिकवरी : यह करेक्शन से बिल्कुल विपरीत स्थिति दर्शाती है अर्थात निरंतर घटते हुए बाजार में जब गिरावट रूक जाये और बाजार बढ़ने लगे तो इसे रिकवरी कहा जाता है। बाजार एक साथ घटता ही रहे तो इसे मंदी गिना जाता है परंतु मंदी के कुछ दिनों के बाद बाजार में सुधार हो तो उसे रिकवरी कहते हैं। जिस प्रकार किसी बीमार आदमी के स्वास्थ्य में दवा लेने के बाद कुछ सुधार हो तो उसे रिकवरी कहते हैं उसी प्रकार गिरते हुए बाजार में सुधार होने पर रिकवरी कहा जाता है।

स्टॉप लॉस : प्रॉफिट बुकिंग की तरह ही बाजार में लॉस की अर्थात घाटे की बुकिंग करनी होती है, जिसे स्टॉप लॉस कहा जाता है तथा उचित समय पर ऐसा न कर पाने पर घाटा बढ़ता जाता है। माना कि कोई शेयर 45 रू. के भाव पर लिया और उसका भाव घटकर 38 रू. रह गया तथा आगे भी उसमें घटने का ही रूझाान दिखायी दे तो निवेशकों को 38 रू. के स्तर पर शेयर बेच कर अपने घाटे को मर्यादित कर लेना चाहिए। ऐसा न करने पर घाटे की मात्रा काफी ज्यादा हो सकती है। रोज-रोज की खरीद-बिक्री के दौरान प्रॉफिट बुकिंग और स्टॉप लॉस की नीति का उपयोग प्रचुर मात्रा में होता है। स्टॉप लॉस को दूसरे शब्दों में कहें तो इसका अर्थ है कि घाटे की मर्यादा को नियंत्रित कर लेना। निवेशक इस प्रकार की खास सूचना के साथ अपना ऑर्डर भी रख सकते हैं।

सेबी : यह पूंजी बाजार – शेयर बाजार की नियामक संस्था है, जिसका पूरा नाम सिक्युरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया है। सेबी का मूलभूत उद्देश्य है पूंजी बाजार का स्वस्थ विकास एवं निवेशकों का रक्षण। सेबी का गठन संसद में पारित प्रस्तावों के अनुरूप किया गया है, जो एक स्वायत्त नियामक संस्था है। इसके नियम शेयर बाजारों, शेयर दलालों, मर्चेंट बैंकरों, म्युच्युअल फंडों, पोर्टफोलियो मैनेजरों सहित पूंजी बाजार से संबंधित अनेक मध्यस्थतों पर लागू होते हैं।

टेकओवर : जब कोई एक कंपनी दूसरी कंपनी का अधिग्रहण करती है तो इसे टेकओवर कहा जाता है। कार्पोरेट क्षेत्र में बड़ी कंपनियां अपने जैसा ही कारोबार करने वाली छोटी परंतु अच्छी कंपनियों का टेकओवर करके अपना कद बढ़ाती हैं। आपने कुछ समय पूर्व स्टील क्षेत्र की टाटा स्टील द्वारा विदेशी कंपनी कोरस के अधिग्रहण की बात सुनी होगी। अभी हाल ही में फोर्टिस हेल्थकेयर ने विदेशी कंपनी पार्कवे का मेजोरिटी हिस्सा अधिग्रहित किया है। भारती एयरटेल अफ्रीका की जेन कंपनी का अधिग्रहण करके चर्चा में रही है। कोई भी कंपनी जब दूसरी कंपनी का टेकओवर करती है तब उसका स्वामित्व या नियंत्रण अपने कब्जे में ले लेती है, जिसके कारण ये टेकओवर शेयरधारकों एवं निवेशकों के लिए संवेदनशील एवं महत्वपूर्ण हो जाते हैं। जब कोई मजबूत और समर्थ कंपनी किसी दूसरी कमजोर कंपनी का अधिग्रहण करती है तो कमजोर कंपनी के शेयरधारक खुश हो जाते हैं, जबकि अधिग्रहित करने वाली कंपनी के शेयरधारक सोचते हैं कि इससे उनकी कंपनी पर बोझा न बढ़े तो अच्छा।

एवरेजिंग डाउन : यह तब होता है जब एक निवेशक किसी गिरते हुए शेयर को खरीदता है, जिससे कि खरीदे गए मूल्य को बढ़ाया जा सके।

लाभांश : कंपनी की आय का एक भाग जो शेयरधारकों को भुगतान किया जाता है।

ब्रोकर : एक ब्रोकर वह व्यक्ति होता है जो आपकी ओर से शेयरों खरीदता या बेचता है।

एक्सचेंज : एक एक्सचेंज वह स्थान है जहां विभिन्न प्रकार के निवेश किए जाते हैं।

पोर्टफोलियो : आपके द्वारा किए गए निवेशों का एक संग्रह।

बबल ब्लास्ट : बबल ब्लास्ट अर्थात के बुलबुले के जैसा फूटना जब कोई शेयर अधिक प्राइस पर जाकर के एकदम से नीचे आ जाता है तो उस घटना को शेयर बबल ब्लास्ट के नाम से पुकारते हैं

इनसाइडर ट्रेडिंग (Insider Trading): इसका मतलब एक ऐसी सूचना से होता है जो कि एक कंपनी की कार्य प्रणाली से जुडी होती है जिसमे कम्पनी की भावी योजनाओं में बारे में जानकारी होती हैl यदि यह सूचना कंपनी के किसी उच्च अधिकारी (कंपनी के निदेशकों और उच्च स्तरीय अधिकारियों) के माध्यम से सार्वजनिक हो जाती है तो उस कंपनी के शेयरों के दाम अप्रत्याशित रूप से ऊपर या नीचे होते हैं l

तेजड़िया (Bull): तेजड़िया उस व्यक्ति को कहा जाता है जो कि शेयर बाजार में शेयरों की खरीदारी करता है और इसी खरीदारी के कारण शेयर बाजार ऊपर की ओर जाता हैl यह निवेशक बाजार के बारे में सकारात्मक रुख रखता है क्योंकि वह यह सोचता है कि उसके द्वारा खरीदे गए शेयरों का दाम ऊपर चढ़ेंगेl

मंदड़िया(Bear): मंदड़िया उस निवेशक को कहा जाता है जो कि अपने खरीदे गए शेयरों को बेचता क्योंकि उसको लगता है कि उसके द्वारा खरीदे गए शेयरों का दाम बाजार में गिरेंगेl इसलिए वह अपने शेयरों को बेच देता है और कई लोगों के द्वारा ऐसा करने पर बाजार नीचे की ओर गिरता है l

लाभांश (Dividend): यह कंपनी द्वारा अपने शेयर धारकों को दिया जाने वाला लाभ का हिस्सा होता हैl लाभ का यह हिस्सा कंपनी अपने सभी शेयर धारकों को उनके शेयरों की संख्या के अनुपात में बांटती हैl जिसके पास जितने अधिक शेयर, उसको उतना अधिक लाभांश मिलता हैl

Multibagger: जब भी कोई शेयर बहुत ही अच्छा लाभ कमा कर देता है और वह शेयर पैसे को बहुत गुना कर देता है तो उस लाभ को Multibagger Return कहते है।(Share Market Terminology In Hindi)

ब्रोकर (Broker): ब्रोकर Buyers और Sellers को मिलाने का काम करता है Broker के Platform का उपयोग करके खरीदने वाला स्टॉक्स खरीद पाता है और बेचने वाला स्टॉक्स को बेच पाता है।

स्टॉक एक्सचेंज (Stock Exchange): स्टॉक एक्सचेंज वह जगह है जहां सभी कंपनिया Listed होती है सभी स्टॉक ब्रोकर Stock Exchange के Member होते है।

डीमेट अकाउंट (Demat Account): ख़रीदे हुये Shares को रखने के लिए Demate Account जरूरी होता है डीमेट अकाउंट को किसी ब्रोकर के पास Open कराया जाता है।

NSE (National Stock Exchange): NSE भारत का सबसे बड़ा स्टॉक एक्सचेंज है जहां पर कंपनिया लिस्टेड है।

ट्रेडिंग (Trading): कम समय के अंतराल में Shares को Buy ओर Sell करना Trading कहलाता है ट्रेडिंग आम तोर पर वह लोग करते है जो जल्दी पैसा कमाने की सोच रखते है।

Scalping Trading: किसी शेयर को खरीद कर कुछ सेकेंड्स से लेकर कुछ मिनट तक रखकर बेच देना Scalping Trading कहलाता है।

Intraday Trading: किसी शेयर को खरीद कर एक दिन के अंदर या मार्किट बंद होने से पहले बेच देना इंट्राडे ट्रेडिंग कहते है।

BTST (Buy Today Sell Tomorrow) Trading: किसी शेयर को आज खरीद कर कल बेच देना BTST कहलाता है।

Swing Trading: किसी शेयर को आज खरीद कर एक हफ्ते से लेकर एक महीना या दो महीने के अंदर बेच देना स्विंग ट्रेडिंग कहते है।

Positional Trading: Position Trading में किसी Share को कुछ महीनो से लेकर 1 साल के अंदर बेच दिया जाता है जिसे Positional Trading कहते है।

Mutual Fund: म्यूच्यूअल फण्ड एक ऐसा फंड है जिसमे बहुत सारे लोग थोड़ा – थोड़ा कर पैसा डालते है और एक Expert जिसे बाजार की समझ हो उस पैसे को शेयर बाजार में निवेश करता है

Share Market: शेयर मार्किट वह मार्किट है जहां कंपनिया अपने शेयर्स बेच कर पैसा उठाती है जहां कंपनियों के शेयर्स को ख़रीदा और बेचा जाता है

Stock Market: जब हम शेयर मार्किट की बात कर रहे हो तो हम सिर्फ Equity की बात कर रहे होते है बल्कि स्टॉक मार्केट में Bonds, Debenture, Mutual Fund, Forex, Commodity, Derivatives, Shares सभी शामिल होते है।

Forex Market: Forex Market वह मार्किट है जहां Currency जैसे: रुपये, डॉलर, पॉन्ड, यूरो को ख़रीदा और बेचा जाता है।

Commodity Market: Commodity मार्किट वह मारकेट है जहा कमोडिटी जैसे: Gold, Silver, Crudeoil इत्यादि को ख़रीदा और बेचा जाता है

Market Cap: किसी कंपनी की कुल कीमत को Market Cap कहते है इसकी Calculation शेयर की Price में Total Number of Share की गुणा करके निकाली जाती है

Large Cap/Blue Chip: भारतीय शेयर बाजार की 100 सबसे बड़ी Companies को Largecap या Blue चिप कंपनी कहते है। जिन Companies का Market Cap 20000 करोड़ से ज्यादा होता है वह Largecap कंपनी होती है।

Mid Cap: भारतीय शेयर बाजार की 101 नंबर की company से लेकर 500 नंबर तक की कम्पनी को मिडकैप कम्पनी कहते है। जिन Companies का Market Cap 5000 करोड़ से 20000 करोड़ के बीच में होता है वह Midcap कंपनी होती है।

Small Cap: भारतीय शेयर बाजार की 501 नंबर की company से लेकर आगे तक की सभी कम्पनी को Small Cap या Micro Cap कम्पनी कहते है। जिन Companies का Market Cap 5000 करोड़ से कम होता है वह Smallcap या Microcap कंपनी होती है।

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