Home वैकल्पिक विषय समाजशास्त्र ग्रामीण समाजशास्त्र की उत्पत्ति

ग्रामीण समाजशास्त्र की उत्पत्ति

19वीं शताब्दी के अंत में और बीसवीं शताब्दी के आरंभ में अमेरिका में औद्योगिकीकरण और नगरीकरण की प्रक्रिया ने ग्रामीण समस्याओं को जन्म दिया इसमें अनेक समस्याओं को उत्पन्न किया जिसमें थे भूमि की कमी भूमि की उपजाऊ शक्ति की कमी, छिपी बेरोजगारी, गरीबी श्रमिकों की गतिशीलता में वृद्धि, खाद्य की समस्या, प्रवास की समस्या इत्यादि। नगरों में प्रवास से भी ग्रामों में कई सामाजिक समस्याएं उत्पन्न हुई। नगरीकरण ने ग्रामीण और नगरीय जीवन में अलगाव पैदा किया और भेदभाव की समस्या को बढ़ा दिया।

इन बढ़ती हुई समस्याओं ने अमेरिकी विद्वानों और विश्वविद्यालयों के विद्वानों का ध्यान अपनी और आकर्षित किया।ग्रामीण समाजशास्त्र की प्रथम पुस्तक 1913 में प्रकाशित हुई जिसका नाम था रचनात्मक ग्रामीण समाजशास्त्र जिसके लेखक थे नॉर्थ डकोटा विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जॉन मारिस जिनेट। इसके बाद अनेक विश्वविद्यालयों के विद्वानों ने ग्रामीण समस्याओं एवं ग्रामीण समाज पर अपने ढंग से अध्ययन किया जिसमें मुख्य शिकागो विश्वविद्यालय के चार्ल्स हेंडरसन, कोलंबिया विश्वविद्यालय के गिड्डिंग्स, हावर्ड विश्वविद्यालय के टॉमस कार्बर आदि थे। 1894-95 से शिकागो विश्वविद्यालय में एक नए विषय की शुरुआत की गई जिसका नाम था “अमेरिकी ग्रामीण जीवन की सामाजिक स्थिति”।

भारत में ग्रामीण समाजशास्त्र भी बेहद महत्वपूर्ण विषय है क्योंकि भारत गांव का ही देश है। संपूर्ण भारतीय जीवन पर किसी न किसी रूप में ग्रामीण संस्कृति के प्रभाव को देखा जाता है। देश की मुख्य समस्याएं सीधे गांव से जुड़ी होती हैं। सर्वप्रथम ईस्ट इंडिया कंपनी के द्वारा ग्रामीण समाज के अध्ययन की बात कही जाती है। इसका उद्देश्य अंग्रेजी शासकों की नींव को शक्तिशाली बनाना था। पुनर्जागरण युग के प्रभाव स्वरूप भी गांव का अध्ययन किया जाने लगा। विशेष करके जाति का अध्ययन ग्रामीण क्षेत्र में किया गया। 1832 में कार्यकारी गवर्नर जनरल सर चार्ल्स मेटकॉफ ने अपनी रिपोर्ट में लिखा था कि गांव समुदाय छोटे-छोटे गणतंत्र है इनके पास वह सब कुछ है जो वे चाहते हैं तथा प्रत्येक प्रकार के बाह्य संबंधों से लगभग युक्त हैं।ऐसा प्रतीत होता है जहां कोई भी तेज टिकने वाली नहीं होती है वह वहां भी टिके हुए हैं। राजाओं के वंश गिरते जाते हैं, एक क्रांति के बाद दूसरी क्रांति होती है, किंतु इन ग्रामीण समुदायों में से प्रत्येक ने स्वयं अपने में एक पृथक राज्य के रूप में, अनेक क्रांतियों व परिवर्तनों को सहते हुए भारत की जनता को जिंदा रखने में सबसे अधिक योगदान दिया है। भारत की खुशी, स्वाधीनता और स्वतंत्रता में ये सहायक हैं।

बी एच बंडेल पावेल ने अपनी पुस्तक “भारतीय ग्रामीण समुदाय” और “भारत में ग्रामीण समुदायों की उत्पत्ति और विकास” पुस्तक लिखी है जिसमें वे ग्रामीण जीवन की चर्चा करते हैं। 1899 में स्टेवेन्स‌ मूर की पुस्तक “गया के छोटे खेती हरो और मजदूरों की भौतिक दशाओं पर रिपोर्ट 1898” प्रकाशित हुई थी। इसके बाद अनेक पुस्तकें ग्रामीण समाजशास्त्र पर लिखी गई जैसे कि-

*रिजले द्वारा भारत के व्यक्ति1908
*जॉर्ज ब्रिग्स द्वारा रचित चमार लोग 1920
*जॉर्ज ग्रियर्सन द्वारा बिहार का कृषक जीवन 1920
*रसेल द्वारा भारत के मध्य प्रांत की जातियां और आदिम जातियां 1916
*हेराल्ड द्वारा रचित एक दक्षिणी गांव में भूमि और श्रम 1917
*एडगर थर्सटन द्वारा रचित दक्षिण भारत की जातियां और आदिम जातियां 1909
*जी.एस. घूरिये द्वारा रचित भारत में जाति और वर्ग 1952
*रामकृष्ण मुखर्जी द्वारा रचित ग्रामीण समाज की गत्यात्मकता 1957
*एस.सी. दुबे द्वारा रचित भारतीय गांव 1955
*लेविस ऑस्कर द्वारा रचित उत्तर भारत का ग्रामीण जीवन 1958

भारत में समाजशास्त्र के अंतर्गत ग्रामीण समाजशास्त्र को बेहद महत्व दिया जाता है और आज भी ग्रामीण क्षेत्रों के विकास के लिए ग्रामीण जीवन पर अध्ययन जारी है।

Ananya Swaraj,
Assistant Professor, sociology

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