Home BPSC मुख्य परीक्षा GS पेपर 2 - भारतीय राजव्यवस्था किसानों के पास विरोध का संवैधानिक अधिकार

किसानों के पास विरोध का संवैधानिक अधिकार

हाल ही में तीन कृषि बिलों के मामले में सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि किसानों के पास इस मामले पर विरोध का संवैधानिक अधिकार है, जब तक कि वे किसी प्रकार की जानमाल को क्षति ना पहुंचाएं.

भारतीय संविधान में विरोध का अधिकार

भारतीय संविधान के भाग 3 में नागरिकों को कुल 6 प्रकार के मूल अधिकार दिए गए हैं जिनमें अनुच्छेद 19 के अंतर्गत भारतीय नागरिकों को वाक् एवं अभिव्यक्ति की आजादी प्रदान की गई है. इसी वाक् एवं अभिव्यक्ति की आजादी के अंतर्गत भारतीय संविधान में शांतिपूर्ण एवं अहिंसक तरीके से प्रदर्शन एवं विरोध करने का अधिकार (अनुच्छेद 19) प्रदान किया गया है. ध्यान रहे कि हड़ताल का अधिकार इसके अंतर्गत नहीं आता है. हालांकि राज्य की एकता और अखंडता, सुरक्षा एवं संप्रभुता का खतरा होने पर राज्य प्रदर्शन एवं विरोध के अधिकार पर उचित प्रतिबंध भी लगा सकता है.

ध्यान दें कि अनुच्छेद 15, 16, 19, 29 एवं 30 के अंतर्गत मूल अधिकार केवल भारतीय नागरिकों को प्राप्त है, विदेशियों को नहीं. जबकि शेष सभी मूल अधिकार भारतीय नागरिकों के साथ-साथ विदेशियों को भी प्राप्त है.

प्रदर्शनकारी किसानों को हटाने की मांग के लिए याचिका की प्रमुख बातें

  • किसान दूसरों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं कर सकते
  • आंदोलन के चलते दिल्ली को तीन राज्यों से जोड़ने वाली हाईवे पूरी तरह से जाम हैं, जिससे यातायात, आवागमन, व्यापार, एम्बुलेंस व मेडिकल इमरजेंसी जैसे आपातकालीन सेवाओं के लिए आम लोगों बहुत दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है.
  • आंदोलन में कोविड-19 सोशल डिस्टेंसिंग के मानकों का भी पालन नहीं किया जा रहा है. आंदोलन में शामिल लोग ना मास्क पहने हुए हैं और ना ही सोशल डिस्टेंसिंग के नियमों का पालन कर रहे हैं. यही लोग फिर अपने गांवों में जाएंगे तो कोरोना फैलने का खतरा और बढ़ जाएगा.

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

देश के शीर्ष अदालत ने कहा है कि विरोध करना एक संवैधानिक अधिकार है, इसलिए किसानों को तब तक प्रदर्शन का अधिकार है जब तक कि किसी जानमाल और संपत्ति के नुकसान का खतरा न हो.  हालांकि किसानों को भी समझना चाहिए कि इस आंदोलन से आम नागरिकों को भी कोई दिक्कत या परेशानी का सामना ना करना पड़े. कोर्ट ने कहा कि केवल रास्ता जाम करने और धरने पर बैठ जाने से समाधान नहीं निकलेगा बल्कि आपस में बातचीत करने से मामले का हल निकलेगा. केंद्र और किसानों को बात करनी होगी. एक निष्पक्ष और स्वतंत्र समिति के बारे में सोच सकते हैं, जिसके सामने दोनों पक्ष अपनी बात रख सकते हैं.

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