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सुधार की ओर  (हिन्दुस्तान)


समय के अनुरूप शिक्षा नीति का बदलना जितना स्वाभाविक है, उतना ही आवश्यक भी। 34 साल बाद नई शिक्षा नीति का आना लगभग तय था, इसकी चर्चा तो दशक भर से चल रही थी, लेकिन समय के अनुरूप सबकी मंजूरी के साथ एक नीति तय करना आसान नहीं होता। अब जो नीतिगत बदलाव हो रहे हैं, उनका सबसे बड़ा पहलू यह है कि इससे शिक्षा की गुणवत्ता और उपयोगिता, दोनों को ही बल मिलेगा। स्कूली स्तर पर ही छात्रों को किसी न किसी कार्य कौशल से जोड़ दिया जाएगा। इसका अर्थ है, जब बच्चा स्कूल से पढ़कर निकलेगा, तो उसके पास एक ऐसा हुनर होगा, जिसका वह आगे की जिंदगी में इस्तेमाल कर सकेगा। इससे शिक्षा को एक व्यावसायिक बल भी मिलेगा। ऐसे करोड़ों मां-बाप होंगे, जो खुश होंगे कि उनका बच्चा स्कूल में न केवल पढ़ेगा, बल्कि कोई काम भी सीखेगा। नई शिक्षा नीति को अंतिम रूप देने के लिए बनाई गई समिति का नेतृत्व कर रहे डॉ कस्तूरीरंगन ने सही कहा है कि नई शिक्षा नीति बेरोजगार तैयार नहीं करेगी। 
दूसरी बड़ी पहल यह हुई कि स्कूल शिक्षा को विभिन्न चरणों में बांट दिया गया है। यहां सर्वाधिक फायदा फाउंडेशन स्टेज पर होगा। भारत में उन बच्चों की एक बड़ी संख्या रही है, जो सीधे पहली कक्षा में दाखिला लेते रहे हैं। सरकारी विद्यालयों में नर्सरी या प्री-स्कूल या स्कूल पूर्व शिक्षा की जरूरत को नहीं माना जा रहा था। निजी क्षेत्र में प्री-स्कूल शिक्षा का विगत तीन दशकों में बहुत विकास हुआ है, जिससे सरकारी स्कूलों का आकर्षण भी घटा है। ज्यादातर निजी स्कूल सीधे पहली कक्षा में किसी बच्चे को प्रवेश नहीं देते हैं, लेकिन अब देश के सभी स्कूलों को प्री स्कूल शिक्षा का आदर करना पड़ेगा। यह बच्चों के ज्ञान-स्तर व पढ़ाई की एकरूपता के लिए जरूरी है। यह एक प्रमाण है कि शिक्षा में निजी क्षेत्र किस तरह से सरकारी शिक्षा को प्रभावित और संवद्र्धित करता है। प्री-स्कूल के लिए आंगनबाड़ी व्यवस्था का उपयोग यथोचित है। यह समय बुनियादी पढ़ाई में एकरूपता लाने की दिशा में कारगर हो सकता है। अब प्री-स्कूल के तीन वर्ष और सामान्य स्कूल के शुरुआती दो वर्ष अर्थात कुल पांच वर्ष के लिए नया पाठ्यक्रम बनाया जाएगा। यहां सरकार को तय करना होगा कि देश के सभी स्कूलों में यह पांच वर्षीय पाठ्यक्रम लागू हो जाए, ताकि बच्चों का समतापूर्ण शैक्षणिक विकास हो। नई शिक्षा नीति को यदि किसी ऊंचे मुकाम पर ले जाना है, तो बुनियादी अर्थात फाउंडेशन स्टेज पर ही शिक्षा की गुणवत्ता के लिए प्रयास करने पड़ेंगे। 
10+2 और एफफिल की विदाई हो गई है। मोटे तौर पर एक्टिविटी आधारित शिक्षण पर ध्यान रहेगा। प्रयोगों के जरिए बच्चों को विज्ञान, गणित, कला आदि की पढ़ाई कराई जाएगी। कक्षा छह से पढ़ाई विषय आधारित होने लगेगी और कक्षा छह से ही कौशल विकास कोर्स भी शुरू हो जाएंगे। कक्षा नौ से 12 की पढ़ाई दो चरण में होगी, जिनमें विषयों का गहन अध्ययन कराया जाएगा। विषय चुनने की आजादी भी होगी। परीक्षा और प्रदर्शन का आकलन भी बदलने वाला है, इस मोर्चे पर केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय और राज्यों के शिक्षा मंत्रालयों को ज्यादा सावधानी से काम करना होगा। बोर्ड की परीक्षा का तनाव घटे, लेकिन पढ़ाई की गुणवत्ता नहीं घटनी चाहिए। नई नीति को साकार करने के लिए शिक्षकों और शिक्षा प्रबंधन की गुणवत्ता भी सुधारनी पड़ेगी।

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