Home करेंट अफेयर्स अखबारों के सम्पादकीय विपदा में भी चढ़ते शेयरों का सच (हिन्दुस्तान)

विपदा में भी चढ़ते शेयरों का सच (हिन्दुस्तान)

भारत में इसे ‘नोट फॉर वोट’ भी कहा जा सकता है, क्योंकि चुनाव से पहले अमेरिका सरकार ने डेढ़ ट्रिलियन डॉलर के आर्थिक पैकेज का प्रस्ताव रख दिया है। लेकिन क्या राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कोरोना पॉजिटिव होने के बाद पैकेज का गणित उलट-पलट जाएगा? कतई नहीं, वजह यह है कि ट्रंप की विरोधी डेमोक्रेट पार्टी तो इससे भी बड़ा, यानी 2.2 ट्रिलियन डॉलर का पैकेज चाहती है। अमेरिकी संसद की प्रतिनिधि सभा में डेमोक्रेट प्रतिनिधियों का बहुमत है और इस प्रस्ताव पर मुहर भी लगा दी है।
यह वैसा ही पैकेज है, जैसा भारत में 20 लाख करोड़ रुपये का पैकेज बताया गया था, यानी अर्थव्यवस्था को चलाने के लिए, उद्योगों और व्यापारों को मंदी से बचाने के लिए खर्च होनेवाला प्रोत्साहन पैकेज। डेढ़ ट्रिलियन डॉलर का अर्थ है डेढ़ लाख करोड़ डॉलर। रुपये में बदल दें, तो ये हो जाएंगे करीब 105 लाख करोड़ रुपये। और 2.2 ट्रिलियन डॉलर का मतलब होगा, 150 लाख करोड़ रुपये से भी ज्यादा। इससे पहले भी अमेरिका अपने लोगों को बड़ी आर्थिक राहत दे चुका है। कोरोना संकट की शुरुआत में ही उसने अप्रैल में दो लाख करोड़ डॉलर का पैकेज दिया था। इसके तहत सीधे लोगों के खाते में रकम डाली गई थी।
उसके बाद से ही अमेरिकी शेयर बाजार में लगातार तेजी दिखती रही और न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज का डाउ जोंस सूचकांक, जो 23 मार्च को 18,591 गिर गया था, पिछले महीने 29,100 तक पहुंच गया। इस बात पर भी लगातार हैरानी जताई जाती रही कि जब कारोबार, रोजगार और अर्थव्यवस्था बेहाल हैं, तो बाजार कैसे चल रहा है? एकदम यही सवाल अमेरिका और भारत में एक साथ पूछा जाता रहा। यहां भी सेंसेक्स मार्च में 41 हजार से गिरकर 26 हजार तक पहुंच गया था। लेकिन खरामा-खरामा चलते हुए वह 39,000 तक का सफर तो कर चुका है। वह भी तब, जब देश भर के बाजारों, फैक्टरियों व दफ्तरों में रौनक नहीं लौटी है। 
पिछले 50 साल में अर्थव्यवस्था की इतनी खराब हालत कभी देखी नहीं गई और जानकारों का कहना है कि इतिहास में इतना बड़ा संकट कभी देश-दुनिया के सामने नहीं आया। शुरुआत में लगा था कि यह 1930 के प्लेग के बाद का या दूसरे विश्व युद्ध के बाद का सबसे बड़ा संकट है, लेकिन जल्द ही साफ हो गया कि वे दोनों इस महामारी और आर्थिक महामारी के आगे कहीं भी नहीं ठहरते। ऐसे में, शेयर बाजार चल कैसे रहे हैं और उनमें लगातार पैसा कहां से आता जा रहा है, यह सवाल विकट तो है, मगर अबूझ नहीं। नील इरविन ने एक लेख में कहा कि बाजार में पैसा लगाने वालों को यकीन है कि सरकार ऐसा कुछ न कुछ जरूर करेगी, जिससे बड़ी कंपनियों के दीर्घकालीन मुनाफे पर कोई बुरा असर न पड़े। यह बात 10 अप्रैल की है और उतने ही दिनों में बाजार 23 मार्च की तलहटी से 25 प्रतिशत ऊपर आ चुका था। 
एकदम यही हाल भारत के शेयर बाजार में भी है। तब से अब तक ऐसा लगता ही नहीं कि देश में, अर्थव्यवस्था, कारोबार में कहीं कोई परेशानी है। बस बीच में म्यूचुअल फंड को लेकर कुछ समस्या हुई। कुछ कंपनियों में सट्टेबाजी की शिकायतें आईं, लेकिन मोटे तौर पर बाजार ऊपर की ओर ही चलता जा रहा है। इस पर भी वही तर्क चल रहा था, जो अमेरिका में दिया गया। कुछ दिन तो उम्मीद पर तेजी कायम रही, लेकिन जब भारत का आर्थिक पैकेज आया, तो ज्यादातर उम्मीदों पर पानी फिर गया। फिर भी बाजार ठंडा नहीं पड़ा। 
रिजर्व बैंक के गवर्नर दो से ज्यादा मौकों पर कह चुके हैं कि भारत के शेयर बाजारों का जमीनी हकीकत से कोई रिश्ता नहीं दिख रहा है। ऐसी ही बात एनएसई के मुखिया ने भी कही और तमाम जानकार बाजार में खतरे की घंटी बजा रहे हैं। इसके बावजूद तेजी रुकने का नाम नहीं ले रही। वजह क्या हो सकती है? 
एक तो बिल्कुल साफ है। अमेरिका और यूरोप के कई देशों में जो पैसा सरकारों ने जनता को बांटा है, उसका काफी हिस्सा वहां के शेयर बाजारों में और म्यूचुअल फंडों के हाथ पहुंच गया है। इस रकम का एक बड़ा हिस्सा भारत के बाजारों में आना लाजिमी ही है। दूसरी बड़ी वजह यह है कि जब बाजार चढ़ रहा था, उस वक्त बैंकों में ब्याज घट रहा था। लोगों के पास जो भी पैसा बचा था या जिनकी नौकरियां गईं, उन्हें जो मुआवजा वगैरह मिला, वह भी रखने के लिए उन्हें बैंक ठीक जगह नहीं लग रहे थे। ऐसे में, सामने नजर आई शेयर बाजार की तेजी। आपदा में अवसर की तलाश कर रहे लाखों लोग इस स्वर्ण मृग के पीछे दौड़ पडे़ हैं। दिसंबर से जून के बीच भारत में करीब 40 लाख नए डीमैट अकाउंट खोले गए हैं। इनमें से ज्यादातर लोग नए निवेशक हैं। जरा भी असावधानी हुई, तो यही लोग सबसे ज्यादा खतरे में होंगे। 
लेकिन भारत हो या अमेरिका, जब बाजार में तेजी चल रही होती है, तब सावधानी की बात कोई सुनना नहीं चाहता। मशहूर निवेशक जिम रॉजर्स ने अभी एक टीवी चैनल को इंटरव्यू में कहा कि उन्हें लगता है कि बाजार में कोई टाइम बम टिक-टिक कर रहा है और वह कभी भी फट सकता है। इसका साफ लक्षण भी वह बताते हैं। खासकर अमेरिकी बाजार के संदर्भ में। उनका कहना है, बाजार का इतिहास पढ़ लीजिए, आपको भी यह लक्षण दिख जाएगा। जब महंगी कंपनियों के शेयर आसमान की तरफ बढ़ते चलें और सस्ती कंपनियों के शेयर गिरते ही चले जाएं, तो समझें कि अब तेजी का दौर अपने अंतिम चरण में है। इसके बाद जब मंदी शुरू होगी, तो सबसे बुरी चोट उन महंगे शेयरों को ही पड़ेगी, जो आसमान से गिरेंगे। चुनाव बाद अमेरिका के बाजार का क्या होगा, और अगर वहां कुछ उल्टा-सीधा हुआ, तो भारत के बाजार कैसे अछूते रहेंगे? 
इसलिए फूंक-फूंककर कदम रखने का वक्त है। न सिर्फ निवेशकों के लिए, बल्कि भारत के नीति-निर्माताओं के लिए भी कि अगर कहीं कोई ऊंच-नीच हुई, तो क्या हमारा देश और हम उससे निपटने के लिए तैयार हैं? खासकर ट्रंप के कोरोना संक्रमित होने की खबर आते ही यूरोप और अमेरिका के बाजार जिस तरह से थर्रा उठे, उसके बाद तो इस दिशा में गंभीरता से सोचना और भी जरूरी हो गया है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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