Home करेंट अफेयर्स अखबारों के सम्पादकीय सामर्थ्य और स्वाधीनता का रिश्ता (हिन्दुस्तान)

सामर्थ्य और स्वाधीनता का रिश्ता (हिन्दुस्तान)

सिर्फ एक दिन पहले आजादी की 73वीं वर्षगांठ मना चुके हमारे देश के पास इतराने, इठलाने और बलखाने को बहुत है, पर उल्लास के उजाले अक्सर अंधेरों की अनदेखी कर दिया करते हैं। मैं आज विनयपूर्वक उन लोगों की ओर आपका ध्यान खींचना चाहूंगा, जिनसे अतीत पर गर्व करने की अपेक्षा की जाती है, पर उनका वर्तमान अनिश्चित और भविष्य अनिर्णीत है।

असम के कोकराझार जिले के मूल निवासी दीपक ब्रह्मा की व्यथा-कथा से बात शुरू करना चाहूंगा। मूल स्थान पर रोजगार न मिलने की वजह से वह गुजरात में मेहनत-मजदूरी करके पेट पालते थे। कोविड के कुहासे में जब उनका रोजगार गुम हो गया, तो अपने भाई-बंधुओं की तरह उन्होंने भी ‘अपने देस’ लौट जाने की सोची। रोज कमाकर खाने वालों के पास कोई जमा-पूंजी नहीं होती। घर का सामान औने-पौने में बेचकर उन्होंने जो पैसे जुटाए, वे गांव पहुंचने में खर्च हो गए। वहां पहुंचकर मालूम पड़ा कि पुरखों की भूमि ने उन्हें जन्म देकर बिसरा दिया है। वहां रोजगार था नहीं, गांव के लोगों का व्यवहार भी परायेपन की स्याही से सराबोर था। फाकाकशी जब सहनशीलता की सीमा को पार करने लगी, तो उन्होंने मजबूरी में अपनी नवजात बेटी को 45 हजार में बेच दिया।

उन्हें लगा था कि एक बच्ची गंवाकर वह अपने अन्य दो बच्चों का पेट तो कुछ दिनों के लिए पाल सकेंगे, पर इलाके में सक्रिय एक सामाजिक संगठन को इसकी भनक लग गई। उसके कार्यकर्ताओं ने जो सुना था, तहकीकात में उसे सही पाया। मामला पुलिस तक पहुंच गया। ब्रह्मा, बिचौलिया और खरीदार, तीनों जेल भेज दिए गए। बेचारा ब्रह्मा, घर का रहा न घाट का! अब लंबी कानूनी जद्दोजहद उसका इंतजार कर रही है। अफसोस यह है कि 74वें साल में कदम रख चुके भारतीय लोकतंत्र के दामन में दुख देने वाली यह अकेली कहानी नहीं है। तमाम ऐसे अभागे देश के हर कोने में तरह-तरह के दंश भोगने को अभिशप्त हैं।

यह ठीक है कि हमें दूसरों के दुख-दर्द बहुत दिनों तक याद नहीं रहते, पर कुछ हफ्तों पहले ही हमने उन बदनसीबों के काफिले देखे हैं, जो चिलचिलाती धूप में नंगे सिर और नंगे पांव अंधाधुंध अपने गांवों की ओर भागे जा रहे थे। उनकी पानी की बोतलें खाली थीं, पेट भूख से उबल रहे थे, पैरों की बिवाइयों से खून रिस रहा था, पर एक उम्मीद थी कि हमारी धरती हमें शरण देगी। इस भीड़ में गर्भवती औरतें, बीमार बुजुर्ग, बच्चे, सभी शामिल थे। देश के अधिसंख्य लोगों ने 1947 के विभाजन के बारे में सिर्फ सुना है। यह जलावतनी तो हमारे सामने घटित हो रही थी। इन लोगों के पास आधार कार्ड हैं, जिनमें उनके पते दर्ज हैं। ये पते किस काम के, जो दो वक्त की रोटी और चैन की ठांव की गारंटी नहीं ले सकते?

यहां-वहां आश्रय जुटाने की जुगत में जुटे ये वे लोग हैं, जिन्हें मोहनदास करमचंद गांधी ने कभी ‘दरिद्र-नारायण’ का दर्जा देते हुए आह्वान किया था कि इनकी सेवा करो। ये वे लोग हैं, जिनके लिए बापू ने ‘राम राज्य’की अवधारणा सामने रखी थी। गोरे हुक्मरानों से जूझते हुए प्राण गंवाने वाले इनके पुरखों ने इसी सपने के सहारे बलिदानी संघर्ष की शक्ति जुटाई थी। उनके सपने  किस मुकाम पर पहुंचे हैं, यह बताने-सुनने से कहीं ज्यादा समझने की जरूरत है।

सवाल उठता है कि क्या केंद्र और राज्यों की सरकारें कोविड-19 के महाकोप के वक्त भी मूकदर्शक बनी रहीं? कतई नहीं। इस दौरान राजकोष खोल दिए गए और इसी का नतीजा है कि बेरोजगारी में बेइंतिहा उफान के बाद भी व्यापक भुखमरी की खबरें नहीं आईं। ‘नेशनल सैंपल सर्वे’ और ‘ऑल इंडिया डेब्ट ऐंड इनवेस्टमेंट सर्वे’ के आंकड़ों के आधार पर हमारे सहयोगी प्रकाशन मिंट ने तुलनात्मक अध्ययन कर पाया था कि ‘प्रधानमंत्री किसान योजना’ के तहत करोड़ों लोगों के खातों में 2,000 रुपये की किस्त अग्रिम पहुंची। इस दौरान खाद्यान्न का नि:शुल्क वितरण भी किया गया। हालांकि, इसी आकलन में यह भी पाया गया कि शहरी गरीब अपने ग्रामीण बिरादरों की बनिस्बत अधिक बेहाल थे। उन्हें अनाज और महिलाओं को जन-धन खातों में 500 रुपये का भुगतान किए जाने के बावजूद अधिक दुश्वारियों का सामना करना पड़ा।

एक अन्य सर्वेक्षण में पाया गया कि लॉकडाउन के दौरान लोगों की आमदनी में 84 फीसदी तक की कमी आई। ‘हिन्दुस्तान’के संवाददाताओं ने इस दौरान ऐसे तमाम मामले उजागर किए, जो बताते थे कि निम्न मध्यम और मध्य आय वर्ग के लोगों के सामने तो दुश्वारियों के पहाड़ खडे़ हो गए थे। आमदनी घट गई, बचत रिस गई और रोजमर्रा के खर्चे पहाड़ बन गए। इस वर्ग की सबसे बड़ी दिक्कत यह थी कि अपनी तथाकथित प्रतिष्ठा के चलते वह मुफ्त खाद्यान्न की पंक्तियों में नहीं खड़ा हो सकता था, मनरेगा के लिए प्रार्थना पत्र नहीं जमा कर सकता था और मन मसोसने के अलावा कोई चारा नहीं था उसके पास। प्रेमचंद के गोदान और यशपाल की कहानी परदा  के पात्र पहली बार समूची शिद्दत से हमारे इर्द-गिर्द मंडराते नजर आए। 

कोई आश्चर्य नहीं कि जो लोग बड़ी उम्मीदें लेकर अपने ‘वतन’पहुंचे थे, उन्हें अब उन्हीं शहरों की ओर लौटना पड़ रहा है, जिन्होंने अपने द्वार संकट के समय उनके लिए बंद कर लिए थे। तीन साल होने को आए, ‘इंडिया स्पेंड’ ने विभिन्न सरकारी आंकड़ों का विश्लेषण करते हुए बताया था कि देश के लगभग नौ करोड़ किसान परिवारों में 70 फीसदी जितना कमाते हैं, उससे कहीं अधिक खर्च करने को मजबूर हैं। आमदनी अठन्नी और खर्चा रुपैया का अभागापन उनका साथ छोड़ने को तैयार ही नहीं है।

यही वजह है कि वे लगातार कर्ज के अंतहीन मकड़जाल में फंसते जाते हैं। साहूकारी को भले ही उद्योग न माना जाता हो, पर साहूकारों ने इस दौरान दिन दूनी रात चौगुनी कमाई की। बताने की जरूरत नहीं, सुखी समाज और साहूकारी एक साथ नहीं चल सकते। आजादी और आबादी के इस द्वैत को समझे बिना हम खुद को स्वाधीन और समर्थ कैसे कह सकते हैं? कहते हैं, निराशा के बादलों की ओट में रोशनी की किरणें छिपी होती हैं। आजादी की वर्षगांठ से ऐन पहले ‘लोकल सर्कल’ने अपने सर्वे में पाया कि 54 फीसदी भारतीय मानते हैं कि हम इस आर्थिक संकट से उबर जाएंगे। इतिहास गवाह है कि जो कौमें उम्मीद नहीं छोड़तीं, वे कभी हारती नहीं। देशवासियों का यह आशावाद आशा जगाता है।

Twitter Handle: @shekharkahin 
शशि शेखर के फेसबुक पेज से जुड़ें

[email protected]com



Source link


Disclaimer: This story is auto-aggregated by a computer program and has not been created or edited by DEFINITE BPSC.

हमारा सोशल मीडिया

29,751FansLike
25,786SubscribersSubscribe

Must Read

शक्ति और मर्यादा संजोने का समय (हिन्दुस्तान)

अब नवरात्र के दिनों में पुराना बंगाल खूब याद आता है। 1950 के दशक के शुरुआती वर्षों में बिजली आपूर्ति शुरू नहीं हुई...

हमारी आलोचना (हिन्दुस्तान)

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर भारत की जो आलोचना की है, वह न सिर्फ दुखद, बल्कि शुद्ध रूप से राजनीति...

BPSC 65th मुख्य परीक्षा का नया शेड्यूल जारी, जानिए एग्जाम और एडमिट कार्ड की डिटेल

Bihar BPSC 65th CCE Mains 2020 Exam Date and Admit Card: बिहार लोक सेवा आयोग (Bihar Public Service Commission, BPSC) ने 65 वीं संयुक्त प्रतियोगी...

Top 5 Sarkari Naukari-23 October 2020: PPSC, BPSC, ABVU, OMC, NIRT एवं अन्य संगठनों में निकली 1100 से अधिक सरकारी नौकरियां

सरकारी नौकरी प्राप्त करने हेतु युवाओं के लिए आज है पंजाब लोक सेवा आयोग (PPSC), बिहार लोक सेवा आयोग (BPSC), अटल बिहारी वाजपेयी विश्वविद्यालय...

Related News

शक्ति और मर्यादा संजोने का समय (हिन्दुस्तान)

अब नवरात्र के दिनों में पुराना बंगाल खूब याद आता है। 1950 के दशक के शुरुआती वर्षों में बिजली आपूर्ति शुरू नहीं हुई...

हमारी आलोचना (हिन्दुस्तान)

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर भारत की जो आलोचना की है, वह न सिर्फ दुखद, बल्कि शुद्ध रूप से राजनीति...

BPSC 65th मुख्य परीक्षा का नया शेड्यूल जारी, जानिए एग्जाम और एडमिट कार्ड की डिटेल

Bihar BPSC 65th CCE Mains 2020 Exam Date and Admit Card: बिहार लोक सेवा आयोग (Bihar Public Service Commission, BPSC) ने 65 वीं संयुक्त प्रतियोगी...

Top 5 Sarkari Naukari-23 October 2020: PPSC, BPSC, ABVU, OMC, NIRT एवं अन्य संगठनों में निकली 1100 से अधिक सरकारी नौकरियां

सरकारी नौकरी प्राप्त करने हेतु युवाओं के लिए आज है पंजाब लोक सेवा आयोग (PPSC), बिहार लोक सेवा आयोग (BPSC), अटल बिहारी वाजपेयी विश्वविद्यालय...

BPSC 65th Mains 2020: बिहार लोक सेवा आयोग ने 65वीं मुख्य परीक्षा का कार्यक्रम जारी किया, 25 नवंबर से शुरू होगा एग्जाम

नई दिल्ली, ऑनलाइन डेस्क। BPSC 65th Mains 2020: बिहार लोक सेवा आयोग (बीपीएससी) ने 65वीं संयुक्त मुख्य (लिखित) प्रतियोगिता परीक्षा 2020 की तिथियों...

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here