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सतर्कता एकमात्र विकल्प (हिन्दुस्तान)

कोरोना संक्रमण में भारत का दुनिया में चौथे स्थान पर पहुंचना जितना दुखद है, उससे कहीं अधिक चिंताजनक है। इस चिंता का इजहार जन-सामान्य से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक होना स्वाभाविक है। माना जा रहा था कि कोरोना भारत में ज्यादा नहीं फैलेगा और दुनिया को भारत से उम्मीदें भी हैं, लेकिन पिछले महीने भर में कोरोना ने जो रफ्तार पकड़ी है, हमारी चुनौतियां बहुत बढ़ गई हैं। अब भारत से आगे केवल तीन देश बचे हैं। रूस में पांच लाख से अधिक मामले हैं, ब्राजील में आठ लाख से ज्यादा और अमेरिका में 20 लाख से ज्यादा। भारत में संक्रमण की यही रफ्तार रही, तो जुलाई में ही कोरोना संक्रमण चरम पर पहुंच जाएगा। तेज बढ़ते संक्रमण से पता चलता है, लोग पूरी तरह सचेत नहीं हैं। कोरोना से रक्षा के दिशा-निर्देशों के प्रति लापरवाही ज्यादा दिख रही है, तो नतीजे सामने हैं। कुछ राज्य फिर लॉकडाउन के पक्ष में हैं। कोरोना प्रबंधन की ऐसी-ऐसी खामियां सामने आने लगी हैं, जिन्हें छिपाया नहीं जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को देश भर के सरकारी अस्पतालों में कोविड-19 रोगियों और शवों के साथ हो रहे व्यवहार पर कड़ा रुख अपनाते हुए स्थिति को विकट बताया है। खबरों का संज्ञान लेते हुए तीन न्यायाधीशों वाली पीठ ने अस्पतालों के हालात पर चार राज्यों, दिल्ली, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल से विस्तृत स्थिति रिपोर्ट मांगी है। न्यायमूर्ति अशोक भूषण की अध्यक्षता वाली पीठ ने कडे़ शब्दों का इस्तेमाल करते हुए कोरोना प्रबंधन की खिंचाई की है। सुप्रीम कोर्ट का कहना है, जब मामले तेजी से बढ़ रहे हैं, तब जांच की संख्या बढ़नी चाहिए, ऐसे में राष्ट्रीय राजधानी में जांच का घट जाना अनुचित है। शीर्ष अदालत ने यह भी कह दिया कि सरकारी अस्पतालों में बड़ी संख्या में बिस्तर खाली होने के बावजूद मरीज भटक रहे हैं। कोर्ट को शव प्रबंधन पर भी चिंता जाहिर करनी पड़ी है, तो स्थिति की गंभीरता समझी जा सकती है। जहां चेन्नई में सरकारी एजेंसियां मृतकों की अलग-अलग संख्या बता रही थीं, तो वहीं दिल्ली में भी यही शिकायत सामने आ गई। जब एजेंसियां मौत के आंकडे़ ही दुरुस्त नहीं रख पा रही हैं, तो संक्रमितों की संख्या कितनी पुख्ता होगी, सोच लेना चाहिए। 
देश में सबसे अधिक 94 हजार से ज्यादा मामले महाराष्ट्र में हैं, उसमें भी मुंबई सबसे बुरे हाल में है। वहां की सरकार केंद्र से सहयोग मांगने को विवश हुई है। मुंबई के सिविक संचालित अस्पतालों में वार्ड-ब्वॉयज और नर्सों के 30 प्रतिशत स्टाफ की कमी है। विकसित शहर मुंबई में जब सेहत व्यवस्था चरमराने लगी है, जब राष्ट्रीय राजधानी कराहने लगी है, तब देश के दूसरे इलाकों का सहज अनुमान लगाया जा सकता है। बेशक, जब आंकडे़ तेजी से बढ़ रहे हैं, तो व्यवस्था की खामियां-कमियां खुलकर सामने आएंगी ही, लेकिन जरूरत इन खामियों को लेकर उदास होने की नहीं है। हर किसी को अपने स्तर पर सोचना होगा कि वह संक्रमण के पक्ष में है या विपक्ष में। हम अपनी उदासीनता या लापरवाही से ऐसी नौबत ही क्यों आने दें कि अस्पतालों पर ज्यादा बोझ पड़े? हिम्मत के साथ हमें मुकाबला करना है। तीन लाख की भयावह संख्या सताने लगे, तो यह भी सोचना चाहिए कि उसमें करीब डेढ़ लाख लोग कोरोना के खिलाफ विजयी रहे हैं। हम सोलह आना सावधान रहकर ही विजयी होंगे और हमारा देश भी।
 

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