Home करेंट अफेयर्स अखबारों के सम्पादकीय लोगों की ताकत बनती तस्वीरें  (हिन्दुस्तान)

लोगों की ताकत बनती तस्वीरें  (हिन्दुस्तान)

ढाई महीने के भीतर ही ऐसी दो घटनाएं हुईं, जिन्होंने नागरिक अधिकारों की दुहाई देने वाले अमेरिका को पूरी तरह हिला दिया। पहली घटना मिनियापोलिस में हुई, जहां जॉर्ज फ्लॉयड नाम के अश्वेत की एक निरंकुश पुलिस अधिकारी ने अपने घुटने से गरदन दबाकर हत्या कर दी। इससे शुरू हुआ उबाल अभी ठंडा भी नहीं पड़ा था कि पिछले सप्ताह विस्कॉन्सिन में पुलिस ने दिन-दहाडे़ अश्वेत युवक जैकब ब्लैक को पकड़कर गोली मार दी। इन दोनों ही घटनाओं ने अमेरिका के अश्वेतों को ही नहीं, बल्कि कोरोना संक्रमण और लॉकडाउन की वजह से पहले ही कई तरह के दबाव झेल रहे वहां के समाज को झकझोर दिया। दो अश्वेत नौजवानों और पुलिस के जालिम अधिकारियों के अलावा इन दोनों ही मामलों में एक और पात्र भी है, जिसने इन घटनाओं के प्रसार और उनका नैरेटिव तैयार करने में बड़ी भूमिका निभाई। वह है, स्मार्टफोन का कैमरा। अगर इन घटनाओं  की लाइव रिकॉर्डिंग न हुई होती, तो पुलिस इन्हें कई तरह की लीपा-पोती से रफा-दफा कर चुकी होती। कुछ संगठन, कुछ कार्यकर्ता भले इन मामलों को उठाते और चिल्लाते रहते, लेकिन कुछ ही समय में यह बात आई-गई हो जाती। 
स्मार्टफोन कैमरों ने न सिर्फ इन घटनाओं के वीडियो बनाए, बल्कि पलक झपकते ही उन्हें पूरी दुनिया में फैला भी दिया। वीडियो बनाने वाले ये लोग कोई पेशेवर फोटोग्राफर नहीं थे। वे राह चलते लोग थे। घटना उन्हें विचलित कर रही थी, इसलिए उन्होंने उसे अपने फोन के कैमरे में दर्ज कर लिया। इन राह चलते लोगों के अलावा मिनियापोलिस की घटना का एक और वीडियो भी उपलब्ध है, जो घटनास्थल के पास के एक व्यवसायिक प्रतिष्ठान के सीसीटीवी कैमरे में दर्ज हुआ था। यह हमारे रोजमर्रा के जीवन में कैमरे के विस्तार का एक और आयाम है। 
फोटोग्राफी का इतिहास जब पढ़ाया जाता है, तब उसमें यह बताया जाता है कि कैमरे ने घटनाओं, लोगों, स्थितियों और उनके आस-पास के माहौल को पूरी सटीकता से याद रखना आसान बना दिया है। लेकिन ये घटनाएं बता रही हैं कि कैमरा अब उससे कहीं आगे जा चुका है। अब वह इतिहास भी बनाने लगा है। दुनिया के बहुत सारे आंदोलन, बहुत सारे जन-उबाल ऐसे रहे हैं, जिनमें लोगों के सामूहिक दर्द को सतह पर ले आने और उन्हें एक मकसद में बांध देने का श्रेय संवेदनशील कवियों, ओजस्वी वक्ताओं और कई दार्शनिकों, चिंतकों को दिया जाता है, लेकिन अमेरिका में अश्वेतों के समर्थन में जो आंदोलन दिख रहे हैं, उनका श्रेय अगर किसी को दिया जा सकता है, तो वह स्मार्टफोन वीडियो को। वे वीडियो ऐसे लोगों ने बनाए हैं, हम जिनके बारे में, जिनकी प्रतिबद्धता के बारे में नहीं जानते। अभी आप यू-ट्यूब पर जाकर ऐसे वीडियो देखने के साथ ही उन्हें बनाने वालों के नाम भी जान सकते हैं, लेकिन समय बीतने के साथ हम उनके नाम भूल जाएंगे, इतिहास में बस वह लहर ही दर्ज होगी, जिसके चलते लाखों लोग सड़कों पर निकल आए।
फोटोग्राफी के 200 साल के इतिहास का यह अनूठा दौर है, जब तकरीबन हरेक हाथ में एक कैमरा है और वह हर समय तैयार है। वह सिर्फ तस्वीरें खींचने और वीडियो बनाने का काम ही नहीं कर सकता, बल्कि उन्हें तुरत-फुरत पूरी दुनिया में फैला भी सकता है। भले ही स्मार्टफोन कैमरे की ढेर सारी आलोचनाएं होती है- यह निजता को भंग करता है, जीवन को एक नई तरह की ऊब देता है, समारोहों या यात्राओं के दौरान लोग माहौल का आनंद लेने की बजाय सारा समय फोटो खींचने में बर्बाद कर देते हैं, कुछ तो सिर्फ इसलिए कि दुनिया को यह दिखा सकें कि वे वहां आनंद लेने आए थे। फोटोग्राफी के मंजे हुए कलाकार इसे कला की हत्या की तरह भी देखते हैं। उनकी बहुत सारी आपत्तियां जायज भी हो सकती हैं। महंगे आईफोन से फोटो खींचने वालों को न फोकस की चिंता होती है और न फ्रेम का शऊर। सेल्फी लेते समय लोग इतना ज्यादा सचेत हो जाते हैं कि उनकी आड़ी-टेढ़ी शक्लों से फेसबुक और इंस्टाग्राम भरे पडे़ हैं। पर लोग लगातार तस्वीरें खींच रहे हैं और खूब खींच रहे हैं, जो पसंद आ रहा है उसकी भी, और जो नहीं पसंद आ रहा है, उसकी भी। पेशेवर कैमरा हर जगह मौजूद नहीं हो सकता, पर स्मार्टफोन कैमरा हर उस जगह मौजूद है, जहां लोग आते-जाते हैं।
पिछले एक दशक में हमें एक ऐसी पीढ़ी मिल गई है, जो सबसे ज्यादा तस्वीरें खींच रही है, सबसे ज्यादा वीडियो बना रही है। यह एक ऐसी पीढ़ी है, जिसके पास सबसे ज्यादा तस्वीरें हैं, अपनी, अपने दोस्तों की, घर वालों की, पास-पड़ोस की, जानवरों की, पेड़-पौधों की। मानव जाति के पूरे इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ। इतिहास लेखन में एक परंपरा रही है ओरल हिस्ट्री की। इसमें अतीत को उन लोगों की यादों के जरिए खंगालने की कोशिश की जाती है, जो किसी खास घटनाक्रम से गुजरे हैं। इस परंपरा से अतीत के उन आयामों तक पहुंचने की कोशिश की जाती है, जो अक्सर इतिहासकारों के अकादमिक अध्ययन से ओझल रह जाते हैं। इस समय जिस तरह से तस्वीरें खींची जा रही हैं, उनसे लगता है कि जल्द ही विजुअल हिस्ट्री की एक नई परंपरा शुरू होगी। भविष्य के इतिहासकार फेसबुक, यू-ट्यूब, गूगल फोटो, इंस्टाग्राम, फ्लिकर, ड्रॉपबॉक्स वगैरह को खंगालते हुए अतीत को जाननेके लिए जूझते दिखाई देंगे।
जॉर्ज फ्लॉयड की हत्या के बाद ही हमें एक दूसरी तस्वीर भी दिखाई पड़ी थी, जिनमें अमेरिका के कई प्रांतों में पुलिस वाले सामूहिक तौर पर घुटने के बल सिर झुकाए शोक की मुद्रा में दिख रहे थे। शायद पुलिस को बहुत जल्दी समझ में आ गया कि अगर तस्वीर आग भड़का सकती है, तो यह जख्मों पर मरहम लगाने का काम भी कर सकती है। इसलिए घुटनेके बल झुककर वे पुलिस वाले सिर्फ मियनापोलिस की घटना पर ही शोक नहीं व्यक्त कर रहे थे, वे स्मार्टफोन फोटोग्राफी की बढ़ती ताकत को भी सलामी दे रहे थे।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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