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सुधार के संकेत (हिन्दुस्तान)

करीब 20 दिनों के भारी तनाव के बाद चीन की मनमानी में आई नरमी खुशी का मौका न सही, एक बेहतर संकेत तो है ही। गलवान में विवादित जगह से अपना अस्थाई तंबू लेकर करीब एक किलोमीटर या ज्यादा पीछे जाने की चीनी पहल एक ऐसा समाचार है, जिसका इंतजार भारत ही नहीं, दुनिया को था। यह स्वीकार करने में कोई हर्ज नहीं कि भारत की ओर से डाले गए चौतरफा दबाव की वजह से चीन ने कुछ नरमी दिखाई है, पर इस एक नरमी की वजह से अभिभूत नहीं होना चाहिए। समाधान के लिए अनेक दौर की सैन्य स्तरीय वार्ता के बाद हमारे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार को भी आगे आना पड़ा है। अब चीन की ओर से कोशिश दिख रही है कि हालात को और बिगड़ने से रोका जाए। हालांकि अभी विवाद का समाधान नहीं हुआ है और चीन की यह कार्यवाही दुनिया को दिखाने के लिए भी हो सकती है। अब तनाव वाली जगह से वह पीछे जाएगा और उसे ऐसा करना ही चाहिए, क्योंकि भारत अब इस स्थिति में नहीं है कि किसी देश की नाजायज मनमानी पचा जाए। भारत सरकार ने एकाधिक कदम चीन को यह संकेत देने के लिए उठाए थे कि अगर वह पीछे नहीं हटा, तो मजबूरन उसके खिलाफ फैसलों का सिलसिला चल पड़ेगा। भारत से मिले शुरुआती संकेतों को चीन यदि समझ गया है, तो यह जरूर खुशखबरी हो सकती है। 
विशेषज्ञ मानते हैं कि चीन केवल अपने आर्थिक हितों को लेकर चिंतित है। उसे 1962 से पहले या उसके बाद भी भारत की ज्यादा परवाह कभी नहीं रही है और वह अपनी भारत संबंधी नीतियों या मंशा का इजहार पाकिस्तान के साथ दोस्ती निभाते हुए सतत करता रहा है। भारत में जब 59 एप पर पाबंदी लगी, जब अनेक ठेके रद्द हो गए, तब शायद चीन जागा है, हालांकि इसमें रूस की भी भूमिका बताई जा रही है। बहरहाल, भारत को अपने रुख का इजहार आर्थिक मोर्चे पर संकेत देते हुए करते रहना चाहिए। वह भारत में विभिन्न उत्पादों का सबसे बड़ा निर्यातक है। भारत के साथ उसका कारोबार उसके लिए बहुत फायदेमंद रहा है। चीन के लिए हमारे निर्यात की तुलना में भारत के लिए चीन का जो निर्यात रहा है, उसमें चीन को 60 अरब डॉलर से ज्यादा की बढ़त हासिल है। भारत में चीनी निर्यात में स्मार्टफोन, विद्युत उपकरण, पावर प्लांट उपकरण, उर्वरक, ऑटो पाट्र्स, तैयार स्टील उत्पाद, बिजली संयंत्रों के सामान, दूरसंचार उपकरण, मेट्रो रेल कोच, दवा सामग्री, रसायन, प्लास्टिक, इंजीनिर्यंरग के सामान शामिल हैं। भारत से संबंध बिगड़ने से चीन में 20 से ज्यादा उद्योगों पर सीधी चोट पडे़गी। मंदी से जूझ रहा चीन वाम-प्रेरित मनमानी के नशे के बावजूद अपने आर्थिक हित की चिंता जरूर करेगा। 
अब गलवान से यदि वह स्थाई तौर पर पीछे हटा है, तो भी हमें अपनी स्वाभाविक उदारता दिखाने की जल्दी नहीं करनी चाहिए। भूटान की जमीन पर भी उसका दावा चर्चा में है। चीन की नजर भूटान के सकटेंग इलाके पर है, जहां भूटान वन्यजीव अभयारण्य बनाना चाहता है। चीन ने तीसरे पक्ष (भारत) को भी चेतावनी देते हुए इस क्षेत्र को विवादित बताया है। सचेत रहना चाहिए, कोई साम्राज्यवादी पड़ोसी किसी इलाके को विवादित करार दे, तो इसका मतलब यह कतई नहीं कि हम या भूटान अपने-अपने इलाके को छोड़ दें। यह निर्णायक समय है। हमारी सुविचारित और संयमित दृढ़ता ही हमारा मार्ग प्रशस्त करेगी।

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