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लॉकडाउन के साथ लौटे सवाल (हिन्दुस्तान)

वह फरवरी 1988 की खिलखिलाती दोपहर थी। गुजरी रात की बर्फबारी के बाद स्टॉकहोम की खूबसूरती और निखर आई थी। ऐसा लगता था, जैसे समूचे शहर ने नख से शिख तक उजली सफेद चादर ओढ़ रखी है। हम एक डिपार्टमेंटल स्टोर से निकलकर अपने होटल की ओर बढ़ चले थे। हम यानी स्वर्गीय उदयन शर्मा और मैं। उदयन जी तब तक रविवार  में धुआंधार रिपोर्टिंग के जरिए काफी शोहरत कमा चुके थे। 
उस दिन मैंने पहली बार इतना बड़ा डिपार्टमेंटल स्टोर देखा था और उदयन जी की धुआंधार खरीदारी से मेरा अचरज दोगुना हुआ जा रहा था। उन्होंने शेविंग ब्लेड से लेकर जांघिया तक यह कहते हुए बटोर डाले थे कि मैं तो ‘इंडियन ब्लेड’ इस्तेमाल ही नहीं करता। जांघिये का तो पता नहीं, पर उनकी खिचड़ी दाढ़ी पर नजर डालते हुए मैंने पूछ लिया था कि आप ब्लेड इस्तेमाल ही कितना कर पाते होंगे? जवाब था- जितना भी करता हूं, ‘फॉरेन’ का ही करता हूं। 
उन्होंने जितना सामान खरीदा था, वह प्लास्टिक के कई ‘कैरी बैग्स’ में समा सका था। हम उन्हें जब अपने हाथों में लेकर निकले, तो ऐसा लगा, जैसे या तो हथेलियां कट जाएंगी, अथवा भुजाएं टूटकर गिर पड़ेंगी। किसी तरह खरामा-खरामा होटल की ओर बढ़ रहे थे कि अचानक पीछे से आए एक व्यक्ति ने मेरी दाहिनी हथेली में अटका सामान लेने की कोशिश की। क्या यह कोई झपटमार है? दिमाग में सबसे पहले उपजे इस सवाल को उस सूटेड-बूटेड नौजवान के चेहरे पर पसरी विनम्र मुस्कान ने अगले ही क्षण धो डाला। 

मैंने उदयन जी की ओर देखा, उनके चेहरे पर सहमति पसरी हुई थी। अज्ञात सज्जन ने मेरा आधा सामान ले लिया। बदले में उदयन जी ने अपने दो कैरी बैग मेरी ओर बढ़ा दिए। लगभग आधा किलोमीटर आगे तिराहा था। हमारा होटल दाईं ओर था, राहगीर को बाईं तरफ जाना था। उसने सामान कुछ इस अंदाज में लौटाया, जैसे उसे अफसोस हो कि वह हमें मंजिल तक नहीं पहुंचा पा रहा है। 32 साल बीत गए, पर मुझे आज तक उसकी भलमनसाहत एक नसीहत की तरह याद है। 

मैंने आपको यह कहानी क्यों सुनाई? वजह यह है कि देश के तमाम प्रदेशों में लॉकडाउन लौट चला है। यह उन आशावादियों के लिए आघात है, जो यह भोली उम्मीद पाल बैठे थे कि सब कुछ हस्बे-मामूल हो चुका है। हिन्दुस्तानियों का पुराना कुटेव है कि हम अपनी सुविधा और आदतों के आगे बडे़ से बड़ा खतरा बिसरा देते हैं। बाजारों, दफ्तरों और कार्यस्थलों से पाबंदी हटते ही लोगों ने सेहत संबंधी निर्देशों का अनुपालन दरकिनार कर दिया। वह तो मेट्रो और नगर बस सेवाएं कई जगहों पर बाधित हैं, यदि इन्हें खोल दिया गया होता, तो फिर यह आपदा घर-घर में प्रवेश कर गई होती। 

हमारी दूसरी खराब आदत है, हर समस्या को सरकार के हवाले कर चुप बैठ जाना। इतनी बड़ी आबादी को प्रशासन की पाबंदियों और पुलिस के डंडों से लंबे समय तक नहीं हांका जा सकता। महामारी से बचना है, तो          हमें खुद को बदलना होगा। अमेरिका और यूरोप इसके उदाहरण हैं। वहां के लोगों ने इसकी उपेक्षा की और वे अपनी प्रगतिशीलता का रुतबा हमेशा के लिए गंवा बैठे। हम अनजाने में वक्त के उस दौर में आ बैठे हैं, जहां आत्मरक्षा की अकेली गारंटी अपनी आदतों में सुधार है। 

ऐसा नहीं है कि हमारी हुकूमतें अपना काम नहीं कर रहीं, भारत ने जिस तरह प्रतिव्यक्ति अपनी टेस्टिंग क्षमता विकसित की है, वह चार महीने पहले कल्पनातीत थी। मार्च तक हमारे पास कोरोना जांच के लिए सिर्फ पुणे में ‘नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी’ लैब थी। आज देश के 1,100 से अधिक स्थानों पर इसका परीक्षण हो रहा है। दिल्ली और मुंबई की बात करते हैं। दिल्ली में लगभग 200 केंद्रों पर, तो महाराष्ट्र में 115 लैबों में जांच की जा रही है। इसी तरह, उत्तर प्रदेश में लगभग नौ लाख लोगों का कोरोना टेस्ट किया जा चुका है, तो बिहार में दो लाख, 70 हजार से अधिक सैंपल की जांच हुई है। जांच के मामले में हम दुनिया के शीर्ष पांच देशों में एक हैं।

इसी तरह, कोरोना मरीजों को भरती करने के लिए पूरे देश में लाखों बेड की व्यवस्था की गई है। जनवरी में पहला केस मिलने तक हम यह भी नहीं जानते थे कि यदि कोरोना पसरा, तो क्या होगा? 
नतीजा सामने है। मरीजों के ठीक होने की दर में प्रतिदिन इजाफा हो रहा है। मार्च के अंतिम दिनों में देश में संक्रमित लोगों के ठीक होने की दर जहां महज सात फीसदी थी, वहीं अब यह लगभग 60 प्रतिशत हो गई है। किसी-किसी राज्य में तो यह 80 फीसदी के ऊपर पहुंच गई है। कुल मिलाकर, इनमें आठ गुना से अधिक सुधार देखा गया है। देश में प्रति 10 लाख पर सिर्फ 538 लोग संक्रमित हैं, जबकि अमेरिका, ब्राजील और ब्रिटेन में इसकी दस गुनी संख्या है। इतनी ही संख्या में मरने वालों का अनुपात हमारे यहां 15 है, जबकि यूरोपीय देशों में 600 से ज्यादा।

हालांकि, खतरा टला नहीं है। कोरोना का वायरस परकाया-प्रवेश में पारंगत है। यही वजह है कि जितने लोग ठीक हो रहे हैं, उससे कहीं अधिक वायरस की चपेट में आ रहे हैं। संक्रमित लोगों की संख्या के मामले में हम संसार में तीसरे स्थान पर पहुंच चुके हैं। 

यहां मैं फिर से स्वीडन की ओर लौटना चाहूंगा। वहां के प्रधानमंत्री स्टीफन लॉफवेन ने लॉकडाउन लगाने से इनकार कर दिया था, क्योंकि इसकी बड़ी आर्थिक कीमत चुकानी होती है। यकीनन, उन्हें स्वीडिश लोगों के आचार-व्यवहार पर भरोसा था। हमारे यहां इसका उल्टा है। जो लोग प्रधानमंत्री पर विश्वास करते हैं, वे भी उनकी नसीहतें नहीं अपनाते।

यह हाल तब है, जब भारत का ग्रामीण समाज शताब्दियों से महामारियों को अपनी सफाई  और सलीके से जीतता आया है। हमें इस वक्त नई जरूरतों और आविष्कारों का अपनी परंपराओं से मेल करना होगा। इसके साथ आर्थिक गतिविधियों को भी हवा देनी होगी। अभी तक औद्योगिक उत्पादन वापस नहीं लौटा है और बाजारों में मांग भी गिर गई है। दोनों में तालमेल बैठाने के लिए सरकार को एकीकृत उपाय अपनाने होंगे। अधिकतर सरकारी घोषणाएं इसलिए सिरे नहीं चढ़ पातीं, क्योंकि तमाम विभागों में तालमेल का अभाव होता है। यह ऐसा काम है, जिसे सिर्फ हुकूमत कर सकती है। 
जानलेवा कोरोना और भुखमरी जनने वाली मंदी से सत्ता और समाज का सामंजस्य ही हमें बचा सकता है।

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