Home करेंट अफेयर्स अखबारों के सम्पादकीय सामयिक यात्रा (हिन्दुस्तान)

सामयिक यात्रा (हिन्दुस्तान)

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लद्दाख यात्रा न केवल तात्कालिक, बल्कि एक ऐसे दीर्घकालिक संदेश की तरह है, जिसकी गूंज दुनिया में कुछ समय तक बनी रहेगी। विशेषज्ञ भी यह मान रहे हैं कि जो वह दिल्ली में बैठकर नहीं कर पा रहे थे, उसे उन्होंने लेह-लद्दाख पहुंचकर कर दिखाया। उन्होंने मोर्चे पर सैनिकों के बीच जाकर जो सबसे महत्वपूर्ण बात कही है, उसकी प्रासंगिकता अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में सबसे ज्यादा है। भले उन्होंने चीन का नाम न लिया, पर दो टूक कहा कि विस्तारवाद का दौर समाप्त हो चुका है, यह विकास का दौर है। वाकई उनका यह कहना चीन की नीतियों और दुस्साहस पर एक प्रतिकूल टिप्पणी है। 
सीमा पर पहुंचकर श्रीकृष्ण को याद करने का भी अपना महत्व है। एक ओर, बांसुरी है, तो दूसरी ओर, सुदर्शन चक्र। भारतीय राजनय जहां एक ओर, बंधुत्व और सद्भाव में विश्वास करता आया है, वहीं भारत की बहुमूल्य जमीन पर कुछ साम्राज्यवादी शक्तियों की गिद्ध दृष्टि कभी-कभी उसे अशांत करती रही है। आज भारत को सीमा पर फिर ललकारा गया है, वीर भारतीय जवानों का खून बहा है, भावनाएं ज्वार पर हैं, लेकिन तब भी भारत अपनी सद्भावी नीतियों को भूला नहीं है। भारत के संयम और भावनाओं के पक्ष में दुनिया की शक्तियां खुलकर सामने आने लगी हैं। अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जापान इत्यादि अनेक सशक्त देश हैं, जो भारत के साथ खड़े हैं और चीन की निंदा का ग्राफ धीरे-धीरे बढ़ रहा है। चीनी एप पर लगाए गए प्रतिबंध इत्यादि को अगर हम सांकेतिक भी मानें, तब भी दुनिया के कोने-कोने तक भारत की नाराजगी पहुंची है। उम्मीद करनी चाहिए और बहुत हद तक संभव है कि भारतीय प्रधानमंत्री के लद्दाख पहुंचने से पड़ोसी देश भारत की नाराजगी को साफ तौर पर समझ सकेगा। बेशक, तनाव के दिनों में किसी प्रधानमंत्री का मोर्चे पर जाना और सेना के आला अधिकारियों के लगातार दौरे यह साबित करते हैं कि हम अपनी जमीन और जवानों के मनोबल के साथ हैं। 
कोई आश्चर्य नहीं, प्रधानमंत्री का यह दौरा चीन को अच्छा नहीं लगा है और उसने चल रही बातचीत का हवाला दिया है। क्या जब सैन्य स्तर पर बातचीत चल रही थी, तब भारतीय प्रधानमंत्री को वहां नहीं जाना चाहिए था? इस सवाल के जवाब के लिए हमें बातचीत की गुणवत्ता पर एक बार जरूर नजर डाल लेनी चाहिए। लगभग पांच दौर की बातचीत सीमा पर हो चुकी है। वार्ताएं 12-12 घंटे तक चली हैं, पर नतीजा सिफर रहा है। वार्ता इसलिए नहीं होती कि कोई देश अपनी सीधी बात को बार-बार दोहराता रहे और सामने बैठा देश किसी भी जायज बात पर कान न दे। शायद चीन चाहता है कि भारत कुछ समय बाद शांत पड़ जाए और गलवान घाटी की भारतीय जमीन पर उसके शिविर स्थाई मान लिए जाएं। यह चीन का पुराना तरीका बताया जाता है, लेकिन ऐसा पहली बार हुआ है कि यह तरीका चीन को उल्टा पड़ रहा है। उसकी हठधर्मिता से उसके प्रति न सिर्फ भारत, बल्कि अन्य देशों में भी नाराजगी बढ़ रही है। प्रधानमंत्री के दौरे का यह संदेश भी है कि बेनतीजा वार्ताओं से परे भी भारत सोच रहा है। भारत की सोच के प्रति चीन को समझदार बनना पडे़गा। वह समझदारी दिखाने में जितनी देरी करेगा, दुश्मनी की गांठ को अपने ही हाथों और बड़ी करता चला जाएगा। ध्यान रहे, इस बार उसकी विस्तारवादी तानाशाही पूरी दुनिया को चुभ रही है।

Source link


Disclaimer: This story is auto-aggregated by a computer program and has not been created or edited by DEFINITE BPSC.

हमारा सोशल मीडिया

29,612FansLike
25,786SubscribersSubscribe

Must Read

आभासी लेकिन कामयाब अदालतें (हिन्दुस्तान)

वर्चुअल कोर्ट, यानी आभासी अदालतों को स्थाई रूप देने के प्रस्ताव पर मिश्रित प्रतिक्रिया आई है। कुछ लोग इसमें असीम संभावनाएं देख रहे...

अहम उप-चुनाव (हिन्दुस्तान)

आम तौर पर किसी उप-चुनाव को लेकर संबंधित निर्वाचन क्षेत्र के बाहर बहुत दिलचस्पी नहीं होती, क्योंकि उसका राजनीतिक प्रभाव भी सीमित होता...

तमिलनाडु : सजने लगा चुनावी चौसर (हिन्दुस्तान)

तमिलनाडु की मौजूदा राजनीति में यदि किसी व्यक्ति की कामयाबी देखने लायक है, तो वह मुख्यमंत्री ई के पलानीसामी ही हैं। वह न...

Related News

आभासी लेकिन कामयाब अदालतें (हिन्दुस्तान)

वर्चुअल कोर्ट, यानी आभासी अदालतों को स्थाई रूप देने के प्रस्ताव पर मिश्रित प्रतिक्रिया आई है। कुछ लोग इसमें असीम संभावनाएं देख रहे...

अहम उप-चुनाव (हिन्दुस्तान)

आम तौर पर किसी उप-चुनाव को लेकर संबंधित निर्वाचन क्षेत्र के बाहर बहुत दिलचस्पी नहीं होती, क्योंकि उसका राजनीतिक प्रभाव भी सीमित होता...

तमिलनाडु : सजने लगा चुनावी चौसर (हिन्दुस्तान)

तमिलनाडु की मौजूदा राजनीति में यदि किसी व्यक्ति की कामयाबी देखने लायक है, तो वह मुख्यमंत्री ई के पलानीसामी ही हैं। वह न...

एक सेवा अनेक शुल्क  (हिन्दुस्तान)

भारतीय रेल सेवा के लिए यात्रियों को पहले की तुलना में न केवल ज्यादा खर्च करना पड़ेगा, बल्कि कुछ सेवाओं में कटौती भी...

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here