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विश्वास में कमी से कमजोर हुई लड़ाई (हिन्दुस्तान)

तीन महीने के देशव्यापी लॉकडाउन और अनलॉक-1 के दौरान केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा भ्रम पैदा करने वाले और विस्मयकारी आदेशों की जो बौछार की गई, वह सरकार और आम लोगों के बीच कोविड-19 से संबंधित संवाद का शुरुआती तरीका था। इन आदेशों में लोगों के दैनिक जीवन के हर पहलू को लेकर निर्देश जारी किए गए। मगर जैसे ही लॉकडाउन हटा और संक्रमण के मामले तेज होने लगे, उससे यह स्पष्ट हो गया कि ये ‘आदेश’ महामारी की रोकथाम के अपने लक्ष्य को नाममात्र हासिल कर पाए। ऐसे आदेशों ने एक ऐसी नीतिगत दृष्टि को बल दिया, जिससे कोविड-19 की रोकथाम में नियमों के अनुपालन में कड़ाई करने का विशेषाधिकार मिलता है। 
बेशक, कोविड-19 को नियंत्रित करने के लिए राष्ट्र आपको ‘आदेश’ देगा, आपको अनुशासित करेगा (कई जगह लॉकडाउन डंडे के जोर पर लागू किया गया) और आपकी निगरानी करेगा (तकनीक का इस्तेमाल करते हुए)। मगर, विश्व स्तर पर सार्वजनिक भागीदारी एक महत्वपूर्ण घटक है, जो लोगों की सेहत को संवारने में मदद करती है। इसकी पुष्टि कोई भी सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ कर सकता है। पर इसके लिए जरूरी है कि नागरिकों और राष्ट्र के बीच विश्वास का रिश्ता कायम हो। भारत में कोविड-19 के खिलाफ जो रणनीति अपनाई जा रही है, उसमें इसी विश्वास की कमी है। ऐतिहासिक रूप से नौकरशाही का जो ढर्रा है, वह राष्ट्र और नागरिकों के रिश्ते में अविश्वास पैदा करता रहा है। कोविड-19 के खिलाफ जंग में यह अविश्वास तीन अलग-अलग रूपों में देखा गया है। 
पहला है प्रशासनिक संवाद, जिसके माध्यम से अंतहीन आदेश कानूनन लागू किए गए। नृवंशविज्ञानियों की मानें, तो अविश्वास की यह संस्कृति उपनिवेशवादी शासन-व्यवस्था की देन है। देश में स्थानीय नौकरशाही पर अपने शोध में मैंने भी नौकरशाही के रोजमर्रा के कामकाज पर ‘सरकारी आदेश’ का गहरा नियंत्रण देखा है। आदेशों का अनुपालन प्राथमिक तरीका है, जिसके माध्यम से वरिष्ठ अपने अधीनस्थों की निगरानी करते हैं। आदेशों का पालन न करने पर अन्य आदेशों और दंड का भी प्रावधान किया गया है। कोविड-19 का सामना करते हुए नौकरशाही आदेश देने के अपने उसी परिचित तरीके पर निर्भर दिखी। यह जनता से संवाद का उनका आम तरीका बन गया है, फिर चाहे इससे लोगों में भ्रम और खौफ ही क्यों न पैदा हो।
दूसरा है, राहत प्रतिक्रिया। ऐतिहासिक रूप से, अविश्वास की वजह से नौकरशाहों और नागरिकों के बीच रोजाना अनगिनत आदेश जारी होते हैं। आज राशन कार्ड, मतदाता पहचान पत्र जैसे दस्तावेज यह निर्धारित करने की कुंजी बन गए हैं कि कोई नागरिक राहत-उपायों के लाभ का पात्र है या नहीं। और यह दायित्व नागरिकों पर ही होता है कि वे इन दस्तावेजों को पेश करें और अपनी पात्रता साबित करें। अनेक नागरिकों के पास ऐसे दस्तावेजों का न होना ऐसा महत्वपूर्ण कारक है, जिसके आधार पर लॉकडाउन की चरम स्थिति में भी प्रवासी श्रमिकों को खाद्यान्न उपलब्ध कराने में नौकरशाही खुद को असमर्थ बताती रही। ज्यादातर नागरिकों की मानें, तो राष्ट्र उनकी जरूरतों को पूरा करने में नाकाम रहा, इसने अविश्वास की खाई को और गहरा किया। 
तीसरा, स्वास्थ्य प्रतिक्रिया। इस मोर्चे पर विश्वास की कमी एक और बड़ी चुनौती बन गई है। चूंकि महामारी के प्रसार को थामने और इलाज को लेकर तमाम तरह की उलझनें होती हैं, इसलिए सार्वजनिक स्वास्थ्य के मोर्चे पर जन-भागीदारी की जरूरत बढ़ जाती है। यह भागीदारी इसलिए भी अहम है, ताकि लक्षण का पता लगाकर जल्द ही जरूरतमंदों को इलाज की सुविधाएं उपलब्ध कराई जा सकें। लंबे समय तक मानव व्यवहार में बदलाव (मास्क का इस्तेमाल और शारीरिक दूरी का पालन) को सुनिश्चित करने के लिए सहभागिता बहुत जरूरी है। स्वास्थ्य अर्थशास्त्री जिष्णु दास एक साक्षात्कार में कहते हैं कि कोविड-19 के खिलाफ सरकार व लोगों को एक साथ मिलकर काम करने की जरूरत है। कई संक्रामक रोगों  के समय देश ऐसा करने में विफल रहा है। आज कोविड-19 हमारे सामने दोहरी चुनौती पेश कर रहा है।
पहली, इसमें कलंक व भय का दूर-दूर तक विस्तार हुआ है। मीडिया रोजाना बता रहा है कि समाज किस तरह कोविड-19 के मरीजों के साथ भेदभाव करता है। उनको लांछित किया जाता है। भारत की राजनीति ने इसे और बढ़ाने का काम किया है। तब्लीगी जमात की घटना में एक समुदाय विशेष को दोषी ठहराने से ऐसा माहौल बना, जिसमें रोगियों की देखभाल पर जोर देने की बजाय उन्हें कलंकित करने का चलन शुरू हो गया।
दूसरी, भारत का सार्वजनिक स्वास्थ्य तंत्र लंबे समय से यह विश्वास दिलाने में नाकाम रहा है कि नागरिकों को सस्ती व गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सुविधा मुहैया कराने की क्षमता उसके पास है। विडंबना यह है कि अधिकतर भारतीयों का भरोसा अनौपचारिक निजी चिकित्सा क्षेत्र पर है। फिर भी, जब बात कोविड-19 की आती है, तो जांच से इलाज तक सरकार ही पूरी तरह जिम्मेदार दिखती है। यह जरूरी भी है। चूंकि संक्रामक रोगों में तमाम तरह के ऐसे बाहरी कारक होते हैं, जिनका बोझ गरीबों पर ही पड़ता है, इसीलिए इसमें सरकारी हस्तक्षेप अनिवार्य हो जाता है। मगर सरकार पर विश्वास की कमी के कारण बीमार लोग छिपने-बचने के प्रयास भी करते हैं, क्योंकि वे सरकारी अस्पतालों में इलाज नहीं कराना चाहते। यही वजह है कि दिल्ली जैसे शहर में महज इस फैसले ने तस्वीर बदल दी कि बिना लक्षण या कम लक्षण वाले मरीज घर में ही क्वारंटीन हो सकते हैं।
जाहिर है, सरकार इन तमाम चुनौतियों से बच नहीं सकती। जरूरी है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य तंत्र पर लोगों के विश्वास को बढ़ाने की तरफ ध्यान दिया जाए। आदेशों के बार-बार प्रयोग, डाटा की कमी, केंद्र व राज्य स्तर पर निर्णय लेने में पारदर्शिता का अभाव आदि परस्पर विश्वास की राह की बड़ी बाधाएं हैं। इन्हें दूर करने की जरूरत है। समुदायों में विश्वसनीय रूप से पहुंच बनाने के लिए भी तंत्र को संजीदा प्रयास करने होंगे। धारावी में सरकार की यह कोशिश कारगर रही। मगर इन सफलताओं को भरोसे की कमी की व्यापकता के संदर्भ में भी देखने की जरूरत है। यदि इसे सरकार और सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ समझ लें, तो हम ऐसी टिकाऊ और समाजोन्मुखी दृष्टि को अपना सकेंगे, जिससे भारत कोविड-19 के खिलाफ कामयाब मुकाबला कर सकेगा। 
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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