Home करेंट अफेयर्स अखबारों के सम्पादकीय वह जितना जिए, बेचैन जिए (हिन्दुस्तान)

वह जितना जिए, बेचैन जिए (हिन्दुस्तान)

किसी बेचैन आत्मा को कैसे परिभाषित करेंगे? कविता की दुनिया में एक हवा के झोंके की कल्पना अक्सर की जाती है, जिसे आप मुट्ठियों में कैद करने की कोशिश करते हैं और हर बार असफल होते हैं। चितरंजन सिंह ऐसी ही एक बेचैन आत्मा थे। दुनिया-जहान का दर्द अपने अंदर समेटे, और कहीं भी अन्याय दिखने पर अपने को झोंक देने वाले। बेचैनी का आलम यह कि एक लड़ाई खत्म होने के पहले ही दूसरे अन्याय की सूचना मिलने पर उसमें कूद पड़ने को तैयार। एक बार मुझे मिले, तो कालाहांडी से लौटे ही थे और अपनी रिपोर्ट तैयार कर रहे थे कि तभी उन्होंने घोषित किया कि वह दूसरी सुबह चित्रकूट जा रहे हैं। वहां पुलिस ज्यादती का कोई मामला आया था। न दुनिया में अन्याय की कमी थी और न ही चितरंजन के अंदर लड़ने के हौसले की।
संगत से आदमी कैसे बदलता है, चितरंजन इसके अद्भुत उदाहरण थे। उनकी मृत्यु की खबर मिलने पर मैंने अतीत में झांकना शुरू किया, तो पाया कि उनकी पहली छवि मेरे मन में एक जातिवादी संगठन के सदस्य के रूप में दर्ज है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हनुमान सेना नामक एक संगठन सत्तर के दशक में दो-तीन वर्षों तक सक्रिय रहा, जो परिसर में किस्म-किस्म की गुंडागर्दी करता रहता था। बाद के पीड़ित-दमित जनता की लड़ाई लड़ने वाले चितरंजन को देखकर कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था कि एक समय वह खुद किसी ऐसे संगठन के सदस्य रहे थे। जिस बेचैन आत्मा का जिक्र मैंने किया है, उसे गुंडागर्दी के चौखटे से निकल एक जन-पक्षधर राजनीति में जुड़कर ही चैन मिला। रामजी राय, कृष्ण प्रताप, दिनेश शुक्ल और गोरख पांडे की संगत ने उन्हें एक असाधारण मनुष्य में तब्दील कर दिया।
सत्तर के दशक में राजनीति समेत भारतीय समाज के सभी अंग अराजक लंपटता के पंक में लहालोट थे। आम जन सांस रोके संजय गांधी को युवा हृदय सम्राट बनते देख रहे थे। ऐसे समय में वाम प्रतिरोध से जुड़ा एक संगठन इंडियन पीपुल्स फ्रंट यानी आईपीएफ देश में सक्रिय हुआ, तो चितरंजन उससे जुड़ गए और उनकी बेचैन आत्मा को एक नई दुनिया में सक्रिय होने का मौका मिल गया। आईपीएफ बाद में एक राजनीतिक दल में तब्दील हुआ, तो चितरंजन उसके लिए तन-मन से जुट गए, पर चुनावी दंगल के दांव-पेच में लिथड़ी राजनीति उन्हें बहुत रास नहीं आई और वह मानवाधिकार संगठनों से जुड़ गए। मृत्यु से थोड़ा पहले तक वह पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) में सक्रिय रहे। वर्ण-व्यवस्था और हमारे राज्य के बुनियादी चरित्र के चलते किसी भी मानवाधिकार कार्यकर्ता को रोज संघर्ष के मौके मिलते ही रहते हैं और उसने चितरंजन को भी 30 साल खूब व्यस्त रखा। वह आज आंध्र में होते, तो कल ओडिशा में। उनके अंदर की बेचैनी ने ही शायद उन्हें टिककर किसी जगह बैठने नहीं दिया।
चितरंजन से मेरे संबंध रहे तो लगभग पचास साल, पर मुलाकातें अनियमित और बेतरतीब रहीं। कभी हुईं, तो कम अंतराल पर लंबी-लंबी और कभी वर्षों बाद महज हाल-चाल पूछने भर की। उनके अंदर एक बात ऐसी थी, जिसे उनसे मिलने वाले सभी लक्षित करते थे। मैंने भी बड़ी शिद्दत से इसे महसूस किया था। वह कभी शौकिया मानवाधिकार कार्यकर्ता नहीं रहे। किसी बड़ी ज्यादती के भुक्तभोगियों से मिलकर लौटे चितरंजन से घटना का विवरण सुनना एक अलग ही अनुभव होता था। जितना वह भाषा के जरिए कहते थे, उससे ज्यादा उनकी आंखें कहती थीं। उनके कायांतरण के लिए जिम्मेदार गोरख पांडे की एक कविता में आंखों के लिए आई उपमा तकलीफ का उमड़ता हुआ समंदर का सही अर्थ मुझे बोलते हुए चितरंजन की आंखों में झांककर ही पता चला। वह मनुष्य के दुख डूबकर सुनाते, और उसी तरह सुनते थे। हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में पहले छात्रावास का नाम गोरख पांडे छात्रावास रखा गया, तो देर रात मुझे जगाकर वह घंटों बातें करते रहे। विषय वही, जो उन्हें गोरख या रामजी राय की सोहबत से मिला था, देश-दुनिया का दर्द। तमाम पत्र-पत्रिकाओं में लिखते रहे, पर कभी भी तटस्थ नैरेटर की भंगिमा नहीं अपना सके। इसे उनकी कमजोरी कह सकते हैं, पर यही तो उनकी ताकत थी। हाशिमपुरा के नृशंस हत्याकांड के विवरण मैंने न जाने कितने पत्रकारों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के सामने बयान किए होंगे, पर मेरी याद में बार-बार अपनी डबडबाई आंखें पोंछने वाले वह अकेले श्रोता थे। इसी तरह, कृष्ण प्रताप की हत्या के बाद जिस तरह उन्होंने अदालती लड़ाइयां लड़ीं और मामले की सीबीआई जांच कराकर ही माने, वह मेरे समेत तमाम मित्रों के लिए ईष्र्या का विषय रहा है।
इस बेचैन आत्मा के साथ बिताई एक रात मैं कभी न भूल सकूंगा। कोई साथ छोड़कर जा रहा था और वह अचकचाए से बार-बार पूछ रहे थे कि उनसे क्या गलती हुई है? उनकी लाल आंखों से लग रहा था कि वह कई रातों से सोए नही हैं और मेरे सामने अपने अंदर की छटपटाहट बयान कर मुक्त होना चाहते हैं। सारी रात वह एकालाप करते रहे, मैं चुपचाप सुनता रहा। मैं जानता था कि जो जा रहा है, उसे रोका नहीं जा सकता और शायद वह भी इसे मान चुके थे। उनके अंदर का एक बड़ा मनुष्य ही था, जो इस बिछड़ने के पीछे अपनी जिम्मेदारी रेखांकित करने की कोशिश कर रहा था। दूसरा कोई होता, तो साथी की बेवफाइयां तलाशता। कई रातें बहुत लंबी हो जाती हैं। लगता है, खत्म ही नहीं होंगी। ऐसी ही एक रात थी वह। भोर की पहली किरण के साथ उठकर वह टहलने निकल गए। मैं इतना ही कह सकता हूं कि इसके बाद वह जितना जिए, अधिक बेचैन जिए।
खराब स्वास्थ्य और काफी कुछ वीतरागी हो जाने के बावजूद मानवाधिकारों में उनकी आस्था कम नहीं हुई थी। और कुछ नहीं, तो हर साल बलिया में एक बड़ा मानवाधिकार सम्मेलन ही आयोजित करते रहे। एक कार्यक्रम में मुझे भी शरीक होने का मौका मिला। उनमें दक्षिण या वाम का भेद भुलाकर ऐसे सभी ‘ऐक्टिविस्ट’ बुलाए जाते थे, जो मानवाधिकारों के लिए देश के अलग-अलग हिस्सों में कार्यरत थे। स्वभाव की यही उदारता उन्हें जीवन में वैचारिक रूप से दूर खडे़ लोगों से मैत्री कराती रही, चाहे वह समाजवादी चंद्रशेखर हों या संघ से जुडे़ वीरेंद्र सिंह मस्त। शायद यह गुण जन-संघर्षों में निरंतर भागीदारी से उत्पन्न हुआ हो।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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