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सीमा पर समाधान का समय (हिन्दुस्तान)

अपनी युवावस्था में मैंने मैकमोहन रेखा पर लंबी दूरी के गश्ती दल का नेतृत्व किया है। एक बार हमारे दल को खांगला जाना था। हमें देर हो गई और शाम गहराने लगी थी, लेकिन हमें अपना काम पूरा करना था। गश्ती के दौरान भटककर हम सीमा के उस पार करीब एक किलोमीटर तक चले गए थे। हमने अपने दल को दो टीमों में बांटा और चीनी सैनिकों की नजर में आए बिना हम अगली सुबह खांगला पहुंच गए। एक युवा अधिकारी के रूप में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) से यह मेरा पहला परिचय था। बाद में मैंने अरुणाचल प्रदेश में एलएसी डिवीजन और उसके बाद लद्दाख में 14वीं कोर की कमान संभाली। मैं कई बार गलवान घाटी से गुजर चुका हूं। यहां की पर्वत शृंखलाओं पर सीमा-रेखाएं एक भूलभुलैया हैं। यहां न कोई सीमा-रेखा है और न सीमा के करीब कोई पोस्ट। अभी पूर्वी लद्दाख में भारत और चीन की जो सीमा-रेखा, यानी एलएसी है, वह 1962 की खूनी जंग का नतीजा है। यह युद्ध दोनों देशों के बीच में यहीं सबसे ऊबड़-खाबड़ और असह्य इलाके में लड़ा गया था। लड़ाई अक्तूबर-नवंबर में दौलत बेग ओल्डी (डीबीओ), गलवान और हॉट स्प्रिंग्स, पैंगोंग झील के आर-पार, रजांगला और डेमचोक इलाकों में हुई थी। अत्यधिक कम तापमान और जान-माल की व्यापक क्षति के कारण उस युद्ध को रोक दिया गया था और चीन के सैनिक अपने ठिकानों पर वापस चले गए थे। इसी तरह, भारतीय सेना भी पास के ठिकानों पर लौट आई थी। तब से राजनीतिक तौर पर औपचारिक सीमांकन न हो पाने की वजह से दोनों देशों की सेनाएं यहां डटी हुई हैं। दोनों के बीच में सीमा-बंटवारे को लेकर 22 बार बातचीत हो चुकी है, पर नतीजा अब तक सिफर रहा है। भारत पूरे अक्साई चिन पर अपना दावा जारी रखे हुए है, तो चीन सीमा के पास वाले क्षेत्रों पर अपना दावा करता है, जिसे भारत ‘चीनी धारणा’ वाली सीमा रेखा कहता है।
दरअसल, अंग्रेजों ने इन सीमाओं को तय किए बिना छोड़ दिया था। उसके नक्शे में कई सीमाएं दिखाई देती हैं, जिनमें से एक कुन-लुन पहाड़ों के साथ चल रही है, जिसे जॉनसन-अर्दग रेखा कहा जाता है। इसके मुताबिक, अक्साई चिन जम्मू-कश्मीर का हिस्सा है।  एक अन्य रेखा, जो काराकोरम रेंज के करीब है, उसे मैकार्टनी-मैकडोनाल्ड रेखा कहा जाता है। एक रेखा सुदूर पश्चिम में है, जो फॉरेन ऑफिस रेखा है। आजादी के बाद इसे तय करने का काम जम्मू और कश्मीर के शासकों, तिब्बत और भारत व चीन के हुक्मरानों पर       छोड़ दिया गया था। मगर अब तक इसमें सफलता नहीं मिल सकी है। 
भारत ने अपना नक्शा 1954 में ही जारी कर दिया था, जिसमें अंतरराष्ट्रीय रेखा बताती है कि अक्साई चिन भारत का हिस्सा है। फिर भी, चीन ने 1955 में यहां से गुजरता हुआ पश्चिमी राजमार्ग बनाया, जो तिब्बत को काशगढ़ और शिनजियांग से जोड़ता है। जैसा कि भारत का दावा है, चीनियों ने इस संवेदनशील राजमार्ग के पश्चिमी हिस्से को सुरक्षित रखने की सोची होगी। चिप-चाप नदी और गलवान नदी के जलक्षेत्रों के बीच काराकोरम रेंज के साथ चलने वाली रिज लाइनों पर प्रभावी होने से चीन की यह मंशा बखूबी पूरी हो सकती थी, और उसके बाद चांग-चेनमो रेंज के पश्चिम में रिज लाइनों के साथ दक्षिण-पूर्व में आगे बढ़ना उसके मुफीद होता। इन इलाकों को अपने कब्जे में रखने की कोशिश चीन इसलिए करता है, ताकि भारतीय सुरक्षा बलों को पश्चिमी राजमार्ग से दूर रखा जा सके। यहां आर्टिलरी और निगरानी का दायरा बढ़ाना बताता है कि वह अपनी रेखा को आगे बढ़ाकर पश्चिम की तरफ ले जाना चाहता है। मगर भारतीय सेना चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी द्वारा वास्तविक नियंत्रण रेखा में किए जाने वाले किसी भी बदलाव को रोकने के लिए संकल्पित है। उल्लेखनीय है कि एलएसी का पहली बार इस्तेमाल खुद चीन के प्रधानमंत्री चाउ एन-लाई ने साल 1959 में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को लिखे पत्र में किया था।
आज, पूर्वी लद्दाख में 800 किलोमीटर से अधिक सीमा-रेखा है, जिसमें लगभग 550 किलोमीटर वास्तविक नियंत्रण रेखा है। चीनी गश्ती दल यह सुनिश्चित करते हैं कि वे दर्रे को बंद और जलग्रहण क्षेत्र को अपने कब्जे में रखें, ताकि भारतीय सैनिक जमीन पर और आगे न बढ़ सकें। वे ऐसे ट्रैक बनाते रहते हैं, जो आमतौर पर पश्चिमी राजमार्ग से निकलते हैं और उत्तरोत्तर एलएसी की ओर बढ़ते हैं, ताकि वे दर्रे या क्रॉसिंग प्वॉइंट पर हावी हो सकें। हॉट स्प्रिंग्स और गलवान में दोनों तरफ सड़कें व ट्रैक बनाए गए हैं। चीन को इस इलाके का ज्यादा फायदा मिलता है, क्योंकि उसकी तरफ यह अपेक्षाकृत खुला व समतल है और अपने पश्चिमी राजमार्ग की सुविधा भी उसे हासिल है।
एलएसी को लेकर न तो कोई सर्वे हुआ है और न ही जमीन पर सीमांकन। यह नक्शे पर मोटी कलम के साथ खींची गई रेखा है। इससे जमीन पर 100 मीटर तक अंतर हो सकता है, इसीलिए रेखा के इस पार या उस पार कुछ मीटर की दूरी पर बना टेंट भी समस्या पैदा कर सकता है। हालांकि, चीन के सैनिकों ने एलएसी के पास जहां तंबू गाड़ा, वहां से गलवान नाला सीधे दिखाई देता है, जहां भारत के लिहाज से संवेदनशील दरबूक-श्योक-दौलत बेग ओल्डी रोड जाती है, इसीलिए यह भारत को नागवार गुजरा है। इस तरह के मामलों के शांतिपूर्ण निपटारे के लिए 1993 के बाद से दोनों देशों के बीच में कई समझौते हुए हैं। साल 1996 में हुआ एक समझौता कहता है कि इस तरह के सीमा-विवादों के निपटारे में सैन्य हथियारों का इस्तेमाल नहीं होगा।
चूंकि सीमा को लेकर अब तक अंतिम सहमति नहीं बन सकी है, इसलिए दोनों पक्ष कई बार आमने-सामने आ चुके हैं। इनमें साल 2013 में पूर्वी लद्दाख के डेपसांग, डेमचोक और चुमार में हुआ तनाव भी एक है। गलवान हालिया घटनाओं का चरम बिंदु है। इसका खतरनाक प्रभाव पड़ सकता है, क्योंकि दोनों राष्ट्रों के पास परमाणु हथियारों से संपन्न बड़ी सेनाएं हैं। क्या दोनों देश अभी युद्ध का जोखिम उठा सकते हैं, जब पूरी दुनिया के साथ वे भी कोरोना वायरस महामारी से लड़ रहे हैं? बहस का मुद्दा यह भी है कि चीन इस समय ऐसा कोई तनाव क्यों चाहेगा?
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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