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सहमति की ओर (हिन्दुस्तान)

किसी भी राष्ट्रीय संकट के समय आपसी मत-साम्यता जरूरी है और मत-साम्यता के लिए निर्णायक दलों का साथ बैठना उससे भी ज्यादा जरूरी। आज के समय में भारत जिन बड़े फैसलों की दहलीज पर खड़ा है, वहां हम जितनी ज्यादा सर्वदलीय बैठक कर सकेंगे, देश के लिए उतना ही अच्छा होगा। संभव है, शुरुआती बैठकों में मनभेद और मतभेद ही ज्यादा नजर आएं, इसलिए ऐसी बैठकों को नियमित अंतराल पर करना पडे़गा। आज भारत सीमा पर जिस संकट का सामना कर रहा है, उसकी व्यापकता और जटिलता के मद्देनजर हमारा किसी विचार पर पहुंचने के लिए साथ बैठना सबसे जरूरी है। भारत संकट के मौके पर कई बार बिखर जाता है, क्योंकि हममें साथ बैठने की बुनियादी आदत नहीं है। परदे के पीछे नेता भले परस्पर संबंध निभा लेते हों, मगर देश के सामने वे एक-दूसरे के खिलाफ दिखने में ही अपना हित देखते हैं। ध्यान रहे, यह सिर्फ सियासी हित है। इस हित को साधने में कोई बुराई नहीं, राजनीति इसके लिए पूरे अवसर देती है, लेकिन देश की मांग और जरूरतों का एक अलग ही स्तर है। कोई भी देश अपने तात्कालिक नेताओं और दलों से कहीं अधिक बड़ा होता है, लेकिन आज जरूरी है कि इस सच को व्यवहार में लाया जाए और इसके लिए साथ बैठना प्राथमिक आवश्यकता है। 
ऐसे में, किसी सर्वदलीय बैठक में 20 दलों का शामिल होना अनुकरणीय और स्वागतयोग्य है। सबसे अच्छी बात कि इसमें शारीरिक रूप से पास आने या लंबी यात्राएं करने की जरूरत भी नहीं है। कोरोना के दौर में वर्चुअल या ऑनलाइन बैठकों की मजबूत होती परंपरा ने भी हमें मौका दिया है कि हम परस्पर संवाद बढ़ा सकते हैं। पहले ऐसे संवाद आयोजित करने का खर्चा बहुत होता था, लेकिन अब संचार तकनीक में काफी सुधार आया है और इसकी मदद से राजनीतिक पार्टियां परस्पर संवाद को कई गुणा बढ़ा सकती हैं। यह कहने में कोई हर्ज नहीं कि संवाद बढ़ाने की सर्वाधिक जिम्मेदारी सत्ता पक्ष पर होती है। सत्ता पक्ष को इन संवादों को पूरे लोकतांत्रिक ढंग से आयोजित करना चाहिए। हर पार्टी और हर सांसद का अपना महत्व है। किसी भी दल में यह असंतोष नहीं रहना चाहिए कि देश पर आए संकट के समय उसकी राय नहीं ली जा रही है। जरूरी नहीं कि किसी विशाल पार्टी की गोद में ही अच्छे विचार पलते हैं, संभव है कि किसी छोटी पार्टी के पास भी कोई ऐसा विचार हो, जिससे बेहतर देश सेवा संभव हो। किसी भी लोकतंत्र में सबका मन और दिमाग टटोलते हुए चलने के अपने फायदे हैं। भारतीय लोकतंत्र में यह काम जितना होना चाहिए था, उतना नहीं हुआ है। 
भारत और भारतीय समाज आज दुनिया में जिस तरह से आगे बढ़ रहा है, अब समय आ गया है कि हर पार्टी का अपना एक राष्ट्रीय विचार होना चाहिए। संकीर्ण विचारों से स्थानीय राजनीति भले चल सकती हो, लेकिन देश और दुनिया में चलने के लिए व्यापक, सुचिंतित और दृढ़ विचारों की जरूरत है। सत्ता में बैठकर यह ध्यान रहे कि विपक्ष में रहते क्या विचार थे और कोई विपक्ष में बैठ जाए, तो अपने सत्ता के दिनों को न भूले। कम से कम देश के संदर्भ में देशवासियों को राजनीतिक पार्टियों से ज्यादा परिपक्वता की उम्मीद है। सर्वदलीय बैठकों के जरिए अगर ऐसी परिपक्वता की ओर हम बढ़ते हैं, तो इससे बेहतर कुछ नहीं।

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