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रिजल्ट के आगे (हिन्दुस्तान)

कोरोना महामारी ने इंसानी जिंदगी के तमाम पहलुओं को बुरी तरह प्रभावित किया है। जाहिर है, शैक्षणिक क्षेत्र को भी इसके कारण काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। आलम यह है कि कुछ विषयों की बोर्ड परीक्षाएं तक रोक देनी पड़ीं, कॉलेज-यूनिवर्सिटी की परीक्षाओं को लेकर तो अब भी असमंजस की स्थिति है। पर इन तमाम दुश्वारियों के बीच केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड यानी सीबीएसई की इस बात के लिए सराहना की जानी चाहिए कि उसने न सिर्फ परीक्षा प्रक्रिया को पूरा करने का रास्ता निकाला, बल्कि  अब उसने बारहवीं कक्षा के परिणाम भी घोषित कर दिए हैं। सुखद यह भी है कि पिछले वर्ष के मुकाबले इस साल उत्तीर्ण होने वालों की दर में पांच फीसदी से अधिक की बढ़ोतरी हुई है। इस वर्ष 88.78 प्रतिशत से अधिक बच्चे सफल हुए हैं, जबकि पिछले साल 83.4 फीसदी कामयाब रहे थे। इस बार भी सरकारी विद्यालयों का प्रदर्शन शानदार रहा है। जवाहर नवोदय विद्यालयों व केंद्रीय विद्यालयों के 98.5 प्रतिशत से अधिक बच्चे सफल रहे हैं, तो लड़कियों का पलड़ा एक बार फिर भारी रहा है।
हालांकि, मेधावी बच्चों को थोड़ी-सी निराशा जरूर हुई होगी, क्योंकि इस बार बोर्ड ने प्रतिभा सूची जारी नहीं की है, लेकिन बोर्ड ने एक अच्छी पहल यह की है कि उसने अनुत्तीर्ण बच्चों के लिए ‘फेल’ शब्द का इस्तेमाल करना बंद कर दिया है। उसकी बजाय ‘एसेन्शियल रिपीट’, यानी उन्हें फिर से कक्षा दोहराने के लिए कहा है। काफी लंबे समय से फेल शब्द को लेकर समाज और शैक्षिक क्षेत्र में बहस छिड़ी हुई थी कि यह कई बच्चों को मानसिक रूप से तोड़ देता है और भावुक क्षणों में वे आत्मघाती कदम उठा बैठते हैं। यह सही है कि अनुत्तीर्ण बच्चों के परिणाम में शब्दों के हेर-फेर से कोई फर्क नहीं पडे़गा, मगर कई बार रूढ़ अर्थ इतने मारक हो जाते हैं कि ऐसे शब्दों को त्यागना ही बेहतर होता है। एकाधिक विषय में पिछड़ गए 87,451 बच्चों के पास अभी भी मौका है कि वे पूरक परीक्षा के जरिए अपने अंक दुरुस्त कर सकें। 
सरकार को इस अहम पड़ाव के आगे के रास्ते को लेकर अब अपना रुख साफ करना होगा। कॉलेजों में दाखिले की क्या प्रक्रिया होगी? यदि ऑनलाइन प्रवेश परीक्षाएं ली गईं, तो क्या इन साढ़े 10 लाख से अधिक बच्चों में से सबके पास वैसी सुविधाएं या संसाधन हैं कि वे ऐसी प्रक्रिया में भाग ले सकें? सरकार को सुनिश्चित करना होगा कि किसी बच्चे के साथ व्यवस्थागत त्रुटियों की वजह से कोई अन्याय न हो। महामारी के कारण अभी तमाम शिक्षण संस्थान बंद हैं। शहरी इलाकों के निजी-सरकारी स्कूलों ने ऑनलाइन कक्षाओं का संचालन शुरू कर दिया है। पर समर्थ अभिभावकों के साथ भी परेशानी यह आ रही है कि वे चाहकर भी अपने बच्चों को लैपटॉप या टैबलेट नहीं दिला पा रहे। विभिन्न क्षेत्रों में ‘वर्क फ्रॉम होम’ की बढ़ती जरूरत ने बाजार में इन उत्पादों की कमी पैदा कर दी है। सीबीएसई द्वारा आगामी परीक्षाओं के लिए पाठ्यक्रम में कटौती और अब परिणामों की घोषणा सही दिशा में उठे कदम हैं। जिस रफ्तार से कोरोना-संक्रमण बढ़ रहा है, उसे देखते हुए स्कूलों-कॉलेजों के खुलने की फिलहाल तो कोई सूरत नजर नहीं आती। पर इस महामारी से लड़ते हुए भी हम जैसे जीने का जीवट दिखा रहे हैं, वैसे ही हमें पढ़ने और आगे बढ़ने की नई पात्रता भी हासिल करनी होगी।

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