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विरोध की सीमा (हिन्दुस्तान)

शाहीन बाग में करीब सौ दिन चले धरना-प्रदर्शन पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला भले कुछ देर से आया हो, लेकिन स्वागतयोग्य है। बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने साफ सुना दिया कि प्रदर्शनकारी अनिश्चितकाल के लिए किसी सार्वजनिक सड़क या जगह पर कब्जा नहीं कर सकते। कोई भी समूह या व्यक्ति प्रदर्शन के नाम पर सार्वजनिक जगह को बाधित नहीं कर सकता। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रदर्शन किसी ऐसी जगह पर होना चाहिए, जहां भीड़भाड़ न हो। यह बात छिपी हुई नहीं है कि शाहीन बाग में हुए प्रदर्शन से जो नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई संभव नहीं है। उससे जो व्यापक आर्थिक, सामाजिक क्षति पहुंची है, उसका आकलन और भी मुश्किल है। नागरिकता संशोधन कानून (सीएए), एनआरसी और एनपीआर के विरोध में जब शाहीन बाग में प्रदर्शन हो रहा था, तब देश में माहौल काफी गरम था। इसके पक्ष व विपक्ष में समाज बंटा हुआ था। प्रशासन जब मजबूर हो गया था, प्रदर्शनकारियों को हटाने की कोशिशें जब नाकाम हो गई थीं, तब सुप्रीम कोर्ट ने समाधान निकालने के लिए मध्यस्थों को भेजा था। कुछ दौर की बातचीत के बावजूद प्रदर्शनकारी मध्यस्थों की बात मानने को तैयार नहीं हुए। तब सुप्रीम कोर्ट की ओर से कोशिश हुई थी कि धरना कहीं और स्थानांतरित हो जाए और शाहीन बाग की बाधित सड़क खुल जाए। सुप्रीम कोर्ट की वह कोशिश नाकाम हो गई थी, पर तब तक कोरोना का कहर टूटा और धरने को 24 मार्च को लॉकडाउन की शुरुआत में हटा दिया गया। धरना हटाने का काम प्रशासन ने किया था और सुप्रीम कोर्ट ने भी स्पष्ट कर दिया है कि प्रशासन खुद सार्वजनिक स्थानों को अवरोधों से मुक्त रखे, सिर्फ अदालत के कंधे पर बंदूक रखकर न चलाए।
इसमें कोई शक नहीं, सड़क को प्रदर्शन के लिए इस्तेमाल करने से बड़ी संख्या में लोगों को परेशानी होती है और उनके अधिकारों का हनन होता है। जहां हम भारतीयों को विरोध-प्रदर्शन का अधिकार है, वहीं हमें सड़क और सार्वजनिक जगहों के इस्तेमाल का भी अधिकार है। अव्वल तो लोगों को विरोध-प्रदर्शन से लोकतांत्रिक ढंग से रोकना-समझाना शासन-प्रशासन का काम है, वहीं होने वाले प्रदर्शन से दूसरे लोगों की रक्षा करना भी उसका दायित्व है। शासन-प्रशासन को अपने स्तर पर ही ऐसे प्रदर्शनों का सही समाधान खोजना चाहिए। गौर करने की बात है, जब सरकार धरना को कहीं और स्थानांतरित करने या खत्म करने में नाकाम रही, तब सड़क खुलवाने के लिए अदालत में याचिका दायर करने की जरूरत पड़ी। यह जरूरत नहीं पड़नी चाहिए थी। अदालत को ऐसे मामलों को सुलझाने में वक्त लगता है, क्योंकि कानूनी प्रावधान के तहत सबका पक्ष सुनने के बाद ही कोई फैसला संभव होता है। 
खैर, अब सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देश के बाद सरकारों को ज्यादा सचेत रहना चाहिए। धरना-प्रदर्शन के प्रति ज्यादा संवेदनशील होने की जरूरत है। समय से पहले ही समस्या की सुनवाई करने में भलाई है। किसी विरोध के सड़क पर उतरने और समाज पर भारी पड़ने का इंतजार नहीं करना चाहिए। लोगों और संगठनों को भी अच्छी नागरिकता और परिपक्व लोकतंत्र की मिसाल पेश करनी चाहिए। जहां यह देखना जरूरी है कि धरना-प्रदर्शन करने के अधिकार का दुरुपयोग न हो, वहीं इनसे दूसरों को होने वाली परेशानी के बारे में भी सोच लेना चाहिए।

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