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सियासी गणित में जातियां कब तक (हिन्दुस्तान)

बिहार विधानसभा का चुनाव होने जा रहा है। यहां के जनतंत्र के अनुभवों को याद करने का यह उचित समय है। इन अनुभवों के कई पन्ने हमारे सामने हैं। पहला पन्ना तो यही है कि जनतंत्र को जातियों में बंटी सामाजिक दुनिया में काम करना होता है, यानी जनतंत्र को जाति-तंत्र की राहों से गुजरना होता है। लगभग सभी राजनीतिक व्याख्याकार बिहार चुनाव और यहां के जनतंत्र में जाति की भूमिका प्रभावी मानते हैं। यह लगभग 205 जातियों के सामाजिक सहकार, टकराव और संवादपूर्ण प्रतिद्वंद्विता में रोज आकार ले रहा समाज है। इस समाज के जनतंत्र और सत्तातंत्र के इतिहास को अगर याद करें, तो ऊंची जातियां के, जिनकी आबादी बिहार में लगभग 20 प्रतिशत के आस-पास रही है, कुछ शिक्षित, जागरूक और विशिष्ट प्रभावी जातियों के ‘रईस’ व ‘खास’ प्रभावी जनों को पिछड़ी जातियों के बाद में शिक्षित और प्रभावी हुई कुछ खास जातियों के खास लोगों ने सत्ता से हटाकर अपनी जगह बनाई। पहले के ‘खास’ की जगह बाद में बने ‘खास’ ने जरूर ले ली, लेकिन ‘आम जन’ इसी इंतजार में हैं कि उन तक राज्य निर्देशित जनतांत्रिक संसाधन और शक्तियां पहुंचें। 
बिहार के जनतांत्रिक सत्ता के इतिहास में आजादी के पूर्व व आजादी के बाद लगभग 30 वर्षों तक हावी रही ऊंची जातियों से कायस्थ, ब्राह्मण, क्षत्रीय और भूमिहार प्रभावी रहे। आजादी के पूर्व ही इनके आधिपत्य के विरुद्ध पिछड़ी जातियों में संख्या-बल में प्रभावी जातियों (यादव, कुर्मी, कोइरी) की कसमसाहट सुनाई पड़ने लगी थी। 1930-40 में इन जातियों का त्रिवेणी संघ बन गया था। इनके जातीय संगठन सक्रिय हो गए थे। आजादी के बाद ये जातियां ‘रैयतपन’ से मुक्त होकर ‘जमीन का मालिक ही किसान’ में तब्दील हो गई थीं। हरित क्रांति से इन जाति-समूहों ने भरपूर लाभ उठाया और राजनीति में शक्ति पाने के लिए जोर लगाया। समाजवादी राजनीति और गैर-कांग्रेसवाद के रास्ते चलकर इन्होंने बिहार की सत्ता पर इन चारों जातियों के प्रभाव को कमजोर कर दिया। लेकिन रोचक है यह देखना कि अगर जनतांत्रिक हिस्सेदारी भी जातियों के आधार पर होनी है, तो भी क्या समाज में मौजूद सभी जातियां जनतांत्रिक सत्ता-शक्ति में अपनी हिस्सेदारी पाने में सफल हो पा रही हैं? संभवत: नहीं, बिहार की लगभग 205 जातियों में से 15-20 से ज्यादा को उनकी वाजिब हिस्सेदारी अभी तक नहीं मिल पाई है। 
राज्य में लगभग आधी से ज्यादा आबादी पिछड़ी और अति पिछड़ी जातियों की है। पिछड़ी जातियों में से पिछले 70 बरसों से निकले सांसद, विधायक, मंत्रियों का यदि प्रोफाइल देखें, तो लगभग 130 पिछड़ी जातियों के सामाजिक समूह में से कोइरी, कुर्मी, कमार, बनिया, बढ़ई, कुम्हार, कानू, गोढ़ी, गंगोत जैसी जातियों को ही, जो संख्या-बल में प्रभावी हैं, जनतंत्र में हिस्सेदारी मिल पाई है। उनमें से भी ज्यादातर हिस्सेदारी त्रिवेणी संघ की राजनीति के समय से ही जोर लगाने वाली यादव, कुर्मी और कोइरी के पास है।
बिहार में जनतांत्रिक अनुभव का दूसरा पन्ना दलित राजनीति की स्थिति का बयान है। बिहार में दलितों की जनसंख्या 16 प्रतिशत के आस-पास है। इनमें राजनीतिक संख्या-बल और आकांक्षाओं के प्रदर्शन के आधार पर हरिजन और दुसाध दो बड़ी व महत्वपूर्ण जातियां हैं। 1991 में यहां 23 के आस-पास दलित जातियां गिनी गई थीं। इनमें हरिजन, दुसाध, धोबी, मुसहर, पासी और भुइयां मिलकर दलित आबादी का 93 प्रतिशत होती हैं। शेष 17 दलित जातियों की आबादी सात प्रतिशत में ही सिमट जाती है। आजादी से अब तक विधानसभा एवं लोकसभा में दलितों में हरिजन, दुसाध को ही प्रतिनिधित्व ज्यादा मिला है। इनके बाद पासी, धोबी, रजवार जैसी दलित जातियों को थोड़ी हिस्सेदारी मिल पाई। मुसहर जाति अति-दलित समूह में संख्या-बल में ज्यादा और प्रतिनिधित्व की राजनीति में प्रभावी आकांक्षाओं को जाहिर करने के कारण बेहतर राजनीतिक हिस्सेदारी हासिल कर पाई है। बिहार की दलित जातियों में से बांतर, बाउरी, भोगता, दबकार, चैपाल, डोम, धांगर, हलखोर, घासी जैसी अनेक दलित जातियां ‘महादलित’ की कोटि बनने के बाद भी जनतांत्रिक शक्ति सदन के दरवाजे के पास पहुंच नहीं पाई हैं। दलितों में जो जातियां जनतांत्रिक शक्ति सदन में प्रभावी रूप से मौजूद हैं, वे प्राय: संख्या-बल में प्रभावी हैं। हरिजन पूरी दलित आबादी का 39 प्रतिशत है। दुसाध दूसरी बड़ी दलित जाति है। मुसहर की जनसंख्या भी दलितों में प्रभावी है। 
जनतंत्र के अनुभव का तीसरा पन्ना है, दलित एवं पिछड़ी जातियों में से वे ही जनतांत्रिक शक्ति सदन में प्रभावी हैं, जो आजादी के पूर्व और उसके आस-पास से अपनी राजनीतिक आकांक्षाओं को शक्तिशाली ढंग से अभिव्यक्त करने लगी थीं। हरिजन, दुसाध विशेष रूप से आजादी के तुरंत बाद की राजनीति में प्रभावी होने लगे थे। शिक्षा एवं सरकारी नौकरी से वे आजादी के पहले ही जुड़ गए थे। पिछड़ों में यादव, कुर्मी और कोइरी जाति 1930 के आस-पास ही पिछड़ों की राजनीति का नेतृत्व करने लगी थीं।
जनतांत्रिक अनुभव का चौथा पन्ना बताता है कि जनतंत्र में शक्ति पाने के लिए अपनी आवाज एवं उपस्थिति को मजबूत बनाना होता है। जातियों को अपने भीतर कुछ शक्तिपरक योग्यताएं विकसित करनी पड़ती हैं, जैसे- जनतांत्रिक हिस्सेदारी की आकांक्षा करने की क्षमता, उन आकांक्षाओं को हासिल करने की क्षमता और प्रतिनिधित्व की राजनीति की क्षमता। जिनके पास ये क्षमताएं देर से आईं या नहीं आईं, वे जनतंत्र के दरवाजे से अब भी काफी दूर खड़ी हैं। देखना है, कैसे धीरे-धीरे बूंद-बूंद की भांति जनतांत्रिक शक्ति व आकांक्षाएं उन तक पहुंचती हैं, और वे कह पाती हैं कि ‘सिंहासन खाली करो, हम भी आते हैं’। 
यूं भी भारत में जनतंत्र को अगर सफल होना है, तो उसे समाहारी होना ही होगा। सभी छोटे-बड़े को अपने में जगह देनी होगी। जातिभाव के माध्यम से सत्ता प्राप्ति के बावजूद भारतीय जन को एक दिन जाति से परे जनतांत्रिक ‘नागरिक’ की अस्मिता में बदलना होगा। भारतीय जनतांत्रिक अनुभवों में एक नया पन्ना हमें जोड़ना ही होगा, जो बाबा साहब आंबेडकर के सपनों को साकार करते हुए जातिभाव को एक बूंद के रूप में जनतांत्रिक नागरिकता के महासमुद्र में समा ले। तभी शायद बिहार और भारत में सही जनतांत्रिक अनुभवों से हमारा साक्षात्कार हो पाएगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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