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समाजशास्त्र में सामाजिक व्यवस्था (Social Systems in Sociology)

पैरेट ने समाज के विभिन्न अंगों के बीच पाई जाने वाली अंतः क्रिया को सामाजिक व्यवस्था के नाम से संबोधित किया है। वेबर और पारसन्स ने सामाजिक व्यवस्था का तात्पर्य एक ऐसे संतुलन से किया है जिसका निर्माण विभिन्न सामाजिक इकाइयों की परस्पर संबंधित क्रियाओं से होता है।

साधारण शब्दों में कहा जा सकता है कि सामाजिक व्यवस्था एक ऐसी दशा है जिसका निर्माण करने वाली विभिन्न इकाइयां एक दूसरे से संबद्ध रहकर एक विशेष प्रतिमान का निर्माण करती हैं तथा उसकी क्रियाशीलता को बनाए रखती हैं। जिस प्रकार शरीर के विभिन्न अंगों द्वारा एक दूसरे से संबद्ध रह कर शरीर का निर्माण करते हैं एवं शारीरिक संरचना को क्रियाशील बनाए रखते हैं उसी तरह से समाज का निर्माण सामाजिक व्यवस्था के विभिन्न अंगों द्वारा होता है।

एम.ई. जोन्स के अनुसार सामाजिक व्यवस्था वह दशा है जिसके अंतर्गत समाज के विभिन्न अंग एक दूसरे से तथा संपूर्ण समाज के साथ अर्थपूर्ण ढंग से संबंधित रहकर कार्य करते हैं। (Jones basic sociological principles, p.210)

टालकॉट पारसन्स के अनुसार “एक विशेष सामाजिक परिस्थिति में जब अनेक कर्ता सामान्य रूप से स्वीकृत सांस्कृतिक प्रतीकों के अंतर्गत अपने आदर्श लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए अंतक्रिया कर रहे होते हैं तब इस दशा को हम सामाजिक व्यवस्था कहते हैं।” (Talcott Parsons, The Social System, p.p.5-6)

सामाजिक व्यवस्था की विशेषताएं:
1.यह एक अंतर क्रियाओं की व्यवस्था है।
2.इसमें आदर्श लक्ष्यों का समावेश होता है।
3.इसमें गतिशीलता होती है।
4.यह सांस्कृतिक व्यवस्था से संबंधित है।
5.यह सामाजिक एकीकरण का साधन है।

Ananya Swaraj,
Assistant Professor, Sociology.

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